भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः २६

नटी—अहिरुबबदो णाम । ( अभिरूपपतिर्नाम । )

सूत्र०—अज्जे ! इहलोइओ, आदु पारलोइओ ? (आर्ये ! इहलौकिकः, अथवा पारलौकिकः ? )

नटी—अज्ज ! पारलोइओ । ( आर्य ! पारलौकिकः । )

सूत्र०—पेक्खंतु पेक्खंतु अज्जमिस्सा ! मइएण भत्तपरिव्वएण पारलोइओ भत्ता अन्णेसीअदि । ( प्रेक्षन्तां प्रेक्षन्ताम् आर्यमिश्राः ! मदीयेन भक्तपरिव्ययेन पारलौकिको भर्ता अन्विष्यते ! )

नटी—अज्ज ! पसीद पसीद; तुमं ज्जेव मम जम्मंतरेवि भत्ता भविस्ससि त्ति उबबसिदम्हि ( आर्य ! प्रसीद प्रसीद, त्वमेव मम जन्मान्तरेऽपि भर्ता भविष्यसि इत्युपोषिताऽस्मि ।


विमर्श—मृष्यतु—तितिक्षा=सहन करना अर्थवाली दिवादिगणीय √मृष्+ लोट् प्र पु. ए. व. । सम्भ्रम अथवा वीप्सा में द्वित्व है। पिनष्टि—संचूर्णन अर्थवाली रुधादिगणीय √पिष्लृ=पिष्+लट् प्र. पु. ए. व. । सुमनसः=पुष्प—"( स्त्रियः ) सुमनसः पुष्पं प्रसूनं कुसुमं समम् । अमरकोष—२।४।१७ इसके अनुसार स्त्रीलिङ्ग बहुवचन है। पञ्चवर्ण-कुसुमोपहार-शोभिता—पीले, लाल, सफेद, हरे एवं नीले रंग के फूलों को पूजन में प्रयुक्त करने के कारण पृथ्वी शोभायमान लग रही है। पञ्चवर्णानाम् कुसुमानाम् उपहारेण शोभिता—तत्पु० । उपवासः=उप √वस् +घञ् भोजनपरित्याग=व्रत । किंनामधेयः=किस नाम वाला 'भागरूपनामभ्यो धेयः, इस वार्त्तिक से स्वार्थ में 'नाम' शब्द से 'धेय' प्रत्यय हुआ है ।

अर्थ

नटी— अभिरूपपति नामक व्रत है । [इसे करने से सुन्दर पति प्राप्त होता है]

सूत्रधार—आर्ये ! इस लोक में होने वाला अथवा परलोक में होने वाला ( पति मिलता है ) ?

नटी—आर्य ! परलोक में होने वाला [ पति मिलता है ] ।

सूत्रधार [ क्रोधपूर्वक ] सम्माननीय महानुभावो ! देखिये, देखिये, मेरे भात के व्यय द्वारा परलोक में होने वाला पति ढूंढ़ा जा रहा है ।

नटी—आर्ये ! प्रसन्न हों, प्रसन्न हों । दूसरे जन्म में भी तुम्हीं मेरे पति बनोगे, इसलिये उपवास कर रही हूँ ।

टीका—अभिरूपपतिः=अभिलक्ष्यं रूपमस्य=अभिरूपः=विद्वान् सुन्दरश्च 'अभिरूपो बुधे रम्ये' इति मेदिनी, अभिरूपः पतिर्यस्मात् सः, पञ्चम्यर्थे बहुव्रीहिः, अस्यानुष्ठात् वैदुष्य-सौन्दर्योभययुक्तः पतिर्लभ्यते इत्यर्थः । इहलौकिकः=इह लोके भवः, अत्र "अनुशतिकादीनाञ्च [ पा. सू. ७।३।२० ] इत्यनेन उभयपदवृद्धया ऐहलौकिक