मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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प्रथमोऽङ्कः
विदू०-- भो वअस्स ! मरणादो दलिद्दादो वा कदरं दे रोअदि । ( भो वयस्य ! मरणात् दारिद्र्याद्वा कतरत् ते रोचते ? )
चारु०-- वयस्य !
दारिद्र्यान्मरणाद्वा मरणं मम रोचते न दारिद्र्यम् ।
अल्पक्लेशं मरणं दारिद्र्यमनन्तकं दुःखम् ॥११॥
यहाँ अप्रस्तुत व्यक्तिसामान्य के कथन से प्रस्तुत चारुदत्तरूप व्यक्तिविशेष का ज्ञान होता है, अतः अप्रस्तुतप्रशंसा है। 'इव' पद के श्रवण से पूर्वार्द्ध में श्रौती उपमा है। मृतः स जीवति-इसमें विरोधाभास है, इसका परिहार करने के लिये मृतः का अर्थ-किसी कार्य करने के योग्य नहीं है - ऐसा करना चाहिये। इसमें वंशस्थ छन्द है। इसका लक्षण है-जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ ॥ १० ॥
अर्थ--विदूषक- हे मित्र ! मृत्यु और दरिद्रता में आपको कौन [ अधिक ] अच्छा लगता है ?
अन्वयः-- दारिद्र्यात्, मरणात् वा, मम, मरणम्, रोचते, दारिद्र्यम्, न, [ रोचते, यतः ] मरणम्, अल्पक्लेशम्, दारिद्र्यम्, [ च ] अनन्तकम्, दुःखम्, [ अस्ति ] ॥ ११॥
शब्दार्थ-- दारिद्र्यात्=दरिद्रता से, वा=अथवा, मरणाद्=मरने से, अर्थात् दरिद्रता और मरण में से, मम=मुझ चारुदत्त को, मरणम्=मृत्यु, रोचते=अधिक अच्छी लगती है, न=न कि, दारिद्र्यम्=दरिद्रता, [ यतः=क्योंकि ] मरणम्=मरना, अल्पक्लेशम्=थोड़े समय तक कष्ट देने वाला है, [ च=और ] दारिद्र्यम्=दरिद्रता, अनन्तकम्=कभी भी न समाप्त होने वाला, दुःखम्=कष्ट, [ है ] ॥११॥
अर्थ--चारुदत्त-- मित्र !
दरिद्रता अथवा मृत्यु [ दोनों को देखकर इन ] में से मुझे मरना अच्छा लगता है न कि दरिद्र होना। क्योंकि मरना कम समय कष्ट देने वाला है अर्थात् कुछ समय ही मृत्युकष्ट का अनुभव होता है, किन्तु दरिद्रता कभी भी न समाप्त होने वाला कष्ट है ॥ ११ ॥
टीका-- दरिद्रतापेक्षया मृत्युमेव अभीष्टं प्रतिपादयति-दारिद्र्यात्=निर्धनत्वात्, मरणात्=प्राणत्यागात्, वा, दैन्यमरणयोर्मध्ये इति भावः, (अत्र 'अवलोक्य' इत्यादिकं ल्यबन्तं मत्वा 'ल्यब्लोपे पञ्चमी' इति पञ्चमी, तेन दारिद्र्यम् अवलोक्य, 'निर्धनत्वम् अवलोक्य, चार्थे वा, उभौ विलोक्य उभयोर्मध्ये इत्यर्थः। अन्यथा पञ्चम्युपपत्तिर्दुः-साध्येति बोध्यम् ।) मम=मह्यम्, मरणम्=प्राणत्यागः, रोचते=रुचिकरं भवति,
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विदू०—भो वअस्स ! अलं सन्तावेण । पणइअणसंकामिदविहवस्स सुरलो-अपीदसेसस्स पडिवच्चंदस्स विअ परिक्खओ वि दे अहिअदरं रमणीओ । ( भो वयस्य ! अलं सन्तापेन । प्रणयिजनसंक्रामितविभवस्य सुरलोकपीतशेषस्य प्रतिपच्चन्द्रस्य इव परिक्षयोऽपि ते अधिकतरं रमणीयः । )
