मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
२६ मृच्छकटिकम्
सूत्र०—अज्जे ! [ चिरसंगीदोवासणेण— इत्यादि पठित्वा ] अत्थि किंपि अम्हाणं गेहे असिदव्वं ण वेत्ति ? (आर्ये ! [ चिरसङ्गीतोपासनेन—इत्यादि पठित्वा ] अस्ति किमपि अस्माकं गेहे अशितव्यं न वेति ?)
नटी—अज्ज । सब्बं अत्थि । ( आर्य ! सर्वमस्ति । )
सूत्र०—किं किं अत्थि ? ( किं किमस्ति ? )
नटी—तं जधा,—गुड़ोदणं, घिअं, दहीं, तंडुलाइं, अज्जेण अत्तव्वं रसाअणं सब्बं अत्थि त्ति; एव्वं दे देवा आसासेन्दु । ( तन् यथा—गुड़ौदनं, घृतं, दधि, तण्डुलाः, आर्येण अत्तव्यं रसायनं सर्वमस्तीति; एवं ते देवा आशासन्ताम् )
सूत्र०—अज्जे ! किं अम्हाणं गेहे सब्बं अत्थि ? आहु परिहससि ? ( आर्ये ! किम् अस्माकं गेहे सर्वमस्ति ? अथवा परिहससि ? )
नटी—[स्वगतम्] परिहसिस्सं दाब । [प्रकाशम्] अज्ज अत्थि आबणे । ( परिहसिष्यामि तावत् । आर्य ! अस्ति आपणे । )
सूत्र—[ सक्रोधम् ] आः अणज्जे ! एव्वं दे आसा च्छिजिस्सदि, अभावं अ गमिस्ससि, अंदाणि अहं बरंडलंबुओ बिअ दूरं उक्खिविअ पाडिदो ।
सूत्रधार—आर्ये ! ( बहुत देर तक संगीत का अभ्यास करने के कारण — इत्यादि पूर्वोक्त वाक्य कह कर) — हमारे घर में खाने योग्य कुछ भी है, अथवा नही ?
नटी—आर्य ! सभी कुछ है ।
सूत्रधार—क्या-क्या है ?
नटी—वह इस प्रकार है—गुड़-भात, घी, दही, भात—आर्य के खाने योग्य सभी [ पूर्वोक्त ] रसमय ( सरस पदार्थ ) हैं । इस प्रकार देवता लोग तुम्हारे लिये आशीर्वाद दें ।
सूत्रधार—आर्ये ! क्या हमारे घर में यह सब कुछ है ? अथवा परिहास कर रही हो ? [ मजाक उड़ा रही है ? ]
नटी—(स्वगत)—तो परिहास करूँगी । (प्रकट रूप में) आर्य ? बाजार में है ।
सूत्रधार—( क्रोधपूर्वक ) अरी दुष्टे ! जैसे मैं इस समय बाँस में बन्धे मिट्टी के ढेले के समान दूर तक ऊपर उठा कर [ नीचे ] गिरा दिया गया उसी प्रकार तुम्हारी भी आशा भंग होगी, और अभाव [ विनाश ] को प्राप्त करोगी ।
टीका—प्रविश्य=रंगमञ्चे आगत्य, इयमस्मि—अहम् उपस्थिता—इति शेषः । स्वागतम्=शोभनम् आगमनम्, नियोगः=आज्ञा, आदेशः, अनुष्ठीयताम्=
प्रथमोऽङ्कः २६
नटी—अहिरुबबदो णाम । ( अभिरूपपतिर्नाम । )
सूत्र०—अज्जे ! इहलोइओ, आदु पारलोइओ ? (आर्ये ! इहलौकिकः, अथवा पारलौकिकः ? )
नटी—अज्ज ! पारलोइओ । ( आर्य ! पारलौकिकः । )
सूत्र०—पेक्खंतु पेक्खंतु अज्जमिस्सा ! मइएण भत्तपरिव्वएण पारलोइओ भत्ता अन्णेसीअदि । ( प्रेक्षन्तां प्रेक्षन्ताम् आर्यमिश्राः ! मदीयेन भक्तपरिव्ययेन पारलौकिको भर्ता अन्विष्यते ! )
नटी—अज्ज ! पसीद पसीद; तुमं ज्जेव मम जम्मंतरेवि भत्ता भविस्ससि त्ति उबबसिदम्हि ( आर्य ! प्रसीद प्रसीद, त्वमेव मम जन्मान्तरेऽपि भर्ता भविष्यसि इत्युपोषिताऽस्मि ।
विमर्श—मृष्यतु—तितिक्षा=सहन करना अर्थवाली दिवादिगणीय √मृष्+ लोट् प्र पु. ए. व. । सम्भ्रम अथवा वीप्सा में द्वित्व है। पिनष्टि—संचूर्णन अर्थवाली रुधादिगणीय √पिष्लृ=पिष्+लट् प्र. पु. ए. व. । सुमनसः=पुष्प—"( स्त्रियः ) सुमनसः पुष्पं प्रसूनं कुसुमं समम् । अमरकोष—२।४।१७ इसके अनुसार स्त्रीलिङ्ग बहुवचन है। पञ्चवर्ण-कुसुमोपहार-शोभिता—पीले, लाल, सफेद, हरे एवं नीले रंग के फूलों को पूजन में प्रयुक्त करने के कारण पृथ्वी शोभायमान लग रही है। पञ्चवर्णानाम् कुसुमानाम् उपहारेण शोभिता—तत्पु० । उपवासः=उप √वस् +घञ् भोजनपरित्याग=व्रत । किंनामधेयः=किस नाम वाला 'भागरूपनामभ्यो धेयः, इस वार्त्तिक से स्वार्थ में 'नाम' शब्द से 'धेय' प्रत्यय हुआ है ।
अर्थ—
नटी— अभिरूपपति नामक व्रत है । [इसे करने से सुन्दर पति प्राप्त होता है]
सूत्रधार—आर्ये ! इस लोक में होने वाला अथवा परलोक में होने वाला ( पति मिलता है ) ?
नटी—आर्य ! परलोक में होने वाला [ पति मिलता है ] ।
सूत्रधार [ क्रोधपूर्वक ] सम्माननीय महानुभावो ! देखिये, देखिये, मेरे भात के व्यय द्वारा परलोक में होने वाला पति ढूंढ़ा जा रहा है ।
नटी—आर्ये ! प्रसन्न हों, प्रसन्न हों । दूसरे जन्म में भी तुम्हीं मेरे पति बनोगे, इसलिये उपवास कर रही हूँ ।
टीका—अभिरूपपतिः=अभिलक्ष्यं रूपमस्य=अभिरूपः=विद्वान् सुन्दरश्च 'अभिरूपो बुधे रम्ये' इति मेदिनी, अभिरूपः पतिर्यस्मात् सः, पञ्चम्यर्थे बहुव्रीहिः, अस्यानुष्ठात् वैदुष्य-सौन्दर्योभययुक्तः पतिर्लभ्यते इत्यर्थः । इहलौकिकः=इह लोके भवः, अत्र "अनुशतिकादीनाञ्च [ पा. सू. ७।३।२० ] इत्यनेन उभयपदवृद्धया ऐहलौकिक
३० मृच्छकटिकम्
सूत्र०—अअं उववासो केण दे उवदिट्ठो ? (अयमुपवासः केन ते उपदिष्टः ?)
नटी—अज्जस्स ज्जेव पिअवअस्सेण चुण्णबुड्ढेण । ( आर्यस्यैव प्रियवयस्येन चूर्णवृद्धेन । )
इति रूपमेव साधु बोध्यम्, न तु इहलौकिक इति। पारलौकिकः=परलोके भवः, उभयत्र 'अध्यात्मादेष्ठञिष्यते' इति वार्त्तिकात् ठञि एकादेशे उभयपदवृद्धौ रूपं सिध्यति। प्रेक्षन्ताम्=अवलोकयन्तु, आर्यमिश्राः=माननीयाः सभायां विराजमानाः, भक्तपरिव्ययेन=भक्तस्य दानादावुपयोगेन, पारलौकिकः=स्वर्गादौ भवः देवादिरूपः, भर्त्ता=पतिः, अन्विष्यते=मृग्यते। प्रसीद, प्रसीद=प्रसन्नो भव, प्रसन्नो भव, जन्मान्तरेऽपि=अन्यत् जन्म=जन्मान्तरम् तत्र, त्वमेव मम पतिः स्याः इत्येतदर्थमयमपवासः क्रियते—
पूर्वजन्मनि या विद्या पूर्वजन्मनि यद्धनम्।
पूर्वजन्मनि या नारी अग्रे धावति धावति ॥
इति वचनमनुसृत्य साम्प्रतं भवतः सौन्दर्यादिवृद्ध्यर्थं कुरूपतापरिहारार्थञ्च मयाऽयमुपवासः गृहीत इति भवता न क्रोद्धव्यम्। उपोषिता=गृहीतोपवासा, अस्मि=भवामि।
विमर्श—अभिरूपपतिः—'अभिरूपो बुधे रम्ये' इस मेदिनीकोष के अनुसार सुन्दर एवं विद्वान् 'अभिरूप' होता है। इसीलिये 'अनुरूप' शब्द की अपेक्षा 'अभिरूप' शब्द का प्रयोग सुन्दर है। अभिरूपः पतिर्यस्मात्=यदनुष्ठानात् स अभिरूपपतिः। जिसके अनुष्ठान से सुन्दर और विद्वान् पति प्राप्त होता है, वैसा व्रत=उपवास है। उपवास - उपोष्यतेऽस्मिन् तत् — इस अधिकरण अर्थ में उप √ + वस् + घञ् है; और व्रत का विशेषण है, उपवासरूप व्रत। इहलौकिकः—यह अशुद्ध है क्योंकि इहलोके भवः—इस अर्थ में 'अध्यात्मादेष्ठञिष्यते' वार्त्तिक से ठञ = इक करने पर 'अनुशतिकादीनाञ्च' [ पा. सू. ] सूत्र से उभयपद की वृद्धि होनी चाहिये। अतः ऐहलौकिकः यही रूप शुद्ध है। आर्यमिश्राः — इसकी व्याख्या प्रारम्भ में सूत्रधार के व्याख्यान के समय की जा चुकी है। भक्तपरिव्ययेन=मेरे भात को खर्च करके परलोक में होने वाले देवता आदि को पतिरूप में प्राप्त करने की इच्छा अनुचित है। त्वमेव जन्मान्तरेऽपि……भविष्यसि। नटी का आशय यह है कि आप को ही अगले जन्म में पतिरूप में चाहती हूँ, इसीलिये यह व्रत कर रही हूँ, दूसरे पति की कामना से नहीं। अतः आपको नाराज नहीं होना चाहिये।
