भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ३९

चारु०-- ( ऊर्ध्वमवलोक्य सनिर्वेदं निःश्वस्य )--

यासां बलिः सपदि मद्गृहदेहलीनां
हंसैश्च सारसगणैश्च विलुप्तपूर्वः ।
तास्वेव सम्प्रति विरूढतृणाङ्कुरासु
बीजाञ्जलिः पतति कीटमुखावलीढः ॥ ६ ॥

[ इति मन्दं मन्दं परिक्रम्योपविशति ]


वैसे ही विदूषक भी चख चख कर स्वाद लेकर हटा देता था। नगर-चत्वर-वृषभ--यहाँ चत्वर का अभिप्राय यातायात से भरा हुआ चौराहा है जो नगर के मध्य भाग में होता है वहाँ वृषभ=साँड़ मस्ती से निश्चिन्त होकर जैसे खड़ा खड़ा जुगाली करता रहता है, उसे कोई भयवश नहीं हटाता है, उसी प्रकार विदूषक भी मस्ती के साथ पान वगैरह चबाता हुआ बैठा रहता था उसे हटाने की शक्ति किसी के पास नहीं थी। यहाँ 'अपनयामि' और 'तिष्ठामि' इन दोनों में वर्तमान समीपवर्ती भूतकाल में लट् हुआ है। 'रोमन्थं वर्तयति' इस अर्थ में "कर्मणो रोमन्थ-तपोभ्यां वर्त्तिचरोः" [ पा. सू. ३।१।१५ ] सूत्र से क्यङ् प्रत्ययान्त से शानच् प्रत्यय करके 'रोमन्थायमानः' शब्द सिद्ध होता है। गेहपारावत इव--जिस प्रकार घरों की छतों आदि में रहने वाले कबूतर प्रातः होने पर उड़ जाते हैं और इधर उधर दाना चुगकर शाम को रहने के लिये वापस आ जाते हैं उसी प्रकार की स्थिति विदूषक अपनी भी बताता है कि इधर उधर घूमकर कुछ खा पीकर केवल रात काटने के लिये निर्धन चारुदत्त के घर आ जाता है। सिद्धीकृतदेवकार्यस्य--घर के बाहर बने हुये मन्दिरों आदि में पूजन सम्पन्न करने वाला। आर्यचारुदत्तस्य--यहाँ सम्बन्ध-सामान्य में षष्ठी है। गृहदेवतानाम्--घर की रक्षा के लिये घर के समीप ही जिन देवताओं का स्थान है वहाँ अन्नादि की बलि=भेंट दी जाती है, वही चारुदत्त को करना है। इन दोनों पूजनों से यह सिद्ध होता है कि चारुदत्त इस कार्य में बहुत रुचि रखता था।

अन्वयः-- यासाम्, मद्गृहदेहलीनाम, बलिः सपदि, हंसैः, सारसैः, च, विलुप्त-पूर्वः, सम्प्रति, विरूढतृणाङ्कुरासु, तासु, एव, कीटमुखावलीढः, बीजाञ्जलिः, पतति ॥ ६ ॥

शब्दार्थ-- यासाम्=जिन, मद्गृहदेहलीनाम्=मेरे घर की देहलियों [ दरवाजों ] की, बलिः=पूजन में चढ़ायी गई अन्नादि वस्तुयें, सपदि=तत्काल ही, हंसैः=हंसो के द्वारा, च=और, सारसैः=सारसों के द्वारा, विलुप्तपूर्वः=पूर्व समय में [ खाकर ] समाप्त कर दी जाती थीं, [ किन्तु ] सम्प्रति=इस समय, विरूढतृणाङ्कुरासु=बढ़ी हुई घासादि तृणों के अङ्कुरों से युक्त, तासु=उन [ देहलियों पर ], एव=ही, कीटमुखावलीढः=कीड़ों के मुखों से [ आधी ] खायी हुई, बीजाञ्जलिः=चावल आदि अनाजों की मुट्ठी अर्थात् अञ्जलि भर अनाज, पतति=गिर रही है ॥ ६ ॥