मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ४७
चारु०--वयस्य !
सत्यं न मे विभवनाशकृताऽस्ति चिन्ता भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति । एतत्तु मां दहति, नष्टधनाश्रयस्य यत् सौहृदादपि जनाः शिथिलीभवन्ति ॥१३॥
विमर्श-- जैसे बर्र से डरे हुये अहीरों के छोकरे भाग-भाग कर वहीं पहुँचते हैं जहाँ बर्र न काट सकें, उसी प्रकार ये नीच धन भी उसी के पास पहुँचते हैं जो इनका उपभोग नहीं करते हैं, अर्थात् कृपण के पास ही धन रहता है। दास्याः पुत्रः-समास है, गाली के लिये प्रयुक्त है। कल्ये=प्रातः काले वर्तन्ते ए-भिरिति कल्यवर्ताः=प्रातराशाः, अर्था एव कल्यवर्ताः--धनरूपी नास्ता। वरटा-भीताः=वरटा=दंशक कीट-विशेषः, ताभ्यः भीताः=भयग्रस्ताः गोपालदारकाः=गोपालानाम्=आभीराणाम् दारकाः=पुत्राः । खाद्यन्ते-इसके दो अर्थ हैं -गोपाल-दारकों के पक्ष में-काटे जाते हैं-और 'अर्थकल्यवर्त्त' के पक्ष में 'उपभोग किये जाते हैं।' गोपालदारक जैसे काटने वाले बर्र से छिपते हैं उसी प्रकार धन भी उपभोग करने वाले से छिपते हैं, कृपण के पास सुरक्षित रहते हैं।
अन्वयः-- विभवनाशकृता, चिन्ता, मे, न, अस्ति [इति], सत्यम्, हि, धनानि, भाग्यक्रमेण, भवन्ति, यान्ति ( च ) तु, जनाः, नष्टधनाश्रयस्य, सौहृदाद्, अपि, यत्, शिथिलीभवन्ति, एतत्, तु, माम्, दहति ॥ १३ ॥
शब्दार्थ-- विभवनाशकृता=धन के विनाश से उत्पन्न, चिन्ता=मानसिक क्लेश, मे=मुझे [ चारुदत्त को ], न=नहीं, अस्ति=है, [ इति=यह ], सत्यम्=सच [ समझो ], हि=क्योंकि, धनानि=धन सम्पत्ति, भाग्यक्रमेण=भाग्यचक्र के अनुसार, भवन्ति=[ प्राप्त ] होते हैं, [ च=और ] यान्ति=चले जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। तु=किन्तु, जनाः=लोग, नष्टधनाश्रयस्य=धन के आश्रय से हीन=निर्धन [ मुझ चारुदत्त ] की, सौहृदात्=मित्रता से, अपि=भी, यत्=जो, शिथिलीभवन्ति=ढीले पड़ने लगते हैं, विमुख होने लगते हैं, एतत्=वह, माम्=मुझ चारुदत्त को, दहति=सन्तप्त कर रहा है ॥ १३ ॥
अर्थ--चारुदत्त-मित्र !
धन के विनाश से होने वाली चिन्ता मुझे नहीं है, यह सच है, क्योंकि धन [ तो ] भाग्यक्रम से [ प्राप्त ] होते हैं और चले जाते हैं। किन्तु लोग धन और आश्रय से हीन अथवा धन रूपी आश्रय से हीन=निर्धन व्यक्ति [ चारुदत्त ] की मित्रता से भी जो मुख मोड़ने लगते हैं, वह मुझ [ चारुदत्त ] को सन्ताप दे रहा है ॥ १३ ॥
टीका-- धनाभावे मित्रताया अभाव एवं चिन्ताकारणमिति प्रतिपादयति - विभवनाशकृता = धनादिनाशोत्पन्ना, चिन्ता = मानसिकक्लेशः, मे = मम=