अर्थ—
**सूत्रधार—**यह, उपवास तुम्हें किसने बताया ?
**नटी—**आपके ही प्रिय मित्र जूर्णवृद्ध ने [ यह उपवास मुझे बताया है ] ।
प्रथमोऽङ्कः ३१
सूत्र०---[सकोपम् ।] आः दासीए पुत्ता चुण्णबुड्ढा ! कदा णु क्खु तुमं कुविदेण रण्णा पालएण णवबहूकेसकलावं विअ सुअन्धं कपिज्जन्तं (बज्झन्तं) पेक्खिस्सम् । (आः दास्याः पुत्र चूर्णवृद्ध ! कदा नु खलु त्वां कुपितेन राज्ञा पालकेन नववधूकेशकलापमिव सुगन्धं छेद्यमानं ( वध्यमानं ) प्रेक्षिष्ये ! )
नटी---पसीददु पसीददु अज्जो ? णं अज्जस्स ज्जेव पारलोइओ अअं उववासो अणुचिट्ठीअदि । (प्रसीदतु प्रसीदतु आर्यः। ननु आर्यस्यैव पारलौकिकः अयमुपवासः अनुष्ठीयते ।) [ इति पादयोः पतति । ]
सूत्रधार---[ कोप के साथ ] अरे दासी के बच्चे चूर्णवृद्ध ! क्रुद्ध राजा पालक द्वारा, नववधू के सुगन्धित केशपाश के समान, काटे [ चीरे ] जाते हुये, तुम्हें कब देखूँगा ? [ अर्थात् वह दिन कब आयेगा जब राजा पालक तुम्हें काट रहे होंगे और मैं देख रहा होऊँगा ] ।
नटी---आर्य प्रसन्न हों, प्रसन्न हों, यह पारलौकिक [ परलोक में फल देने वाला ] उपवास आप के लिये ही [ किया जा रहा है, किसी अन्य के लिये नहीं ] । [ इस प्रकार कहकर पैरों पर गिर पड़ती है । ]
टीका---उपदिष्टः=बोधितः, आर्यस्यैव=भवतः एव न ममेत्यर्थः प्रियवयस्येन=प्रियमित्रेण न तु रिपुणेत्यर्थः, चूर्णवृद्धेन=एतन्नामकेन, औषधिचूर्णादीनां विक्रयेण वृद्धिमुपगतेन सार्थकानामकेनेति भावः, सकोपम्=कोपसहितम्, दास्याः पुत्र=दास्याः सुत, गालिदानमिदम्; पालकेन=एतन्नामकेन राज्ञा=नृपेण, नववधूकेशकलापम् इव=नवोढायाः केशसमूहम् इव, छेद्यमानम्=छिन्नं क्रियमाणं कदा=कस्मिन् काले, प्रेक्षिष्ये=अवलोकयिष्ये ? अत्र 'कपिञ्जन्तम्' इत्यस्य 'छेद्यमानम्' वधूपक्षे 'कल्प्यमानम्=संस्कृज्यमानम्, 'वज्जन्तम्' इति पाठे वध्यमानमित्यर्थो बोध्यः । अनेनेदं सूच्यते--शकारेण वसन्तसेनायाः मारणम् तस्याः हत्याया आरोपे चारुदत्तस्य निग्रहः । किञ्च--यथा पालको राजा अतीव निष्ठुरः नववधूकेशकलापानामुच्छेदनेऽपि न किञ्चिद् विचारयति तथैव तव वधेऽपि नैव किञ्चिदपि विचारयिष्यतीति भावः । आर्यस्यैव=भवतः कृते एवायमुपवासः क्रियतेऽतो न क्रोद्धव्यम् ।
विमर्श---आर्यस्यैव प्रियवयस्येन--नटी का आशय यह है कि आप के ही हितचिन्तक मित्र ने मुझे यह 'अभिरूपपति' नामक उपवास बताया है; अतः इसके अनुष्ठान में आप को किसी प्रकार का सन्देह नहीं करना चाहिये । दास्याः पुत्र-- प्राचीन काल में गाली के लिये यह शब्द था । आज कल भी लोकभाषा में ऐसे अनेक शब्द प्रचलित हैं । "पुत्रेऽन्यतरस्याम्" [ पा. सू. ६ । ३ । २२ ] सूत्र से निन्दा अर्थ में षष्ठी का वैकल्पिक अलुक्=लोपाभाव होता है । अतः यहाँ समास है । नव-वधू-केशकलापमिव--केशानां कलापः=समूहः, नवा चासौ वधूश्च--नववधूः
| ३२ | मृच्छकटिकम् |
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**सूत्र०--**अज्जे ! उठ्ठेहि, उठ्ठेहि ! कहेहि, कहेहि एत्थ उपवासे केण कज्जं ? ( आर्ये ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ, कथय कथय-अत्र उपवासे केन कार्यम् ? )
**नटी--**अम्हारिसजणजोगेण बम्हणेण उवणिमन्तिदेण ( अस्मादृश-जनयोगयेन ब्राह्मणेन उपनिमन्त्रितेन । )
**सूत्र०--**तेण हि गच्छदु अज्जा । अहं पि अम्हारिसजणजोग्गं बम्हणं उपणिमन्तेमि । ( तेन हि गच्छतु आर्या । अहमपि अस्मादृशजनयोग्यं ब्राह्मण-मुपनिमन्त्रयामि । )
**नटी--**जं अज्जो आणवेदि । ( इति निष्क्रान्ता ) । ( यदार्य आज्ञापयति । )
सूत्र०--(परिक्रम्य ।) हीमाणहे ! ता कधं मए एव्वं सुसमिद्धाए उज्जयिणीए अम्हारिसजणजोग्गो बम्हणो अण्णेसितव्वो । ( विलोक्य ) । एसो चारुदत्तस्स मित्तं मित्तेओ इदो ज्जेव आअच्छति । भोदु, पुच्छिस्सं दाव । अज्ज मित्तेअ ! अम्हाणं गेहे असिदं अग्गणी भोदु अज्जो । ( आश्चर्यम् ? तत् कथं मया एवं
तस्याः केशकलापम्—नवीन परिणीता वधू के केशकलाप जिस प्रकार सुगन्धित तैलादि युक्त होते हैं और उनको काटने में राजा पालक की रुचि है, उसी प्रकार जूर्णवृद्ध के सिर को काटने में भी उसे आनन्द ही आयेगा। आर्यमैत्रेय—नटी का अभिप्राय यह है कि यह उपवास आपके सम्बन्ध में ही है; आपको ही भावी जन्म में भी पतिरूप से प्राप्त करने की इच्छा से यह व्रत कर रही हूँ। अतः आपको क्रुद्ध नहीं होना चाहिये।
**अर्थ--सूत्रधार—**आर्ये ! उठो, उठो, बताओ, बताओ—इस उपवास में किस प्रकार की आवश्यकता है ? [ अर्थात् क्या क्या पदार्थ चाहिये । ]
नटी--[ निर्धन ] हमलोगों के योग्य ब्राह्मण को निमन्त्रित करने की आवश्यकता है।
**सूत्रधार—**तो आर्या आप जाइये । मैं भी [ निर्धन ] हमलोगों के योग्य ब्राह्मण को उपनिमन्त्रित करता हूँ । [ भोजन के लिये बुलाता हूँ । ]
**नटी—**श्रीमान् की जैसी आज्ञा । [ ऐसा कह कर चली जाती है । ]
सूत्रधार—( घूमकर ) आश्चर्य ! तो कैसे इस सुसमृद्ध उज्जैन नगरी में मैं [निर्धन] अपने योग्य ब्राह्मण को खोजूँ । ( देख कर ) चारुदत्त का मित्र यह मैत्रेय इधर ही आ रहा है ! अच्छा, तो उससे पूछता हूँ । आर्य मैत्रेय ! श्रीमान् जी ( आज ) मेरे घर भोजन करने के लिये पधारें ।
**टीका--**अत्र=अस्मिन् उपवासे, केन=पदार्थेन, कीदृशेन पुरुषविशेषेण वा, कार्यम्=प्रयोजनम्, साध्यमिति शेषः । अस्मादृशजन-योग्येन=अस्मत्सदृशस्य निर्धनस्य जनस्यानुरूपेण, अस्मन्निमन्त्रणस्वीकारकत्र्रेत्यर्थः, उपनिमन्त्रितेन=भोजन-
प्रथमोऽङ्कः ३३
(नेपथ्ये)
भोः ! अण्णं बम्हणं उवणितन्तेदु भवं । वाबुदो दाणि अहं ।
( भोः ! अन्यं ब्राह्मणमुपनिमन्त्रयतु भवान् । व्यापृत इदानीमहम् । )
करणायाहूतेन कार्यमस्तीति शेषः । सुस्वादुभोज्यप्रिया ब्राह्मणाः निर्धनस्य गृहे किं मिलिष्यतीति विचार्य निमन्त्रणं नैव स्वीकरिष्यन्तीति भावः । तेन=यदि एतावत्-कार्यमस्ति तदा, अहमपि=सूत्रधारोऽपि, अस्मादृग्जनयोग्यम्=निर्धनमिति भावः, उपनिमन्त्रयामि=उपनिमन्त्रितं करोमि, वर्तमानसामीप्ये भविष्यत्काले लट् बोध्यः, सुसमृद्धायाम्=विपुलवैभवपरिपूर्णायाम्, उज्जयिन्याम्=अवन्त्याम्, अन्वेष्टव्यः=अन्वेषणीयः । अत्र नगर्यां निर्धनो निर्धनगृहे भोक्ता च ब्राह्मणः न सारल्येन लभ्यः । चारुदत्तस्य=एतत्प्रकरणनायकस्य, मित्रम् वयस्यः, मैत्रेयः=एतन्नामको विदूषक इत्यर्थः । चारुदत्तः निर्धनतामुपगतः अतस्तदीये गृहे नित्यं भुञ्जानो मैत्रेयः अद्य मम गृहेऽपि भोक्तुमागन्तुं शक्नोतीति भावः । अशितुम्=भोक्तुम्, अग्रणीः=अग्रेसरः, भवतु=स्यात्, प्रार्थनायां लोट् । 'अग्रणीः' इति कथनेन अन्येपि ब्राह्मणाः भोक्ष्यन्ते इति सूच्यते । 'अग्रे नयती' त्यर्थे "सत्सूद्विषद्रुहद्रुहयुज्विद्भिद-च्छिदजिनीराजामुपसर्गेऽपि क्विप्' ( पा० सू० ३।२।६१ ) इत्यनेन क्विपि सर्वा-पहारिलोपे, 'अग्रग्रामाभ्यां नयतेर्णो वाच्यः' इति णत्वे सिद्ध्यति ।
