भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४४ | मृच्छकटिकम्

विदू०—भो वअस्स ! अलं सन्तावेण । पणइअणसंकामिदविहवस्स सुरलो-अपीदसेसस्स पडिवच्चंदस्स विअ परिक्खओ वि दे अहिअदरं रमणीओ । ( भो वयस्य ! अलं सन्तापेन । प्रणयिजनसंक्रामितविभवस्य सुरलोकपीतशेषस्य प्रतिपच्चन्द्रस्य इव परिक्षयोऽपि ते अधिकतरं रमणीयः । )


न=न तु, दारिद्र्यम् = निर्धनता; मरणम् = प्राणत्यागः, अल्पक्लेशम् = अल्पः=अल्पकालिकःक्लेशो यस्मिन् तत् तादृशम्, अल्पकालिकक्लेशप्रदमित्यर्थः, दारिद्र्यम्=दरिद्रता, च, अनन्तकम्= न विद्यते अन्तः समाप्तिर्यस्य तत्, सकलजीवनपर्यन्तम्, दुःखम्= कष्टम्, भरणं तु किञ्चित्कालपर्यन्तमेव दुःखं ददाति, प्राणत्यागानन्तरं न दुःखम् । किन्तु दरिद्रता तु यावज्जीवं सर्वदैव कष्टदायिनी एव भवतीति एतदपेक्षया मरणमेव प्रशस्यतरं मन्यते इति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः । आर्या वृत्तम् ॥११॥

**विमर्श—**पहले अपने सुखी जीवन के बाद दुःख का अनुभव करने वाला चारुदत्त निर्धनता को मृत्यु से भी निकृष्टतर मानता है। मरते समय जो कष्ट होता है वही अन्तिम कष्ट होता है किन्तु दरिद्रता के कारण तो जीवन भर कष्ट भोगना पड़ता है। दारिद्र्यात् मरणाद् वा--- इनमें पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग चिन्तनीय है। ल्यबन्त क्रियापद का लोप मानकर 'ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च' इससे पञ्चमी सम्भव है—दारिद्र्यं विलोक्य मरणं वा विलोक्य, अथवा 'विचार्या' आदि उपयुक्त क्रियापद का सम्बन्ध मान लेना चाहिये। मम रोचते---यहाँ 'रुच्यर्थानां प्रीयमाणः' [पा० सू० १।४।४३] के अनुसार षष्ठी न होकर चतुर्थी होनी चाहिये-मह्यं रोचते । परन्तु षष्ठी प्रबल विभक्ति है—सम्बन्ध-सामान्य की विवक्षा और अन्य कारकों की अविवक्षा में सर्वत्र षष्ठी सम्भव है—'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव ।' यह प्रसिद्ध नियम है।

इस श्लोक में पूर्वार्द्ध के अर्थ के प्रति उत्तरार्द्ध का कथन हेतु है अतः काव्य-लिङ्ग अलंकार है—हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गं निगद्यते । अथवा सामान्य से विशेष का समर्थनरूप अर्थान्तरन्यास भी हो सकता हैं। इसमें आर्या छन्द है ॥११॥

**अर्थ—विदूषक—**अरे मित्र ! सन्ताप=दुःख करना व्यर्थ है । प्रियजनों को सम्पत्ति दे डालने वाले आपकी निर्धनता भी, देवताओं द्वारा पीने से शेष बचे हुये प्रतिपदा के चन्द्रमा की [ क्षीणता की ] भाँति, अत्यधिक अच्छी लग रही है ।

**टीका—**अलं सन्तापेन-सन्तापेन किमपि साध्यं नास्ति,–'गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका' इति तृतीया । प्रणयिजनेषु=प्रियजनेषु, संक्रमिताः=दया-दिना प्रदत्ताः, विभवाः=धनानि, येन, तस्य, ते=तव चारुदत्तस्य, परिक्षयः=निर्धन-ताऽपि, सुरलोकैः=देवैः पीतशेषस्य=भुक्तावशिष्टस्य, प्रतिपदः=प्रतिपदायाः, चन्द्रस्य

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