मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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प्रथमोऽङ्कः
चारु०—वयस्य ! न ममार्थान् प्रति दैन्यम् । पश्य—
एतत्तु मां दहति यद् गृहमस्मदीयं क्षीणार्थमित्यतिथयः परिवर्जयन्ति । संशुष्कसान्द्रमदलेखमिव भ्रमन्तः कालात्यये मधुकराः करिणः कपोलम् ॥१२॥
वस्तुतः प्रतिपच्चन्द्रस्याभावात् कृष्णचतुर्दशी-चन्द्रस्येवेति बोध्यम्, परिक्षयः=कला-क्षीणता, निर्धनत्वं च, रमणीयः=मनोहारी, प्रशंसनीय एवेति भावः ।
**विमर्श—**सुरजनपीतशेषस्य-पुराणादि में यह कथा वर्णित है कि कृष्णपक्ष में देवतागण चन्द्रमा की एक-एक कला का पान प्रतिदिन करते रहते हैं। इसलिये चतुर्दशी की रात्रि में वह अत्यन्त क्षीण हो जाता है। उसी का संकेत यहाँ किया गया है-प्रतिपच्चन्द्रस्येव । प्रतिपत् शब्द लाक्षणिक है क्योंकि प्रतिपत् को चन्द्रमा सर्वथा नहीं होता है।
**अन्वयः—**कालात्यये, करिणः, संशुष्कसान्द्रमदलेखम्, कपोलम्, भ्रमन्तः, मधुकराः, इव, अतिथयः, क्षीणार्थम्, इति, अस्मदीयम्, गृहम्, यत्, परिवर्जयन्ति, एतत्, तु, माम्, दहति ॥ १२ ॥
**शब्दार्थ—**कालात्यये=[ मदजल प्रवाहित होने का ] समय बीत जाने पर, करिणः=हाथी के, संशुष्कसान्द्रमदलेखम्=सूखी हुई गाढ़ी मदधारावाले, कपोलम्=गण्डस्थल को, भ्रमन्तः=घूमते हुये, मधुकराः=भौरों के, इव=समान, अतिथयः=अतिथिगण, क्षीणार्थम्=धन से रहित, इति=ऐसा [ सोंचकर ], अस्मदीयम्=मेरे [ चारुदत्त के ], गृहम्=घर को, यत्=जो, परिवर्जयन्ति=छोड़ देते हैं, एतत्=वह, तु=ही, माम्=मुझ [ चारुदत्त ] को, दहति=जला रहा है, अतिशय कष्ट दे रहा है ॥ १२ ॥
**अर्थ—चारुदत्त—**मित्र ! धन [ नष्ट हो जाने ] के विषय में मुझे कष्ट नहीं है। देखो—
[ मद जल बहने का ] समय बीत जाने पर हाथी की सूखी हुई गाढ़ी मदजल-धारा वाले गण्डस्थल को [ पूर्वकाल में उस पर ] मँडराने वाले भौरों के के समान अतिथि लोग 'धनहीन है' ऐसा सोंचकर मेरे घर को जो छोड़ देते हैं [ उसमें नहीं आते हैं ] यही मुझे जला रहा है, जलने के समान कष्ट दे रहा है। अर्थात् हाथी के सूखे मदजलरहित गण्डस्थल को छोड़कर भौंरे जैसे दूसरी जगह चले जाते हैं उसी प्रकार धनहीन मेरे घर को छोड़कर अतिथि लोग भी अन्यत्र चले जाते हैं । यह अतिथियों द्वारा छोड़ दिया जाना-मुझे जलने के समान कष्ट दे रहा है ॥ १२ ॥