विमर्श--ब्राह्मणेन उपनिमन्त्रितेन—उपवास का पारण करने के पूर्व ब्राह्मणों को भोजन कराना आवश्यक है । नटी अपनी निर्धनता को देख कर यह कहना चाहती है कि ऐसे ब्राह्मण को भोजन के लिये उपनिमन्त्रित करो, जो स्वीकार कर ले, और समय पर आ जाय । सुसमृद्धायामुज्जयिन्याम् यह उज्जैन नगरी अत्यन्त समृद्ध लोगों से परिपूर्ण है । यहाँ कोई भी निर्धन नहीं दिखाई देता है । अतः मुझ जैसे गरीब के घर भोजन करने वाला ब्राह्मण खोज पाना बहुत कठिन कार्य है । चारुदत्तस्य मित्रं मैत्रेयः--चारुदत्त एक सम्पन्न व्यक्ति था इस समय भाग्यवश निर्धन हो गया है । अतः उसके यहाँ सदा भोजन करनेवाला मैत्रेय ब्राह्मण भूखा रहता होगा । वह मेरे घर भोजन कर सकता है । अतः सूत्रधार उसे ही उपनिमन्त्रित करना चाहता है । अग्रणीर्भवतु--प्रधान ब्राह्मण बन जाइये । इससे अन्य ब्राह्मणों का भी भोजन करना सिद्ध होता है । 'अग्रे नयति' इस अर्थ में √ नी + क्विप्, सर्वापहारी लोप और णत्व करने पर 'अग्रणी' शब्द सिद्ध होता है ।
( पर्दे के पीछे )
अर्थ--अरे ! आप किसी दूसरे ब्राह्मण को उपनिमन्त्रित करें। मैं इस समय [ किसी अन्य कार्य में ] लगा हुआ हूँ ।
३ मृ०
३४ मृच्छकटिकम्
सूत्र०—अज्ज ! सम्पष्णं भोअणं णीसवत्तं अ । अवि अ दक्खिणा कावि दे भविस्सदि । (आर्य ! सम्पन्नं भोजनम्, निःसपत्नञ्च । अपि च, दक्षिणा कापि ते भविष्यति ।)
(पुनर्नेपथ्ये)
भोः ! जं दाणि पढमं ज्जेव पच्चादिट्ठोसि, ता को दाणि दे णिब्बन्धो पदे पदे मं अणुबन्धेदूम् । (भोः ! यदिदानीं प्रथममेव प्रत्यादिष्टोऽसि; तत् क इदानीं ते निर्बन्धः पदे पदे मामनुबन्धुम् ।)
सूत्र०—पच्चादिट्ठोम्हि एदिणा । भोदु, अण्णं बम्हणं उवणिमन्तेमि । (प्रत्यादिष्टोऽस्मि एतेन । भवतु, अन्यं ब्राह्मणमुपनिमन्त्रयामि ।) (इतिनिष्क्रान्तः ।)
[ इति आमुखम् । ]
सूत्रधार— श्रीमन् ! अच्छा और प्रतिपक्षी-रहित भोजन है । तथा आपके लिये कुछ दक्षिणा भी होगी ।
**टीका—नेपथ्ये=**अन्तर्जवनिकायाम्, **अहम्=**मैत्रेयः, **इदानीम्=**अस्मिन् काले, **व्यापृतः,=**कार्यान्तरे संलग्नः, **सम्पन्नम्=**उत्कृष्टम्, **निःसपत्नम्=**शत्रुरहितम्, **भोजनम्=**अशनम्, **केचित्तु सम्पन्नमित्यस्य प्रस्तुतमित्यर्थः । दक्षिणा=**भोजनानन्तरं ब्राह्मणेभ्यो देयं द्रव्यम् । एवञ्च सुस्वादु विभाजकरहितं भोजनमेव नैव, अपि तु दक्षिणालाभोऽपि भविष्यति । तस्मादवश्यमेव मम गृहे भोक्तव्यमिति भावः ।
विमर्श— मैत्रेय अपनी व्यस्तता के कारण भोजन नहीं करना चाहता है—इसी लिये कहता है—व्यापृत इदानीम् । सम्पन्नम् और निःसपत्नम् ये दोनों भोजन के विशेषण हैं । उत्कृष्ट कोटि का स्वादिष्ट भोजन है और आप ही प्रधान ब्राह्मण हैं अतः इसमें किसी दूसरे का हिस्सा भी नहीं होगा। साथ ही दक्षिणा भी मिलेगी । अतः भोजन के लिये तैयार हो जांय । हर दृष्टि से लाभ है ।
( पुनः पर्दे के पीछे )
अर्थ— अरे ! अभी पहले ही अस्वीकार कर दिये गये हो, तो इस समय पद पद पर मुझसे अनुरोध करने का तुम्हारा यह हठ कैसा है ।
सूत्रधार— इसने मुझे अस्वीकृति दे दी है । अच्छा, किसी दूसरे ब्राह्मण को उपनिमन्त्रित करता हूँ । ( ऐसा कहकर निकल जाता है ।)
( इस प्रकार प्रस्तावना समाप्त होती है । )
**टीका—प्रथमम्=**पूर्वम्, **एव=**निश्चितरूपेण, **प्रत्यादिष्टः=**निराकृतः, **असि, इव प्रार्थनाऽस्वीकृतेति भावः, तत्=**तस्मात्, **पदे पदे=**प्रतिपदम्, पुनः पुनरिति वा, **माम्=**मैत्रेयम्, **अनुबन्धुम्,=**अनुरोधुम्, निमन्त्रयितुमिति वा, **ते=**सूत्रधारस्य, **कः=**कीदृशः,
३५
प्रथमोऽङ्कः
( प्रविश्य प्रावारहस्तः )
मैत्रेयः— ('अण्णं बम्हणम्' इति पूर्वोक्तं पठित्वा ।) अधवा मए वि मित्तेण परस्स आमन्तणआईं भक्खिदव्वाईं। हा अवत्थे ! तुलोअसि। जो णाम अहं तत्तभवदो चारुदत्तस्स रिद्धीए अहो-रत्तं पअतणसिद्धेहिं उग्गारसुरहिगन्धेहिं मोदकेहिं ज्जेव असिदो अब्भन्तरचदुस्सालदुआए उवविट्ठो मल्लकसद्परिखुदो चित्तअरो विअ अङ्गु-
निबन्धः=दुराग्रहः । एतेन=मैत्रेयेण, भवतु=विकल्प इति भावः । अन्यमिति कथनेन ब्राह्मणभोजनाभावे स्वस्यापि भोजनदौर्लभ्यमिति सूचितम् ।
**विमर्श—**प्रत्यादिष्टः—प्रति+आङ्+√विश्+क्त । अन्यं ब्राह्मणमुपनिमन्त्रयामि अन्य ब्राह्मण को निमन्त्रित करना आवश्यक है; क्योंकि ब्राह्मण-भोजन के बिना सूत्रधार को भी भोजन मिलना सम्भव नहीं है और वह बहुत अधिक भूखा है । अतः दूसरा कोई मार्ग नहीं है ।
**आमुखम्—**जहाँ सूत्रधार नटी या विदूषक आदि के साथ वार्तालाप करते हुये विचित्र उक्ति के द्वारा प्रस्तुत वस्तु का संकेत करता हुआ अपने कार्य का कथन करता है-वहाँ आमुख अथवा प्रस्तावना होती है । इसका लक्षण—
नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा । सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते ॥ चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः । आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनाऽपि ।। साहित्यदर्पण ६-३१-३३
इस प्रस्तावना के पाँच भेद होते हैं—
(१) उद्घातक, (२) कथोद्घात, (३) प्रयोगातिशय, (४) प्रवर्तक, (५) अवगलित—द्र० साहित्यदर्पण ६।३३। यहाँ पर प्रयोगातिशय नामक प्रस्तावना है क्योंकि यहाँ एक प्रयोग-सूत्रधार का निमन्त्रणार्थ ब्राह्मण को खोजना—यह प्रस्तुत है, उसी समय 'एष चारुदत्तस्य मित्रं मैत्रेय इत एवागच्छति' इस अन्य प्रयोग से दूसरे पात्र का प्रवेश बताया जा रहा है—
यदि प्रयोग एकस्मिन् प्रयोगोऽन्यः प्रयुज्यते । तेन पात्रप्रवेशश्चेत् प्रयोगातिशयस्तदा ।। सा० द० ६।३६
कुछ लोगों के अनुसार 'कथोद्घात' यह भेद है क्योंकि सूत्रधार के वाक्य को लेकर अन्य पात्र विदूषक का प्रवेश होता हैं—
सूत्रधारस्य वाक्यं वा समादायार्थमस्य वा । भवेत् पात्रप्रवेशश्चेत् कथोद्घातः स उच्यते ।। सा० द० ६।३५
३६ मृच्छकटिकम्
