मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः २५
नटी--[ प्रविश्य ] अज्ज ! इमं म्हि ( आर्य ! इयमस्मि । )
सूत्र०--अज्जे ! साअदं दे । ( आर्ये ! स्वागतं ते । )
नटी--आणावेदु अज्जो, को णिओओ अणुचिट्ठीअदु त्ति ? ( आज्ञा-पयतु आर्यः, को नियोगोऽनुष्ठीयतामिति ।
नटीसूत्रधारौ आर्यनाम्ना परस्परम् ।" आयामितण्डुलोदकप्रवाहा--अधिक चावलों को धोने के लिये बहुत पानी उपयुक्त होने के बाद सड़कों पर बह रहा है । अथवा पके चावलों से निकाला गया मांड सड़क पर फैला हुआ यह भी अर्थ सम्भव है । कृतविशेषका युवती इव--जिस प्रकार कोई युवती टिकली लगाने पर सुन्दर लगती है, उसी प्रकार कड़ाही के नीचे का काला रंग पृथ्वी पर बीच बीच में लग गया है और वे चिह्न सुन्दर दिखाई दे रहे हैं । स्निग्धगन्धेन--विभिन्न प्रकार के पकवान बनाने में प्रचुर घी प्रयुक्त हुआ है, उसकी उत्कृष्ट गन्ध के द्वारा । स्निग्ध=स्नेहयुक्त, घृतादि से निर्मित पदार्थ भी स्निग्ध हैं, तेषां गन्धेन यह समस्त पाठ उचित है । स्निग्धेन गन्धेन-इस पाठ में अर्थ की संगति नहीं है ।
पूर्वविहितम्=पूर्वजों द्वारा संचित, पाठान्तर -पूर्वार्जितम्=पूर्वजों द्वारा उपार्जित करके गुप्त रूप से जमीन में गाड़ कर रखा गया, निधानम्=खजाना, उपपन्नम्=मिल गया, उत्पन्नम्=इस पाठ में निकल आया । ओदनमयम्=भात से व्याप्त, अन्नमयम् इस पाठ में अन्न से भरा हुआ । ओदनमय--इस कथन से और 'तण्डुलोदक' आदि कथन से उस समय चावलों का अधिक उपयोग सिद्ध होता है ।
'प्राणात्ययम्'--प्राणानामत्ययो=विनाशः यस्मिन् कर्मणि यथा स्यात् तथा--जिसमें प्राण निकल रहे हों ऐसी बाधा पहुंचाना, प्राणाधिकम् इस पाठ में जिसमें प्राण निकल रहे हों, उस रूप में बाधा पहुँचाना । वर्णक=सुगन्धित लेपन--
( कर्पूरागुरुकस्तूरीकक्कोलै-) र्यक्षकर्दमः ।
गात्रानुलेपनी वर्तिर्वर्णकं स्याद् विलेपनम् ।। अमरकोष २।६।१३३
शब्दायित्वा=शब्द कर के=बुला करके; 'शब्दं करोति'--इस अर्थ में नामधातु रूप में क्यङ् प्रत्यय करके बाद में क्त्वा प्रत्यय करना चाहिये । कुछ संस्करणों में 'शब्दाप्य' अथवा 'शब्दाय्य' यह पाठ भी है; परन्तु उपसर्गादि के साथ समास के अभाव में ल्यप्= य प्रत्ययान्त रूप का प्रयोग मानना उचित नहीं है । 'सद्दाविअ' इस प्राकृत रूप से मिलता जुलता रूप बनाने से उक्त भ्रान्ति हुई है ।
अर्थ--
नटी-- ( प्रवेश करके ) आर्य ! [ मैं ] यह [ उपस्थित ] हूँ ।
सूत्रधार आर्ये ! तुम्हारा स्वागत [ है ] ।
नटी-- आर्य ! आज्ञा दीजिये; [आपकी] किस आज्ञा का पालन किया जाय ।