भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४२ मृच्छकटिकम्

चारु०—वयस्य !

सुखं हि दुःखान्यनुभूय शोभते घनान्धकारेष्विव दीपदर्शनम् । सुखात्तु यो याति नरो दरिद्रतां धृतः शरीरेण मृतः स जीवति ॥१०॥


**अन्वयः—**घनान्धकारेषु, दीपदर्शनम्, इव, दुःखानि, अनुभूय, [ पुरुषस्य ] सुखम्, हि, शोभते, तु, यः, नरः, सुखात्, दरिद्रताम्, याति, सः, शरीरेण, धृतः, अपि, मृतः, [ सन् ], जीवति ॥ १० ॥

**शब्दार्थ—**घनान्धकारेषु=घोर अन्धेरों में, दीपदर्शनम्=दीपक के दर्शन=प्रकाश के, इव=समान, दुःखानि=दुःखों, कष्टों को, अनुभूय=अनुभव कर के [ व्यक्ति के लिये ) सुखम्=सुख, आनन्द, हि=निश्चित रूप से, शोभते=शोभित होता है, अच्छा लगता है, तु=किन्तु, यः=जो, नरः=मनुष्य, सुखात्=सुख [ के उपभोग ] से, दरिद्रताम्=गरीबी को, याति=प्राप्त करता है, पहुँचता है, सः=वह, शरीरेण=देह से, धृतः=धारण किया हुआ, अपि=भी, मृतः=मरा [ सन्=हुआ ], जीवति=जीवित है ॥ १० ॥

अर्थ—चारुदत्त—मित्र ! घने अन्धेरों में दीपक के प्रकाश के समान दुःखों के अनुभव के बाद [ मनुष्य के लिये ] सुख शोभित होता है, अच्छा रहता है, किन्तु जो पुरुष [ उपभोग करके ] सुख से निर्धनता को प्राप्त करता है, [ गरीब हो जाता है ] वह, शरीर द्वारा धारण किया गया भी मरा हुआ जीवित रहता है । [ जैसे मरा हुआ व्यक्ति व्यर्थ होता है उसी प्रकार निर्धन व्यक्ति भी व्यर्थ होता है ] ॥ १० ॥

**टीका—**जीवितोपि दरिद्रो मृततुल्य इत्याह—घनान्धकारेषु=घोरतिमिरेषु, दीपदर्शनम्=दीपकस्य दर्शनम्=प्रकाशः, इव=तुल्यम्, दुःखानि=कष्टानि, अनुभूय=अनुभवविषयीकृत्य, उपभुज्येत्यर्थः, जनस्येति शेषः, सुखम्=आनन्दः, हि=निश्चयेन, शोभते=राजते, तु=परन्तु, यः=जनः, सुखात्=सुखमनुभूय, ल्यब्लोपे पञ्चमी बोध्या, दरिद्रताम्=निर्धनताम्, याति=प्राप्नोति, गच्छति वा, सः=तादृशो नरः, शरीरेण=देहेन, धृतः=आश्रितः, सन्, मृतः=मृत्युमुपगतः, निर्जीव इत्यर्थः, जीवति=श्वसिति, प्राणान् धारयतीत्यर्थः । दरिद्रो जनो जीवितोऽपि मृत इव भवतीति भावः । अप्रस्तुतप्रशंसा-विरोधाभासश्चालंकारौ । वंशस्थं वृत्तम् ॥१०॥

**विमर्श—**यहाँ चारुदत्त अपनी वर्तमान दरिद्रता को सोंच कर मरणतुल्य कष्ट का अनुभव करता है । सुखात्-यहाँ सुखम् अनुभूय-इस ल्यबन्त के लोप करने पर कर्म में पञ्चमी है "ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च" ( वार्त्तिक ) । शरीरेण धृतः—वास्तव में प्राण शरीर को धारण करते हैं किन्तु निर्धन के विषय में विपरीत स्थिति होती है, यहाँ शरीर प्राणों को धारण किये रहता है, वास्तव में निर्धन व्यक्ति और मृत व्यक्ति में कोई अन्तर नहीं होता है ।