लीहिं छविविअ छविविअ अवणेमि णअरचत्तारवुसहो विअ रोमन्थाअमाणो चिट्ठामि, सो दाणि अहं तस्स दलिद्ददाए जहिं तहिं चरिअ गेहपारावदो विअ आवासणिमित्तं इध आगच्छामि । ( अथवा मयापि मैत्रेयेण परस्य आमन्त्रणकानि भक्षितव्यानि । हा अवस्थे ! तुलयसि । यो नामाहं तत्रभवतः चारुदत्तस्य ऋद्ध्या अहोरात्रं प्रयत्नसिद्धैः उद्गारसुरभिगन्धिभिः मोदकैरेव अशितः अभ्यन्तरचतुःशालद्वारे उपविष्टः मल्लकशत्परिवृतश्चित्रकर इव अङ्गुलीभिः स्पृष्ट्वा-स्पृष्ट्वा अपनयामि, नगरचत्वरवृषभ इव रोमन्थायमानस्तिष्ठामि । स इदानीमहं तस्य दरिद्रतया यस्मिन् तस्मिन् चरित्वा गेहपारावत इव आवासनिमित्तमत्र आगच्छामि ।)
( हाथ में दुपट्टा लिये हुये प्रवेश करके )
अर्थ-मैत्रेय-( अन्य ब्राह्मण को--इत्यादि पूर्वोक्त पढ़कर )
अथवा मुझ मैत्रेय को भी दूसरों के निमन्त्रणों को देखना चाहिये ? [ अथवा दूसरों के निमन्त्रण-सम्बन्धी पदार्थों को खाना चाहिये ? ] अरे भाग्य ! परीक्षा ले रहे हो । जो मैं श्रीमान् चारुदत्त की सम्पन्नता के कारण यत्नपूर्वक बनाये गये, [ खाने के बाद ] उद्गार [ डकार ] में मनोहर सुगन्धवाले लड्डुओं से [ तृप्त ] सन्तुष्ट होता हुआ, भीतरी चतुःशाल [ चौसाल ] के दरवाज़े पर बैठा हुआ, सैकड़ों [ रंगों से भरे हुये ] प्यालों से घिरे हुये चित्रकार के समान [ मैं प्यालों में भरे हुये भोज्य पदार्थों को ] अङ्गुलियों से छू-छू कर दूर हटा देता था [ छोड़ देता था ], नगर के चौराहे [ मध्य ] वाले सांड़ के समान जुगाली करता हुआ बैठा रहता था । वही मैं इस समय उस [ चारुदत्त ] की दरिद्रता के कारण घरेलू ( पालतू ) कबूतर के समान [ भोजन के लिये ] इधर-उधर घूमकर रहने के लिये यहाँ [ चारुदत्त के घर पर ] आ रहा हूँ ।
टीका-प्रावारहस्तः=प्रावारः=उत्तरीयं हस्ते यस्य सः, प्रावृणोति अनेन इति प्रावारः--"वृणोतेराच्छादने" ( पा० सू० ३।३।५४ ) इति करणे घञ्, करधृतोत्तरीयः । मयापि=चारुदत्तस्य मित्रेण मैत्रेयेणापि, परस्य = चारुदत्तभिन्नस्य आमन्त्रणकानि=आमन्त्र्यते=आकाल्यते येभ्यस्तानि, आमन्त्रणप्रस्तुतभोजनार्हद्रव्याणि, अत्र "कृत्यल्युटो बहुलम्" [ पा० सू० ३।३।११३ ] इति बाहुलकात् पञ्चम्यर्थे ल्युटि अनादेशे-आमन्त्रणम्, कुत्सितार्थे कप्रत्यये सिध्यति, भक्षितव्यानि=खादितव्यानि । वस्तुतस्तु अत्र प्रेक्षितव्यानि' इति पाठ उचितः, 'समीहितव्यानि' इत्यर्थः, तेनोपर्युक्तबाहुलकाश्रयणं नापेक्षितम्, निमन्त्रणकशब्दस्य प्रसिद्धार्थेनैव निर्वाहात् । अवस्थे !=भाग्य ! तुलयसि=परीक्षसे; तूलयसि इति पाठे तु तूलं करोषि इत्यर्थे 'तत्करोति तदाचष्टे' इति णिच्, लघूकरोषीत्यर्थः । अहम्=मैत्रेयः, तत्रभवतः=सम्माननीयस्य, चारुदत्तस्य=एतन्नामकस्य प्रकरणनायकस्य, ऋद्ध्या=सम्पन्नतया, समृद्ध्या, अहोरात्रम्=अहर्दिवम्, प्रयत्नसिद्धैः=प्रयत्नपूर्वकं निष्पन्नैः, उद्गारः=भोजनन्तरमुर्ध्वगा-
प्रथमोऽङ्कः ३७
एसो अ अज्जचारुदत्तस्स पिअवअस्सेण चुण्णवुड्ढेण जादीकुसुमवासिदो पावारओ अणुप्पेसिदो सिद्धीकिददेवकज्जस्स अज्जचारुदत्तस्स उवणेदव्वो त्ति । ता जाव अज्जचारुदत्तं पेक्खामि । [ परिक्रम्य अवलोक्य च ] एसो अज्ज चारुदत्तो सिद्धीकिददेवकज्जो गिहदेवदाणं बलिं हरेन्तो इदो ज्जेव आअच्छदि । ( एष च आर्यचारुदत्तस्य प्रियवयस्येन चूर्णवृद्धेन जातीकुसुमवासितः प्रावारकः अनुप्रेषितः सिद्धीकृतदेवकार्यस्यार्यचारुदत्तस्य उपनेतव्य इति । तद् यावदार्यचारुदत्तं प्रेक्षे । [ परिक्रम्यावलोक्य च ] एष आर्यचारुदत्तः सिद्धीकृतदेवकार्यो गृहदेवतानां बलिं हरन् इत एवागच्छति । )
[ ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टश्चारुदत्तो रदनिका च । ]
मिवायुः, तेषु सुरभिः=सौरभयुक्तः गन्धः येषां तैः, उद्गारे सुगन्धप्रदायिभिरित्यर्थः, मोदकैः=मिष्ठान्नविशेषैः 'लड्डू' इति प्रसिद्धैः, अशितः=तृप्तः, अभ्यन्तरे=गृहमध्ये यत् चतुःशालकम्, चतुर्णां शालकानां समुदायः, स्वार्थे कः, तस्य द्वारे=प्रमुखनिर्गमनप्रदेशे, उपविष्टः=स्थितः ह्रस्वा मल्लाः मल्लकाः-पात्रविशेषाः ( भाषायां 'प्याला' इति ) पत्रपुटो वा ( भाषायां 'दोना' इति ) तेषां शतम्, तेन परिवृतः=परिव्याप्तः, अभिवृतः वा, चित्रकारः=रङ्गजीवः, इव=तुल्यम्, अङ्गुलीभिः=हस्ताग्रभागैः, स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा=पौनः पुन्येन स्पर्शं कृत्वा; अपनयामि=त्यजामि, नैव खादामि, अत्र वर्तमानसमीपे भूतकाले लट् बोध्यः तेन 'अपानयम्' इत्यर्थः । अयं भावः-यथा कश्चित् चित्रकारः मल्ल कम्=वर्णिकापात्रम् एकं स्पृष्ट्वा तूलिकां झटिति दूरीकरोति, तदनन्तरमपरं वर्णिकापात्रं स्पृशति, तदपि दूरीकरोति । एवं क्रमेणावश्यकतानुसारं पात्रस्थवर्णं स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा दूरीकरोति, तथैव मैत्रेयोऽपि विविधभोजनपरिपूरितानां पात्राणां स्पर्शमेव कृत्वा [ स्वल्पमेवास्वाद्य ] तानि पात्राणि त्यजन् आसीत् । नगरचत्वरस्य=नगरमध्यभागस्य, वृषभ इव=बलीवर्द इव, भाषायां प्रसिद्धः 'साँड़' इव, रोमन्थायमानः=भोजनोत्तरं ताम्बूलादिचर्वणेन मुखमध्यभागं हनुप्रदेशं चालयन्, तिष्ठामि=उपविशामि, अत्रापि वर्तमानसमीपे लट्, तेन 'अतिष्ठम्' इत्यर्थः, सः=पूर्ववर्णितवैशिष्ट्ययुक्तः, अहम्=मैत्रेयः, इदानीम्=अस्मिन् काले, तस्य=चारुदत्तस्य, दरिद्रतया=निर्धनतया, यस्मिन् तस्मिन्=यत्र तत्र, चरित्वा=भ्रमित्वा, गृहपारावत इव=गृहपालितकपोतसदृशः, आवासनिमित्तम्=रात्रि-निवासहेतुम् एव, अत्र=चारुदत्तस्य गृहे, आगच्छामि=आव्रजामि, आश्रयामीति वा ।
अर्थ—आर्य चारुदत्त के प्रियमित्र चूर्णवृद्ध ने चमेली के फूलों [ की गन्ध ] से सुवासित [ सुगन्धयुक्त ] यह दुपट्टा, भेजा है, कि [ इसे ] देवताओं की पूजा से निवृत्त आर्य चारुदत्त को देना है। तो तब तक आर्य चारुदत्त को देखता हूँ। ( घूमकर और देखकर ) देवपूजन सम्पादित कर चुकने वाले आर्य चारुदत्त गृहदेवताओं के लिये बलि [ भेंट ] लाते हुये इधर ही आ रहे हैं।
३८ मृच्छकटिकम्
( इसके बाद यथानिर्दिष्ट=गृहदेवताओं के लिये बलि हाथ में लेते हुये चारुदत्त और मदनिका प्रवेश करते हैं । )
टीका— चूर्णवृद्धेन=एतन्नामकेन, प्रियवयस्येन=प्रियमित्रेण, जातीनां कुसुमैः=मालतीपुष्पैः, वासितः=सुरभीकृतः, अनुप्रेषितः=सम्प्रेषितः, प्रावारकः=उत्तरीयं वस्त्रम्, सिद्धीकृतदेवकार्यस्य=सिद्धीकृतम्=सम्पादितं देवकार्यम्=देवपूजनादिकार्यं येन सः तस्य, उपनेतव्यः=दातव्यः, सम्बन्धसामान्ये षष्ठी अथवा चारुदत्तस्य समीपे उपनेतव्यः इत्यर्थो योज्यः । प्रेक्षे=अवलोकयामि । सिद्धीकृतदेवकार्यः=सिद्धीकृतम्=सम्पादितम् देवकार्यं येन सः तादृशः, गृहदेवतानाम्=गृहस्थितदेवतानाम् सम्बन्धिनं बलिम्=समर्पणीयं भोज्यम्, हरन्=आहरन्, आगच्छति=आयाति । यथानिर्दिष्टः=गृहदेवताभ्यो बलिमाहरन् इति पूर्ववर्णितावस्थः, प्रविशति=प्रवेशं करोति ।
