मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ मृच्छकटिकम्
सूत्र०—अज्जे ! [ चिरसंगीदोवासणेण— इत्यादि पठित्वा ] अत्थि किंपि अम्हाणं गेहे असिदव्वं ण वेत्ति ? (आर्ये ! [ चिरसङ्गीतोपासनेन—इत्यादि पठित्वा ] अस्ति किमपि अस्माकं गेहे अशितव्यं न वेति ?)
नटी—अज्ज । सब्बं अत्थि । ( आर्य ! सर्वमस्ति । )
सूत्र०—किं किं अत्थि ? ( किं किमस्ति ? )
नटी—तं जधा,—गुड़ोदणं, घिअं, दहीं, तंडुलाइं, अज्जेण अत्तव्वं रसाअणं सब्बं अत्थि त्ति; एव्वं दे देवा आसासेन्दु । ( तन् यथा—गुड़ौदनं, घृतं, दधि, तण्डुलाः, आर्येण अत्तव्यं रसायनं सर्वमस्तीति; एवं ते देवा आशासन्ताम् )
सूत्र०—अज्जे ! किं अम्हाणं गेहे सब्बं अत्थि ? आहु परिहससि ? ( आर्ये ! किम् अस्माकं गेहे सर्वमस्ति ? अथवा परिहससि ? )
नटी—[स्वगतम्] परिहसिस्सं दाब । [प्रकाशम्] अज्ज अत्थि आबणे । ( परिहसिष्यामि तावत् । आर्य ! अस्ति आपणे । )
सूत्र—[ सक्रोधम् ] आः अणज्जे ! एव्वं दे आसा च्छिजिस्सदि, अभावं अ गमिस्ससि, अंदाणि अहं बरंडलंबुओ बिअ दूरं उक्खिविअ पाडिदो ।
सूत्रधार—आर्ये ! ( बहुत देर तक संगीत का अभ्यास करने के कारण — इत्यादि पूर्वोक्त वाक्य कह कर) — हमारे घर में खाने योग्य कुछ भी है, अथवा नही ?
नटी—आर्य ! सभी कुछ है ।
सूत्रधार—क्या-क्या है ?
नटी—वह इस प्रकार है—गुड़-भात, घी, दही, भात—आर्य के खाने योग्य सभी [ पूर्वोक्त ] रसमय ( सरस पदार्थ ) हैं । इस प्रकार देवता लोग तुम्हारे लिये आशीर्वाद दें ।
सूत्रधार—आर्ये ! क्या हमारे घर में यह सब कुछ है ? अथवा परिहास कर रही हो ? [ मजाक उड़ा रही है ? ]
नटी—(स्वगत)—तो परिहास करूँगी । (प्रकट रूप में) आर्य ? बाजार में है ।
सूत्रधार—( क्रोधपूर्वक ) अरी दुष्टे ! जैसे मैं इस समय बाँस में बन्धे मिट्टी के ढेले के समान दूर तक ऊपर उठा कर [ नीचे ] गिरा दिया गया उसी प्रकार तुम्हारी भी आशा भंग होगी, और अभाव [ विनाश ] को प्राप्त करोगी ।
टीका—प्रविश्य=रंगमञ्चे आगत्य, इयमस्मि—अहम् उपस्थिता—इति शेषः । स्वागतम्=शोभनम् आगमनम्, नियोगः=आज्ञा, आदेशः, अनुष्ठीयताम्=