भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ४१

विदू०— एसो अज्जचारुदत्तो। ता जाव सम्पद् उपसप्पामि (उपसृत्य ।) सोत्थि भवदे। वड्ढदु भवं। (एष आर्यचारुदत्तः। तद्यावत् साम्प्रतमुपसर्पामि। स्वस्ति भवते। वर्द्धतां भवान्।)

चारु०— अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः प्राप्तः। सखे ! स्वागतम्, आस्यताम्।

विदू०— जं भवं आणवेदि। (उपविश्य ।) भो वअस्स ! एसो दे पिअ वअस्सेण चुण्णवुड्ढेण जादीकुसुमवासिदो पावारओ अणुप्पेसिदो सिद्धी-किददेवकज्जस्स अज्जचारुदत्तस्स तुए उवणेदव्वोत्ति। (समर्पयति ।) (यद्भवान् आज्ञापयति। (उपविश्य) भो वयस्य ! एष ते प्रियवयस्येन चूर्णवृद्धेन जातीकुसुमवासितः प्रावारकः अनुप्रेषितः—सिद्धीकृतदेवकार्यस्य आर्यचारुदत्तस्य त्वया उपनेतव्य इति ।) (समर्पयति)

चारुदत्तः— (गृहीत्वा सचिन्तः स्थितः ।)

विदू०— भो ! इदं किं चिन्तीअदि ? (भोः ! इदं किं चिन्त्यते ?)


इन दोनों की परस्परनिरपेक्ष रूप से स्थिति होने से संसृष्टि है। वसन्त-तिलका छन्द है—ज्ञेयं वसन्ततिलकं त-भ-जा ज-गौ गः।

विलुप्तपूर्वः—पूर्वं विलुप्तः—यहाँ पूर्व शब्द का पूर्वनिपात होना चाहिये था परन्तु “विशेषणं विशेष्येण बहुलम्' [पा. सू. २।१।५७] इसमें बहुलग्रहण के बल पर विलुप्त का पूर्वनिपात हुआ है। कुछ व्याख्याकारों ने यहाँ “पूर्वापरप्रथमचरम-जघन्यमध्य-मध्यमवीराः” [ पा. सू. २।१।५८ ] इससे पूर्वनिपात माना है परन्तु ऐसा करने पर तो ‘पूर्ववैयाकरणः’ के समान ‘पूर्वविलुप्तः’ ऐसा होना चाहिये। न कि ‘विलुप्तपूर्वः’ ऐसा। विरूढ-तृणाङ्कुरासु-चारुदत्त की दशा इतनी खराब हो गई है कि वह सफाई तक नहीं करा सकता। अतः देहली पर घास जम गई है। वि + √रुह् + क्त = विरूढ-विरूढाः तृणाङ्कुरा यासु तासु बहुव्रीहि है। अवलीढः-अव + √लिह् + क्त ।

अर्थ—विदूषक— ये आर्य चारुदत्त हैं। तो अब इनके पास चलूँ। [ समीप जाकर ] आपका कल्याण हो। आपकी वृद्धि हो।

चारुदत्त— अरे ! हर समय के साथी [ सुख-दुख दोनों में साथ देने वाले ] मैत्रेय आ गये। मित्र ! स्वागत है। बैठिये।

विदूषक— जैसी आपकी आज्ञा। ( बैठ कर ) हे मित्र ! आप के प्रिय मित्र चूर्णवृद्ध ने चमेली के फूलों से सुगन्धित यह दुपट्टा आपके लिये भेजा है और कहा है देवताओं की पूजा सम्पन्न कर लेने वाले आर्य चारुदत्त को तुम्हें [=मुझ मैत्रेय को ] देना है। ( समर्पित करता है। )

चारुदत्त— ( लेकर चिन्तित हो जाता है। )

विदूषक— अरे ! आप क्या सोच रहे हैं ?