विमर्श——प्रावारः—प्र+आ+√वृ+घञ् यहाँ प्रावृणोति प्राव्रियते वाऽनेन इस करण अर्थ में घञ् प्रत्यय होता है । जिससे शरीरादि को ढका जाता है, यहाँ उत्तरीय=दुपट्टा अर्थ है । आमन्त्रणकानि—आमन्त्र्यते=आकार्यते अर्थात् बुलाया जाता है जिनके भक्षण के लिये वे भोज्य पदार्थ 'आमन्त्रण' हैं यहाँ 'कृत्यल्युटो बहुलम्' [ पा. सू. ३।३।११३ ] से बाहुलकात् चतुर्थ्यर्थ में ल्युट्=अन करके बाद में स्वार्थ में 'क' प्रत्यय होता है । यह व्युत्पत्ति 'भक्षितव्यानि' ( प्राकृत-भक्खिदव्वाईं ) पाठ में माननी पड़ती है । यदि 'प्रेक्षितव्यानि' ( प्राकृत 'पच्छिदव्वाईं ) पाठ मान लें तो प्रचलित अर्थ से ही निर्वाह हो जाता है । वास्तव में यही पाठ तर्कसंगत भी लगता है । तुलयसि—'यहाँ चुरादिगणीय √तुल उन्माने' धातु नहीं है क्योंकि उसमें उपधागुण होने से 'तोलयसि' यही रूप होगा । अतः यह नामधातु रूप समझना चाहिये 'तुलां करोषि' इस अर्थ में 'तत्करोति तदाचष्टे' से णिच् प्रत्यय होता है । अथवा 'तूलं करोषि' इस अर्थ में णिच् है । प्रथम अर्थ में 'तौल रहे हो'=परीक्षा ले रहे हो' यह अर्थ है और दूसरे में तूल=रूई के समान हल्का बना रहे हो—अर्थ होता है । अशितः—यहाँ अशितम्=अशनम्=भोजनम् अस्ति अस्य—इस अर्थ में 'अर्श आदिभ्योऽच्' [ पा. सू. ५।२।२७ ] से मत्वर्थीय अच् प्रत्यय होता है । और इसका अर्थ है—भोजन ले लेने वाला । अभ्यन्तरचतुःशालकद्वारे—वह विशाल भवन जिसमें चार आमने सामने उपभवन=हाल रहते थे, ऐसे भवनों का उल्लेख बहुत ग्रन्थों में मिलता है । यह भीतर बना होता था और एक मुख्य द्वार होता था । मैत्रेय उसी द्वार पर बैठने का संकेत कर रहा है । मल्लकशतपरिवृतः—यहाँ मलक शब्द के दो अर्थ हैं—(१) विदूषकपक्ष में—भोजन से भरे हुये प्याले और (२) चित्रकारपक्ष में--रंगों से भरे हुये पात्र । भोजनें करते समय विदूषक इन पात्रों से उसी प्रकार घिरा रहता था जिस प्रकार रंगने वाला चित्रकार रंगों से भरे हुये पात्रों से घिरा हुआ बीच में बैठ कर रंगों को छू छू कर चित्र रंगता है
प्रथमोऽङ्कः ३९
चारु०-- ( ऊर्ध्वमवलोक्य सनिर्वेदं निःश्वस्य )--
यासां बलिः सपदि मद्गृहदेहलीनां
हंसैश्च सारसगणैश्च विलुप्तपूर्वः ।
तास्वेव सम्प्रति विरूढतृणाङ्कुरासु
बीजाञ्जलिः पतति कीटमुखावलीढः ॥ ६ ॥
[ इति मन्दं मन्दं परिक्रम्योपविशति ]
वैसे ही विदूषक भी चख चख कर स्वाद लेकर हटा देता था। नगर-चत्वर-वृषभ--यहाँ चत्वर का अभिप्राय यातायात से भरा हुआ चौराहा है जो नगर के मध्य भाग में होता है वहाँ वृषभ=साँड़ मस्ती से निश्चिन्त होकर जैसे खड़ा खड़ा जुगाली करता रहता है, उसे कोई भयवश नहीं हटाता है, उसी प्रकार विदूषक भी मस्ती के साथ पान वगैरह चबाता हुआ बैठा रहता था उसे हटाने की शक्ति किसी के पास नहीं थी। यहाँ 'अपनयामि' और 'तिष्ठामि' इन दोनों में वर्तमान समीपवर्ती भूतकाल में लट् हुआ है। 'रोमन्थं वर्तयति' इस अर्थ में "कर्मणो रोमन्थ-तपोभ्यां वर्त्तिचरोः" [ पा. सू. ३।१।१५ ] सूत्र से क्यङ् प्रत्ययान्त से शानच् प्रत्यय करके 'रोमन्थायमानः' शब्द सिद्ध होता है। गेहपारावत इव--जिस प्रकार घरों की छतों आदि में रहने वाले कबूतर प्रातः होने पर उड़ जाते हैं और इधर उधर दाना चुगकर शाम को रहने के लिये वापस आ जाते हैं उसी प्रकार की स्थिति विदूषक अपनी भी बताता है कि इधर उधर घूमकर कुछ खा पीकर केवल रात काटने के लिये निर्धन चारुदत्त के घर आ जाता है। सिद्धीकृतदेवकार्यस्य--घर के बाहर बने हुये मन्दिरों आदि में पूजन सम्पन्न करने वाला। आर्यचारुदत्तस्य--यहाँ सम्बन्ध-सामान्य में षष्ठी है। गृहदेवतानाम्--घर की रक्षा के लिये घर के समीप ही जिन देवताओं का स्थान है वहाँ अन्नादि की बलि=भेंट दी जाती है, वही चारुदत्त को करना है। इन दोनों पूजनों से यह सिद्ध होता है कि चारुदत्त इस कार्य में बहुत रुचि रखता था।
अन्वयः-- यासाम्, मद्गृहदेहलीनाम, बलिः सपदि, हंसैः, सारसैः, च, विलुप्त-पूर्वः, सम्प्रति, विरूढतृणाङ्कुरासु, तासु, एव, कीटमुखावलीढः, बीजाञ्जलिः, पतति ॥ ६ ॥
शब्दार्थ-- यासाम्=जिन, मद्गृहदेहलीनाम्=मेरे घर की देहलियों [ दरवाजों ] की, बलिः=पूजन में चढ़ायी गई अन्नादि वस्तुयें, सपदि=तत्काल ही, हंसैः=हंसो के द्वारा, च=और, सारसैः=सारसों के द्वारा, विलुप्तपूर्वः=पूर्व समय में [ खाकर ] समाप्त कर दी जाती थीं, [ किन्तु ] सम्प्रति=इस समय, विरूढतृणाङ्कुरासु=बढ़ी हुई घासादि तृणों के अङ्कुरों से युक्त, तासु=उन [ देहलियों पर ], एव=ही, कीटमुखावलीढः=कीड़ों के मुखों से [ आधी ] खायी हुई, बीजाञ्जलिः=चावल आदि अनाजों की मुट्ठी अर्थात् अञ्जलि भर अनाज, पतति=गिर रही है ॥ ६ ॥
४० | मृच्छकटिकम्
अर्थ--चारुदत्त-(ऊपर देख कर और दुःख के साथ लम्बी सांस लेकर)—
मेरे घर की जिन देहलियों पर रक्खी गयी बलि=पूजनभोगसामग्री पहले [ जब मैं सम्पन्न था उस समय ] हंसों और सारसों द्वारा [ खाकर ] शीघ्र ही समाप्त कर दी जाती थी, इस समय [ मेरे निर्धन हो जाने पर ] [ धनाभाव के कारण सफाई आदि न हो सकने के कारण ] उगी हुई घास आदि के अंकुरों से युक्त उन्हीं [ मेरी ] देहलियों पर [ ऊपर रहने वाले ] कीड़ों के मुख द्वारा [ आधे ] खाये हुये बीजों की अञ्जलि [ मुट्ठियों भर बीज ] गिर रही है ॥ ६ ॥
( इस प्रकार कह कर धीरे-२ घूम कर बैठ जाता है । )
