भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३८ मृच्छकटिकम्

( इसके बाद यथानिर्दिष्ट=गृहदेवताओं के लिये बलि हाथ में लेते हुये चारुदत्त और मदनिका प्रवेश करते हैं । )

टीका— चूर्णवृद्धेन=एतन्नामकेन, प्रियवयस्येन=प्रियमित्रेण, जातीनां कुसुमैः=मालतीपुष्पैः, वासितः=सुरभीकृतः, अनुप्रेषितः=सम्प्रेषितः, प्रावारकः=उत्तरीयं वस्त्रम्, सिद्धीकृतदेवकार्यस्य=सिद्धीकृतम्=सम्पादितं देवकार्यम्=देवपूजनादिकार्यं येन सः तस्य, उपनेतव्यः=दातव्यः, सम्बन्धसामान्ये षष्ठी अथवा चारुदत्तस्य समीपे उपनेतव्यः इत्यर्थो योज्यः । प्रेक्षे=अवलोकयामि । सिद्धीकृतदेवकार्यः=सिद्धीकृतम्=सम्पादितम् देवकार्यं येन सः तादृशः, गृहदेवतानाम्=गृहस्थितदेवतानाम् सम्बन्धिनं बलिम्=समर्पणीयं भोज्यम्, हरन्=आहरन्, आगच्छति=आयाति । यथानिर्दिष्टः=गृहदेवताभ्यो बलिमाहरन् इति पूर्ववर्णितावस्थः, प्रविशति=प्रवेशं करोति ।

विमर्श—प्रावारः—प्र+आ+√वृ+घञ् यहाँ प्रावृणोति प्राव्रियते वाऽनेन इस करण अर्थ में घञ् प्रत्यय होता है । जिससे शरीरादि को ढका जाता है, यहाँ उत्तरीय=दुपट्टा अर्थ है । आमन्त्रणकानि—आमन्त्र्यते=आकार्यते अर्थात् बुलाया जाता है जिनके भक्षण के लिये वे भोज्य पदार्थ 'आमन्त्रण' हैं यहाँ 'कृत्यल्युटो बहुलम्' [ पा. सू. ३।३।११३ ] से बाहुलकात् चतुर्थ्यर्थ में ल्युट्=अन करके बाद में स्वार्थ में 'क' प्रत्यय होता है । यह व्युत्पत्ति 'भक्षितव्यानि' ( प्राकृत-भक्खिदव्वाईं ) पाठ में माननी पड़ती है । यदि 'प्रेक्षितव्यानि' ( प्राकृत 'पच्छिदव्वाईं ) पाठ मान लें तो प्रचलित अर्थ से ही निर्वाह हो जाता है । वास्तव में यही पाठ तर्कसंगत भी लगता है । तुलयसि—'यहाँ चुरादिगणीय √तुल उन्माने' धातु नहीं है क्योंकि उसमें उपधागुण होने से 'तोलयसि' यही रूप होगा । अतः यह नामधातु रूप समझना चाहिये 'तुलां करोषि' इस अर्थ में 'तत्करोति तदाचष्टे' से णिच् प्रत्यय होता है । अथवा 'तूलं करोषि' इस अर्थ में णिच् है । प्रथम अर्थ में 'तौल रहे हो'=परीक्षा ले रहे हो' यह अर्थ है और दूसरे में तूल=रूई के समान हल्का बना रहे हो—अर्थ होता है । अशितः—यहाँ अशितम्=अशनम्=भोजनम् अस्ति अस्य—इस अर्थ में 'अर्श आदिभ्योऽच्' [ पा. सू. ५।२।२७ ] से मत्वर्थीय अच् प्रत्यय होता है । और इसका अर्थ है—भोजन ले लेने वाला । अभ्यन्तरचतुःशालकद्वारे—वह विशाल भवन जिसमें चार आमने सामने उपभवन=हाल रहते थे, ऐसे भवनों का उल्लेख बहुत ग्रन्थों में मिलता है । यह भीतर बना होता था और एक मुख्य द्वार होता था । मैत्रेय उसी द्वार पर बैठने का संकेत कर रहा है । मल्लकशतपरिवृतः—यहाँ मलक शब्द के दो अर्थ हैं—(१) विदूषकपक्ष में—भोजन से भरे हुये प्याले और (२) चित्रकारपक्ष में--रंगों से भरे हुये पात्र । भोजनें करते समय विदूषक इन पात्रों से उसी प्रकार घिरा रहता था जिस प्रकार रंगने वाला चित्रकार रंगों से भरे हुये पात्रों से घिरा हुआ बीच में बैठ कर रंगों को छू छू कर चित्र रंगता है

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