भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः

विदू०-- भो वअस्स ! मरणादो दलिद्दादो वा कदरं दे रोअदि । ( भो वयस्य ! मरणात् दारिद्र्याद्वा कतरत् ते रोचते ? )

चारु०-- वयस्य !

दारिद्र्यान्मरणाद्वा मरणं मम रोचते न दारिद्र्यम् ।
अल्पक्लेशं मरणं दारिद्र्यमनन्तकं दुःखम् ॥११॥


यहाँ अप्रस्तुत व्यक्तिसामान्य के कथन से प्रस्तुत चारुदत्तरूप व्यक्तिविशेष का ज्ञान होता है, अतः अप्रस्तुतप्रशंसा है। 'इव' पद के श्रवण से पूर्वार्द्ध में श्रौती उपमा है। मृतः स जीवति-इसमें विरोधाभास है, इसका परिहार करने के लिये मृतः का अर्थ-किसी कार्य करने के योग्य नहीं है - ऐसा करना चाहिये। इसमें वंशस्थ छन्द है। इसका लक्षण है-जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ ॥ १० ॥

अर्थ--विदूषक- हे मित्र ! मृत्यु और दरिद्रता में आपको कौन [ अधिक ] अच्छा लगता है ?

अन्वयः-- दारिद्र्यात्, मरणात् वा, मम, मरणम्, रोचते, दारिद्र्यम्, न, [ रोचते, यतः ] मरणम्, अल्पक्लेशम्, दारिद्र्यम्, [ च ] अनन्तकम्, दुःखम्, [ अस्ति ] ॥ ११॥

शब्दार्थ-- दारिद्र्यात्=दरिद्रता से, वा=अथवा, मरणाद्=मरने से, अर्थात् दरिद्रता और मरण में से, मम=मुझ चारुदत्त को, मरणम्=मृत्यु, रोचते=अधिक अच्छी लगती है, न=न कि, दारिद्र्यम्=दरिद्रता, [ यतः=क्योंकि ] मरणम्=मरना, अल्पक्लेशम्=थोड़े समय तक कष्ट देने वाला है, [ च=और ] दारिद्र्यम्=दरिद्रता, अनन्तकम्=कभी भी न समाप्त होने वाला, दुःखम्=कष्ट, [ है ] ॥११॥

अर्थ--चारुदत्त-- मित्र !

दरिद्रता अथवा मृत्यु [ दोनों को देखकर इन ] में से मुझे मरना अच्छा लगता है न कि दरिद्र होना। क्योंकि मरना कम समय कष्ट देने वाला है अर्थात् कुछ समय ही मृत्युकष्ट का अनुभव होता है, किन्तु दरिद्रता कभी भी न समाप्त होने वाला कष्ट है ॥ ११ ॥

टीका-- दरिद्रतापेक्षया मृत्युमेव अभीष्टं प्रतिपादयति-दारिद्र्यात्=निर्धनत्वात्, मरणात्=प्राणत्यागात्, वा, दैन्यमरणयोर्मध्ये इति भावः, (अत्र 'अवलोक्य' इत्यादिकं ल्यबन्तं मत्वा 'ल्यब्लोपे पञ्चमी' इति पञ्चमी, तेन दारिद्र्यम् अवलोक्य, 'निर्धनत्वम् अवलोक्य, चार्थे वा, उभौ विलोक्य उभयोर्मध्ये इत्यर्थः। अन्यथा पञ्चम्युपपत्तिर्दुः-साध्येति बोध्यम् ।) मम=मह्यम्, मरणम्=प्राणत्यागः, रोचते=रुचिकरं भवति,

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