**टीका--**दैन्यात् स्वगृहस्य दशां वर्णयति--यासाम् मद्गृहदेहलीनाम्=मम= चारुदत्तस्य गृहाणि, तेषां देहलीनाम्=द्वारपीण्डिकाः, द्वारस्याधोभागे लग्नाः काष्ठ-विशेषाः, तासाम्, उपरि समर्पित इति शेषः, बलिः=पूजनादौ प्रयुक्ततण्डुलादि-धान्यम्, सपदि=शीघ्रमेव, हंसैः=मरालैः, च=तथा, सारसगणैः=पक्षिविशेषसमुदायैः, विलुप्तपूर्वः = भक्षितपूर्वः, पूर्वं विलुप्तः-इत्यत्र “पूर्वापर०" [ पा. सू. २।१।५० ]-इति पूर्वशब्दस्य पूर्वनिपातः, अर्थात् यत्र बलिः पूर्वं तत्कालमेव भक्षितोऽभूत्, सम्प्रति= इदानीम्, मम दरिद्रावस्थायामित्यर्थः, विरूढतृणाङ्कुरासु = विरूढाः = स्वच्छता-दिसंस्काराभावाद् वृद्धिमुपगताः मृजाऽभावादुपचिताः, तृणाङ्कुराः=दूर्वाद्यङ्कुराः यासु तासु, मद्गृहदेहलीषु इत्यर्थः, एव, कीटमुखावलीढः=कीटानां मुखैः=आस्यैः दन्तैरिति भावः, अवलीढः=अर्धभक्षितः, खण्डितः, बीजानाम्=तण्डुलादिधान्यानाम्, अञ्जलिः = परिमाणविशेषः, अञ्जलिपरिमितधान्यादिरिति भावः, पतति=पतितो भवति । एतच्च मम गृहद्वारस्य दुर्दशा मयेदानीं द्रष्टुं न शक्यत इति चिन्तयित्वा विषादातिशयं प्रकटयन् चारुदत्तो भूमावुपविशतीति बोध्यम् । तुल्ययोगितापर्याययोः संसृष्टिः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ ९ ॥
**विमर्श--**चारुदत्त अपने भवन की देहलियों की दुर्दशा देखकर अपनी निर्धनता के विषय में सोच कर किंकर्तव्यविमूढ होकर बैठ जाता है। प्रस्तुत श्लोक में तुल्ययोगिता तथा पर्याय इन दो अलङ्कारों की संसृष्टि है। यहाँ हंस तथा सारस दोनों अप्रस्तुत हैं इन दोनों का लोप रूप एक क्रिया के साथ सम्बन्ध होने से तुल्ययोगिता अलंकार है--
पदार्थानां प्रस्तुतानामन्येषां वा यदा भवेत् ।
एकधर्माभिसम्बन्धः स्यात्तदा तुल्ययोगिता ॥ साहित्यदर्पण १०।४७
दरिद्रतारूपी कारण का तृणाङ्कुरोत्पत्ति, बीजाञ्जलि-प्रपातरूप कार्य से स्पष्ट-तया बोध होता है, अतः पर्यायोक्त अलङ्कार भी है --
पर्यायोक्तं यदा भङ्ग्या गम्यमेवाभिधीयते ॥ साहित्यदर्पण १०।६०
प्रथमोऽङ्कः ४१
विदू०— एसो अज्जचारुदत्तो। ता जाव सम्पद् उपसप्पामि (उपसृत्य ।) सोत्थि भवदे। वड्ढदु भवं। (एष आर्यचारुदत्तः। तद्यावत् साम्प्रतमुपसर्पामि। स्वस्ति भवते। वर्द्धतां भवान्।)
चारु०— अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः प्राप्तः। सखे ! स्वागतम्, आस्यताम्।
विदू०— जं भवं आणवेदि। (उपविश्य ।) भो वअस्स ! एसो दे पिअ वअस्सेण चुण्णवुड्ढेण जादीकुसुमवासिदो पावारओ अणुप्पेसिदो सिद्धी-किददेवकज्जस्स अज्जचारुदत्तस्स तुए उवणेदव्वोत्ति। (समर्पयति ।) (यद्भवान् आज्ञापयति। (उपविश्य) भो वयस्य ! एष ते प्रियवयस्येन चूर्णवृद्धेन जातीकुसुमवासितः प्रावारकः अनुप्रेषितः—सिद्धीकृतदेवकार्यस्य आर्यचारुदत्तस्य त्वया उपनेतव्य इति ।) (समर्पयति)
चारुदत्तः— (गृहीत्वा सचिन्तः स्थितः ।)
विदू०— भो ! इदं किं चिन्तीअदि ? (भोः ! इदं किं चिन्त्यते ?)
इन दोनों की परस्परनिरपेक्ष रूप से स्थिति होने से संसृष्टि है। वसन्त-तिलका छन्द है—ज्ञेयं वसन्ततिलकं त-भ-जा ज-गौ गः।
विलुप्तपूर्वः—पूर्वं विलुप्तः—यहाँ पूर्व शब्द का पूर्वनिपात होना चाहिये था परन्तु “विशेषणं विशेष्येण बहुलम्' [पा. सू. २।१।५७] इसमें बहुलग्रहण के बल पर विलुप्त का पूर्वनिपात हुआ है। कुछ व्याख्याकारों ने यहाँ “पूर्वापरप्रथमचरम-जघन्यमध्य-मध्यमवीराः” [ पा. सू. २।१।५८ ] इससे पूर्वनिपात माना है परन्तु ऐसा करने पर तो ‘पूर्ववैयाकरणः’ के समान ‘पूर्वविलुप्तः’ ऐसा होना चाहिये। न कि ‘विलुप्तपूर्वः’ ऐसा। विरूढ-तृणाङ्कुरासु-चारुदत्त की दशा इतनी खराब हो गई है कि वह सफाई तक नहीं करा सकता। अतः देहली पर घास जम गई है। वि + √रुह् + क्त = विरूढ-विरूढाः तृणाङ्कुरा यासु तासु बहुव्रीहि है। अवलीढः-अव + √लिह् + क्त ।
अर्थ—विदूषक— ये आर्य चारुदत्त हैं। तो अब इनके पास चलूँ। [ समीप जाकर ] आपका कल्याण हो। आपकी वृद्धि हो।
चारुदत्त— अरे ! हर समय के साथी [ सुख-दुख दोनों में साथ देने वाले ] मैत्रेय आ गये। मित्र ! स्वागत है। बैठिये।
विदूषक— जैसी आपकी आज्ञा। ( बैठ कर ) हे मित्र ! आप के प्रिय मित्र चूर्णवृद्ध ने चमेली के फूलों से सुगन्धित यह दुपट्टा आपके लिये भेजा है और कहा है देवताओं की पूजा सम्पन्न कर लेने वाले आर्य चारुदत्त को तुम्हें [=मुझ मैत्रेय को ] देना है। ( समर्पित करता है। )
चारुदत्त— ( लेकर चिन्तित हो जाता है। )
विदूषक— अरे ! आप क्या सोच रहे हैं ?
४२ मृच्छकटिकम्
चारु०—वयस्य !
सुखं हि दुःखान्यनुभूय शोभते घनान्धकारेष्विव दीपदर्शनम् । सुखात्तु यो याति नरो दरिद्रतां धृतः शरीरेण मृतः स जीवति ॥१०॥
**अन्वयः—**घनान्धकारेषु, दीपदर्शनम्, इव, दुःखानि, अनुभूय, [ पुरुषस्य ] सुखम्, हि, शोभते, तु, यः, नरः, सुखात्, दरिद्रताम्, याति, सः, शरीरेण, धृतः, अपि, मृतः, [ सन् ], जीवति ॥ १० ॥
**शब्दार्थ—**घनान्धकारेषु=घोर अन्धेरों में, दीपदर्शनम्=दीपक के दर्शन=प्रकाश के, इव=समान, दुःखानि=दुःखों, कष्टों को, अनुभूय=अनुभव कर के [ व्यक्ति के लिये ) सुखम्=सुख, आनन्द, हि=निश्चित रूप से, शोभते=शोभित होता है, अच्छा लगता है, तु=किन्तु, यः=जो, नरः=मनुष्य, सुखात्=सुख [ के उपभोग ] से, दरिद्रताम्=गरीबी को, याति=प्राप्त करता है, पहुँचता है, सः=वह, शरीरेण=देह से, धृतः=धारण किया हुआ, अपि=भी, मृतः=मरा [ सन्=हुआ ], जीवति=जीवित है ॥ १० ॥
अर्थ—चारुदत्त—मित्र ! घने अन्धेरों में दीपक के प्रकाश के समान दुःखों के अनुभव के बाद [ मनुष्य के लिये ] सुख शोभित होता है, अच्छा रहता है, किन्तु जो पुरुष [ उपभोग करके ] सुख से निर्धनता को प्राप्त करता है, [ गरीब हो जाता है ] वह, शरीर द्वारा धारण किया गया भी मरा हुआ जीवित रहता है । [ जैसे मरा हुआ व्यक्ति व्यर्थ होता है उसी प्रकार निर्धन व्यक्ति भी व्यर्थ होता है ] ॥ १० ॥
**टीका—**जीवितोपि दरिद्रो मृततुल्य इत्याह—घनान्धकारेषु=घोरतिमिरेषु, दीपदर्शनम्=दीपकस्य दर्शनम्=प्रकाशः, इव=तुल्यम्, दुःखानि=कष्टानि, अनुभूय=अनुभवविषयीकृत्य, उपभुज्येत्यर्थः, जनस्येति शेषः, सुखम्=आनन्दः, हि=निश्चयेन, शोभते=राजते, तु=परन्तु, यः=जनः, सुखात्=सुखमनुभूय, ल्यब्लोपे पञ्चमी बोध्या, दरिद्रताम्=निर्धनताम्, याति=प्राप्नोति, गच्छति वा, सः=तादृशो नरः, शरीरेण=देहेन, धृतः=आश्रितः, सन्, मृतः=मृत्युमुपगतः, निर्जीव इत्यर्थः, जीवति=श्वसिति, प्राणान् धारयतीत्यर्थः । दरिद्रो जनो जीवितोऽपि मृत इव भवतीति भावः । अप्रस्तुतप्रशंसा-विरोधाभासश्चालंकारौ । वंशस्थं वृत्तम् ॥१०॥
**विमर्श—**यहाँ चारुदत्त अपनी वर्तमान दरिद्रता को सोंच कर मरणतुल्य कष्ट का अनुभव करता है । सुखात्-यहाँ सुखम् अनुभूय-इस ल्यबन्त के लोप करने पर कर्म में पञ्चमी है "ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च" ( वार्त्तिक ) । शरीरेण धृतः—वास्तव में प्राण शरीर को धारण करते हैं किन्तु निर्धन के विषय में विपरीत स्थिति होती है, यहाँ शरीर प्राणों को धारण किये रहता है, वास्तव में निर्धन व्यक्ति और मृत व्यक्ति में कोई अन्तर नहीं होता है ।
४३
प्रथमोऽङ्कः
विदू०-- भो वअस्स ! मरणादो दलिद्दादो वा कदरं दे रोअदि । ( भो वयस्य ! मरणात् दारिद्र्याद्वा कतरत् ते रोचते ? )
चारु०-- वयस्य !
