भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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मृच्छकटिकम्

विदू०-भो वअस्स ! एदे खु दासीए पुत्ता अत्यकल्लवत्ता वरडाभीदा विअ गोबालदारआ अरण्णे जहिं जहिं ण खज्जन्ति - तहिं तहिं गच्छन्ति ।

( भो वयस्य ! एते खलु दास्याः पुत्रा अर्थकल्यवर्त्ताः, वरटाभीता इव गोपालदारका अरण्ये यस्मिन् यस्मिन् न खाद्यन्ते तस्मिन् तस्मिन् गच्छन्ति । )

टीका--कालात्यये=कालस्य = मदजलप्रवाहस्य समयस्य, अत्यये=अपगमे, करिणः=गजस्य, संशुष्क-सान्द्र-मदलेखम्=संशुष्काः = संशुष्कतामुपगताः, सान्द्राः=घनीभूताः, मदलेखाः = मदजलप्रवाहरेखाः यस्मिन् तम्, कपोलम्=गण्डस्थलम्, भ्रमन्तः = मदजलपानार्थमितस्ततो गच्छन्तः, मधुकराः = भ्रमराः, इव=तुल्यम्, अतिथयः=न विद्यते आगन्तुं तिथिः=निश्चितसमयो येषां ते, क्षीणार्थम्=धनरहितम्, इति=इत्थं विचिन्त्य, अस्मदीयम्=अस्माकम्, गृहम्=भवनम्, यत् परिवर्जयन्ति=परित्यजन्ति, एतत्=अतिथिकर्तृकगृहकर्मकवर्जनम्, तु=एव, माम्=तव मित्रं चारुदत्तम्, दहति=सन्तापयति । यथा पूर्वकाले मदजलव्याप्ते यत्र गजगण्डस्थले ये भ्रमराः भ्रमन्ति स्म त एव साम्प्रतं मदरहितं तं गजगण्डस्थलं विहायान्यत्र यथा व्रजन्ति तथैव मधुकरतुल्या अतिथयोऽपि धनशून्ये मम गृहे किमपि न लभ्यते इति विचार्य तत् परित्यज्य अन्यत्र गच्छन्ति इत्येव मां सन्तापयतीति भावः । उपमालंकारः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ।। १२ ।।

विमर्श--यहाँ उपमा अलंकार है। इसका उपमानोपमेयभाव विचारणीय है। अनेक व्याख्याकारों ने 'इव' का सम्बन्ध 'कपोलम्' के साथ किया है और सूखी, घनी मदजलधारा वाले हाथी के कपोल की तरह मेरे घर को छोड़ कर--इत्यादि अर्थ किया है। परन्तु मेरे अनुसार 'इव' का सम्बन्ध 'भ्रमराः' के साथ होना चाहिये और भ्रमरों को उपमान तथा अतिथियों को उपमेय मानकर यह अर्थ करना चाहिये--हाथी के सूखी मदजलधारा से रहित कपोल को भौंरे जैसे छोड़ कर अन्यत्र चले जाते हैं वैसे ही [ भौंरों के समान ] अतिथि जो पहले मेरे घर सदा आया करते थे, आज 'धनहीन' ऐसा सोच कर मेरे घर को छोड़ कर चले जाते हैं--यह अतिथियों द्वारा उपेक्षा करना ही मेरे लिये सन्तापकारक है। 'यत्' को गृहम् का विशेषण न मान कर 'परिवर्जयन्ति' क्रिया का विशेषण मानना चाहिये, यत् परिवर्जयन्ति, एतत् तु मा दहति । इसमें वसन्ततिलका छन्द है--

'उक्ता वसन्ततिलका त-भ-जा जगौ गः' ।। १२ ।।

अर्थ--विदूषक-मित्र ! दासीपुत्र [नीच], कलेवा [प्रातःकालीन स्वल्पाहार] के समान [ तुच्छ ] ये धन, बर्र से डरे हुये ग्वालों के समान, वहीं वहीं जाते हैं जहाँ-जहाँ खाये [ भोगे, काटे ] नहीं जाते हैं।