भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४० | मृच्छकटिकम्


अर्थ--चारुदत्त-(ऊपर देख कर और दुःख के साथ लम्बी सांस लेकर)—

मेरे घर की जिन देहलियों पर रक्खी गयी बलि=पूजनभोगसामग्री पहले [ जब मैं सम्पन्न था उस समय ] हंसों और सारसों द्वारा [ खाकर ] शीघ्र ही समाप्त कर दी जाती थी, इस समय [ मेरे निर्धन हो जाने पर ] [ धनाभाव के कारण सफाई आदि न हो सकने के कारण ] उगी हुई घास आदि के अंकुरों से युक्त उन्हीं [ मेरी ] देहलियों पर [ ऊपर रहने वाले ] कीड़ों के मुख द्वारा [ आधे ] खाये हुये बीजों की अञ्जलि [ मुट्ठियों भर बीज ] गिर रही है ॥ ६ ॥

( इस प्रकार कह कर धीरे-२ घूम कर बैठ जाता है । )

**टीका--**दैन्यात् स्वगृहस्य दशां वर्णयति--यासाम् मद्गृहदेहलीनाम्=मम= चारुदत्तस्य गृहाणि, तेषां देहलीनाम्=द्वारपीण्डिकाः, द्वारस्याधोभागे लग्नाः काष्ठ-विशेषाः, तासाम्, उपरि समर्पित इति शेषः, बलिः=पूजनादौ प्रयुक्ततण्डुलादि-धान्यम्, सपदि=शीघ्रमेव, हंसैः=मरालैः, च=तथा, सारसगणैः=पक्षिविशेषसमुदायैः, विलुप्तपूर्वः = भक्षितपूर्वः, पूर्वं विलुप्तः-इत्यत्र “पूर्वापर०" [ पा. सू. २।१।५० ]-इति पूर्वशब्दस्य पूर्वनिपातः, अर्थात् यत्र बलिः पूर्वं तत्कालमेव भक्षितोऽभूत्, सम्प्रति= इदानीम्, मम दरिद्रावस्थायामित्यर्थः, विरूढतृणाङ्कुरासु = विरूढाः = स्वच्छता-दिसंस्काराभावाद् वृद्धिमुपगताः मृजाऽभावादुपचिताः, तृणाङ्कुराः=दूर्वाद्यङ्कुराः यासु तासु, मद्गृहदेहलीषु इत्यर्थः, एव, कीटमुखावलीढः=कीटानां मुखैः=आस्यैः दन्तैरिति भावः, अवलीढः=अर्धभक्षितः, खण्डितः, बीजानाम्=तण्डुलादिधान्यानाम्, अञ्जलिः = परिमाणविशेषः, अञ्जलिपरिमितधान्यादिरिति भावः, पतति=पतितो भवति । एतच्च मम गृहद्वारस्य दुर्दशा मयेदानीं द्रष्टुं न शक्यत इति चिन्तयित्वा विषादातिशयं प्रकटयन् चारुदत्तो भूमावुपविशतीति बोध्यम् । तुल्ययोगितापर्याययोः संसृष्टिः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ ९ ॥

**विमर्श--**चारुदत्त अपने भवन की देहलियों की दुर्दशा देखकर अपनी निर्धनता के विषय में सोच कर किंकर्तव्यविमूढ होकर बैठ जाता है। प्रस्तुत श्लोक में तुल्ययोगिता तथा पर्याय इन दो अलङ्कारों की संसृष्टि है। यहाँ हंस तथा सारस दोनों अप्रस्तुत हैं इन दोनों का लोप रूप एक क्रिया के साथ सम्बन्ध होने से तुल्ययोगिता अलंकार है--

पदार्थानां प्रस्तुतानामन्येषां वा यदा भवेत् ।
एकधर्माभिसम्बन्धः स्यात्तदा तुल्ययोगिता ॥ साहित्यदर्पण १०।४७

दरिद्रतारूपी कारण का तृणाङ्कुरोत्पत्ति, बीजाञ्जलि-प्रपातरूप कार्य से स्पष्ट-तया बोध होता है, अतः पर्यायोक्त अलङ्कार भी है --

पर्यायोक्तं यदा भङ्ग्या गम्यमेवाभिधीयते ॥ साहित्यदर्पण १०।६०