दारिद्र्यान्मरणाद्वा मरणं मम रोचते न दारिद्र्यम् ।
अल्पक्लेशं मरणं दारिद्र्यमनन्तकं दुःखम् ॥११॥
यहाँ अप्रस्तुत व्यक्तिसामान्य के कथन से प्रस्तुत चारुदत्तरूप व्यक्तिविशेष का ज्ञान होता है, अतः अप्रस्तुतप्रशंसा है। 'इव' पद के श्रवण से पूर्वार्द्ध में श्रौती उपमा है। मृतः स जीवति-इसमें विरोधाभास है, इसका परिहार करने के लिये मृतः का अर्थ-किसी कार्य करने के योग्य नहीं है - ऐसा करना चाहिये। इसमें वंशस्थ छन्द है। इसका लक्षण है-जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ ॥ १० ॥
अर्थ--विदूषक- हे मित्र ! मृत्यु और दरिद्रता में आपको कौन [ अधिक ] अच्छा लगता है ?
अन्वयः-- दारिद्र्यात्, मरणात् वा, मम, मरणम्, रोचते, दारिद्र्यम्, न, [ रोचते, यतः ] मरणम्, अल्पक्लेशम्, दारिद्र्यम्, [ च ] अनन्तकम्, दुःखम्, [ अस्ति ] ॥ ११॥
शब्दार्थ-- दारिद्र्यात्=दरिद्रता से, वा=अथवा, मरणाद्=मरने से, अर्थात् दरिद्रता और मरण में से, मम=मुझ चारुदत्त को, मरणम्=मृत्यु, रोचते=अधिक अच्छी लगती है, न=न कि, दारिद्र्यम्=दरिद्रता, [ यतः=क्योंकि ] मरणम्=मरना, अल्पक्लेशम्=थोड़े समय तक कष्ट देने वाला है, [ च=और ] दारिद्र्यम्=दरिद्रता, अनन्तकम्=कभी भी न समाप्त होने वाला, दुःखम्=कष्ट, [ है ] ॥११॥
अर्थ--चारुदत्त-- मित्र !
दरिद्रता अथवा मृत्यु [ दोनों को देखकर इन ] में से मुझे मरना अच्छा लगता है न कि दरिद्र होना। क्योंकि मरना कम समय कष्ट देने वाला है अर्थात् कुछ समय ही मृत्युकष्ट का अनुभव होता है, किन्तु दरिद्रता कभी भी न समाप्त होने वाला कष्ट है ॥ ११ ॥
टीका-- दरिद्रतापेक्षया मृत्युमेव अभीष्टं प्रतिपादयति-दारिद्र्यात्=निर्धनत्वात्, मरणात्=प्राणत्यागात्, वा, दैन्यमरणयोर्मध्ये इति भावः, (अत्र 'अवलोक्य' इत्यादिकं ल्यबन्तं मत्वा 'ल्यब्लोपे पञ्चमी' इति पञ्चमी, तेन दारिद्र्यम् अवलोक्य, 'निर्धनत्वम् अवलोक्य, चार्थे वा, उभौ विलोक्य उभयोर्मध्ये इत्यर्थः। अन्यथा पञ्चम्युपपत्तिर्दुः-साध्येति बोध्यम् ।) मम=मह्यम्, मरणम्=प्राणत्यागः, रोचते=रुचिकरं भवति,
४४ | मृच्छकटिकम्
विदू०—भो वअस्स ! अलं सन्तावेण । पणइअणसंकामिदविहवस्स सुरलो-अपीदसेसस्स पडिवच्चंदस्स विअ परिक्खओ वि दे अहिअदरं रमणीओ । ( भो वयस्य ! अलं सन्तापेन । प्रणयिजनसंक्रामितविभवस्य सुरलोकपीतशेषस्य प्रतिपच्चन्द्रस्य इव परिक्षयोऽपि ते अधिकतरं रमणीयः । )
न=न तु, दारिद्र्यम् = निर्धनता; मरणम् = प्राणत्यागः, अल्पक्लेशम् = अल्पः=अल्पकालिकःक्लेशो यस्मिन् तत् तादृशम्, अल्पकालिकक्लेशप्रदमित्यर्थः, दारिद्र्यम्=दरिद्रता, च, अनन्तकम्= न विद्यते अन्तः समाप्तिर्यस्य तत्, सकलजीवनपर्यन्तम्, दुःखम्= कष्टम्, भरणं तु किञ्चित्कालपर्यन्तमेव दुःखं ददाति, प्राणत्यागानन्तरं न दुःखम् । किन्तु दरिद्रता तु यावज्जीवं सर्वदैव कष्टदायिनी एव भवतीति एतदपेक्षया मरणमेव प्रशस्यतरं मन्यते इति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः । आर्या वृत्तम् ॥११॥
**विमर्श—**पहले अपने सुखी जीवन के बाद दुःख का अनुभव करने वाला चारुदत्त निर्धनता को मृत्यु से भी निकृष्टतर मानता है। मरते समय जो कष्ट होता है वही अन्तिम कष्ट होता है किन्तु दरिद्रता के कारण तो जीवन भर कष्ट भोगना पड़ता है। दारिद्र्यात् मरणाद् वा--- इनमें पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग चिन्तनीय है। ल्यबन्त क्रियापद का लोप मानकर 'ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च' इससे पञ्चमी सम्भव है—दारिद्र्यं विलोक्य मरणं वा विलोक्य, अथवा 'विचार्या' आदि उपयुक्त क्रियापद का सम्बन्ध मान लेना चाहिये। मम रोचते---यहाँ 'रुच्यर्थानां प्रीयमाणः' [पा० सू० १।४।४३] के अनुसार षष्ठी न होकर चतुर्थी होनी चाहिये-मह्यं रोचते । परन्तु षष्ठी प्रबल विभक्ति है—सम्बन्ध-सामान्य की विवक्षा और अन्य कारकों की अविवक्षा में सर्वत्र षष्ठी सम्भव है—'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव ।' यह प्रसिद्ध नियम है।
इस श्लोक में पूर्वार्द्ध के अर्थ के प्रति उत्तरार्द्ध का कथन हेतु है अतः काव्य-लिङ्ग अलंकार है—हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गं निगद्यते । अथवा सामान्य से विशेष का समर्थनरूप अर्थान्तरन्यास भी हो सकता हैं। इसमें आर्या छन्द है ॥११॥
**अर्थ—विदूषक—**अरे मित्र ! सन्ताप=दुःख करना व्यर्थ है । प्रियजनों को सम्पत्ति दे डालने वाले आपकी निर्धनता भी, देवताओं द्वारा पीने से शेष बचे हुये प्रतिपदा के चन्द्रमा की [ क्षीणता की ] भाँति, अत्यधिक अच्छी लग रही है ।
**टीका—**अलं सन्तापेन-सन्तापेन किमपि साध्यं नास्ति,–'गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका' इति तृतीया । प्रणयिजनेषु=प्रियजनेषु, संक्रमिताः=दया-दिना प्रदत्ताः, विभवाः=धनानि, येन, तस्य, ते=तव चारुदत्तस्य, परिक्षयः=निर्धन-ताऽपि, सुरलोकैः=देवैः पीतशेषस्य=भुक्तावशिष्टस्य, प्रतिपदः=प्रतिपदायाः, चन्द्रस्य
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प्रथमोऽङ्कः
चारु०—वयस्य ! न ममार्थान् प्रति दैन्यम् । पश्य—
एतत्तु मां दहति यद् गृहमस्मदीयं क्षीणार्थमित्यतिथयः परिवर्जयन्ति । संशुष्कसान्द्रमदलेखमिव भ्रमन्तः कालात्यये मधुकराः करिणः कपोलम् ॥१२॥
वस्तुतः प्रतिपच्चन्द्रस्याभावात् कृष्णचतुर्दशी-चन्द्रस्येवेति बोध्यम्, परिक्षयः=कला-क्षीणता, निर्धनत्वं च, रमणीयः=मनोहारी, प्रशंसनीय एवेति भावः ।
**विमर्श—**सुरजनपीतशेषस्य-पुराणादि में यह कथा वर्णित है कि कृष्णपक्ष में देवतागण चन्द्रमा की एक-एक कला का पान प्रतिदिन करते रहते हैं। इसलिये चतुर्दशी की रात्रि में वह अत्यन्त क्षीण हो जाता है। उसी का संकेत यहाँ किया गया है-प्रतिपच्चन्द्रस्येव । प्रतिपत् शब्द लाक्षणिक है क्योंकि प्रतिपत् को चन्द्रमा सर्वथा नहीं होता है।
**अन्वयः—**कालात्यये, करिणः, संशुष्कसान्द्रमदलेखम्, कपोलम्, भ्रमन्तः, मधुकराः, इव, अतिथयः, क्षीणार्थम्, इति, अस्मदीयम्, गृहम्, यत्, परिवर्जयन्ति, एतत्, तु, माम्, दहति ॥ १२ ॥
**शब्दार्थ—**कालात्यये=[ मदजल प्रवाहित होने का ] समय बीत जाने पर, करिणः=हाथी के, संशुष्कसान्द्रमदलेखम्=सूखी हुई गाढ़ी मदधारावाले, कपोलम्=गण्डस्थल को, भ्रमन्तः=घूमते हुये, मधुकराः=भौरों के, इव=समान, अतिथयः=अतिथिगण, क्षीणार्थम्=धन से रहित, इति=ऐसा [ सोंचकर ], अस्मदीयम्=मेरे [ चारुदत्त के ], गृहम्=घर को, यत्=जो, परिवर्जयन्ति=छोड़ देते हैं, एतत्=वह, तु=ही, माम्=मुझ [ चारुदत्त ] को, दहति=जला रहा है, अतिशय कष्ट दे रहा है ॥ १२ ॥
**अर्थ—चारुदत्त—**मित्र ! धन [ नष्ट हो जाने ] के विषय में मुझे कष्ट नहीं है। देखो—
[ मद जल बहने का ] समय बीत जाने पर हाथी की सूखी हुई गाढ़ी मदजल-धारा वाले गण्डस्थल को [ पूर्वकाल में उस पर ] मँडराने वाले भौरों के के समान अतिथि लोग 'धनहीन है' ऐसा सोंचकर मेरे घर को जो छोड़ देते हैं [ उसमें नहीं आते हैं ] यही मुझे जला रहा है, जलने के समान कष्ट दे रहा है। अर्थात् हाथी के सूखे मदजलरहित गण्डस्थल को छोड़कर भौंरे जैसे दूसरी जगह चले जाते हैं उसी प्रकार धनहीन मेरे घर को छोड़कर अतिथि लोग भी अन्यत्र चले जाते हैं । यह अतिथियों द्वारा छोड़ दिया जाना-मुझे जलने के समान कष्ट दे रहा है ॥ १२ ॥
४६
मृच्छकटिकम्
विदू०-भो वअस्स ! एदे खु दासीए पुत्ता अत्यकल्लवत्ता वरडाभीदा विअ गोबालदारआ अरण्णे जहिं जहिं ण खज्जन्ति - तहिं तहिं गच्छन्ति ।
( भो वयस्य ! एते खलु दास्याः पुत्रा अर्थकल्यवर्त्ताः, वरटाभीता इव गोपालदारका अरण्ये यस्मिन् यस्मिन् न खाद्यन्ते तस्मिन् तस्मिन् गच्छन्ति । )
टीका--कालात्यये=कालस्य = मदजलप्रवाहस्य समयस्य, अत्यये=अपगमे, करिणः=गजस्य, संशुष्क-सान्द्र-मदलेखम्=संशुष्काः = संशुष्कतामुपगताः, सान्द्राः=घनीभूताः, मदलेखाः = मदजलप्रवाहरेखाः यस्मिन् तम्, कपोलम्=गण्डस्थलम्, भ्रमन्तः = मदजलपानार्थमितस्ततो गच्छन्तः, मधुकराः = भ्रमराः, इव=तुल्यम्, अतिथयः=न विद्यते आगन्तुं तिथिः=निश्चितसमयो येषां ते, क्षीणार्थम्=धनरहितम्, इति=इत्थं विचिन्त्य, अस्मदीयम्=अस्माकम्, गृहम्=भवनम्, यत् परिवर्जयन्ति=परित्यजन्ति, एतत्=अतिथिकर्तृकगृहकर्मकवर्जनम्, तु=एव, माम्=तव मित्रं चारुदत्तम्, दहति=सन्तापयति । यथा पूर्वकाले मदजलव्याप्ते यत्र गजगण्डस्थले ये भ्रमराः भ्रमन्ति स्म त एव साम्प्रतं मदरहितं तं गजगण्डस्थलं विहायान्यत्र यथा व्रजन्ति तथैव मधुकरतुल्या अतिथयोऽपि धनशून्ये मम गृहे किमपि न लभ्यते इति विचार्य तत् परित्यज्य अन्यत्र गच्छन्ति इत्येव मां सन्तापयतीति भावः । उपमालंकारः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ।। १२ ।।
विमर्श--यहाँ उपमा अलंकार है। इसका उपमानोपमेयभाव विचारणीय है। अनेक व्याख्याकारों ने 'इव' का सम्बन्ध 'कपोलम्' के साथ किया है और सूखी, घनी मदजलधारा वाले हाथी के कपोल की तरह मेरे घर को छोड़ कर--इत्यादि अर्थ किया है। परन्तु मेरे अनुसार 'इव' का सम्बन्ध 'भ्रमराः' के साथ होना चाहिये और भ्रमरों को उपमान तथा अतिथियों को उपमेय मानकर यह अर्थ करना चाहिये--हाथी के सूखी मदजलधारा से रहित कपोल को भौंरे जैसे छोड़ कर अन्यत्र चले जाते हैं वैसे ही [ भौंरों के समान ] अतिथि जो पहले मेरे घर सदा आया करते थे, आज 'धनहीन' ऐसा सोच कर मेरे घर को छोड़ कर चले जाते हैं--यह अतिथियों द्वारा उपेक्षा करना ही मेरे लिये सन्तापकारक है। 'यत्' को गृहम् का विशेषण न मान कर 'परिवर्जयन्ति' क्रिया का विशेषण मानना चाहिये, यत् परिवर्जयन्ति, एतत् तु मा दहति । इसमें वसन्ततिलका छन्द है--
'उक्ता वसन्ततिलका त-भ-जा जगौ गः' ।। १२ ।।
अर्थ--विदूषक-मित्र ! दासीपुत्र [नीच], कलेवा [प्रातःकालीन स्वल्पाहार] के समान [ तुच्छ ] ये धन, बर्र से डरे हुये ग्वालों के समान, वहीं वहीं जाते हैं जहाँ-जहाँ खाये [ भोगे, काटे ] नहीं जाते हैं।
प्रथमोऽङ्कः ४७
चारु०--वयस्य !
सत्यं न मे विभवनाशकृताऽस्ति चिन्ता भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति । एतत्तु मां दहति, नष्टधनाश्रयस्य यत् सौहृदादपि जनाः शिथिलीभवन्ति ॥१३॥
विमर्श-- जैसे बर्र से डरे हुये अहीरों के छोकरे भाग-भाग कर वहीं पहुँचते हैं जहाँ बर्र न काट सकें, उसी प्रकार ये नीच धन भी उसी के पास पहुँचते हैं जो इनका उपभोग नहीं करते हैं, अर्थात् कृपण के पास ही धन रहता है। दास्याः पुत्रः-समास है, गाली के लिये प्रयुक्त है। कल्ये=प्रातः काले वर्तन्ते ए-भिरिति कल्यवर्ताः=प्रातराशाः, अर्था एव कल्यवर्ताः--धनरूपी नास्ता। वरटा-भीताः=वरटा=दंशक कीट-विशेषः, ताभ्यः भीताः=भयग्रस्ताः गोपालदारकाः=गोपालानाम्=आभीराणाम् दारकाः=पुत्राः । खाद्यन्ते-इसके दो अर्थ हैं -गोपाल-दारकों के पक्ष में-काटे जाते हैं-और 'अर्थकल्यवर्त्त' के पक्ष में 'उपभोग किये जाते हैं।' गोपालदारक जैसे काटने वाले बर्र से छिपते हैं उसी प्रकार धन भी उपभोग करने वाले से छिपते हैं, कृपण के पास सुरक्षित रहते हैं।
अन्वयः-- विभवनाशकृता, चिन्ता, मे, न, अस्ति [इति], सत्यम्, हि, धनानि, भाग्यक्रमेण, भवन्ति, यान्ति ( च ) तु, जनाः, नष्टधनाश्रयस्य, सौहृदाद्, अपि, यत्, शिथिलीभवन्ति, एतत्, तु, माम्, दहति ॥ १३ ॥
शब्दार्थ-- विभवनाशकृता=धन के विनाश से उत्पन्न, चिन्ता=मानसिक क्लेश, मे=मुझे [ चारुदत्त को ], न=नहीं, अस्ति=है, [ इति=यह ], सत्यम्=सच [ समझो ], हि=क्योंकि, धनानि=धन सम्पत्ति, भाग्यक्रमेण=भाग्यचक्र के अनुसार, भवन्ति=[ प्राप्त ] होते हैं, [ च=और ] यान्ति=चले जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। तु=किन्तु, जनाः=लोग, नष्टधनाश्रयस्य=धन के आश्रय से हीन=निर्धन [ मुझ चारुदत्त ] की, सौहृदात्=मित्रता से, अपि=भी, यत्=जो, शिथिलीभवन्ति=ढीले पड़ने लगते हैं, विमुख होने लगते हैं, एतत्=वह, माम्=मुझ चारुदत्त को, दहति=सन्तप्त कर रहा है ॥ १३ ॥
अर्थ--चारुदत्त-मित्र !
धन के विनाश से होने वाली चिन्ता मुझे नहीं है, यह सच है, क्योंकि धन [ तो ] भाग्यक्रम से [ प्राप्त ] होते हैं और चले जाते हैं। किन्तु लोग धन और आश्रय से हीन अथवा धन रूपी आश्रय से हीन=निर्धन व्यक्ति [ चारुदत्त ] की मित्रता से भी जो मुख मोड़ने लगते हैं, वह मुझ [ चारुदत्त ] को सन्ताप दे रहा है ॥ १३ ॥
टीका-- धनाभावे मित्रताया अभाव एवं चिन्ताकारणमिति प्रतिपादयति - विभवनाशकृता = धनादिनाशोत्पन्ना, चिन्ता = मानसिकक्लेशः, मे = मम=