न=न तु, दारिद्र्यम् = निर्धनता; मरणम् = प्राणत्यागः, अल्पक्लेशम् = अल्पः=अल्पकालिकःक्लेशो यस्मिन् तत् तादृशम्, अल्पकालिकक्लेशप्रदमित्यर्थः, दारिद्र्यम्=दरिद्रता, च, अनन्तकम्= न विद्यते अन्तः समाप्तिर्यस्य तत्, सकलजीवनपर्यन्तम्, दुःखम्= कष्टम्, भरणं तु किञ्चित्कालपर्यन्तमेव दुःखं ददाति, प्राणत्यागानन्तरं न दुःखम् । किन्तु दरिद्रता तु यावज्जीवं सर्वदैव कष्टदायिनी एव भवतीति एतदपेक्षया मरणमेव प्रशस्यतरं मन्यते इति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः । आर्या वृत्तम् ॥११॥
**विमर्श—**पहले अपने सुखी जीवन के बाद दुःख का अनुभव करने वाला चारुदत्त निर्धनता को मृत्यु से भी निकृष्टतर मानता है। मरते समय जो कष्ट होता है वही अन्तिम कष्ट होता है किन्तु दरिद्रता के कारण तो जीवन भर कष्ट भोगना पड़ता है। दारिद्र्यात् मरणाद् वा--- इनमें पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग चिन्तनीय है। ल्यबन्त क्रियापद का लोप मानकर 'ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च' इससे पञ्चमी सम्भव है—दारिद्र्यं विलोक्य मरणं वा विलोक्य, अथवा 'विचार्या' आदि उपयुक्त क्रियापद का सम्बन्ध मान लेना चाहिये। मम रोचते---यहाँ 'रुच्यर्थानां प्रीयमाणः' [पा० सू० १।४।४३] के अनुसार षष्ठी न होकर चतुर्थी होनी चाहिये-मह्यं रोचते । परन्तु षष्ठी प्रबल विभक्ति है—सम्बन्ध-सामान्य की विवक्षा और अन्य कारकों की अविवक्षा में सर्वत्र षष्ठी सम्भव है—'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव ।' यह प्रसिद्ध नियम है।
इस श्लोक में पूर्वार्द्ध के अर्थ के प्रति उत्तरार्द्ध का कथन हेतु है अतः काव्य-लिङ्ग अलंकार है—हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गं निगद्यते । अथवा सामान्य से विशेष का समर्थनरूप अर्थान्तरन्यास भी हो सकता हैं। इसमें आर्या छन्द है ॥११॥
**अर्थ—विदूषक—**अरे मित्र ! सन्ताप=दुःख करना व्यर्थ है । प्रियजनों को सम्पत्ति दे डालने वाले आपकी निर्धनता भी, देवताओं द्वारा पीने से शेष बचे हुये प्रतिपदा के चन्द्रमा की [ क्षीणता की ] भाँति, अत्यधिक अच्छी लग रही है ।
**टीका—**अलं सन्तापेन-सन्तापेन किमपि साध्यं नास्ति,–'गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका' इति तृतीया । प्रणयिजनेषु=प्रियजनेषु, संक्रमिताः=दया-दिना प्रदत्ताः, विभवाः=धनानि, येन, तस्य, ते=तव चारुदत्तस्य, परिक्षयः=निर्धन-ताऽपि, सुरलोकैः=देवैः पीतशेषस्य=भुक्तावशिष्टस्य, प्रतिपदः=प्रतिपदायाः, चन्द्रस्य
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प्रथमोऽङ्कः
चारु०—वयस्य ! न ममार्थान् प्रति दैन्यम् । पश्य—
एतत्तु मां दहति यद् गृहमस्मदीयं क्षीणार्थमित्यतिथयः परिवर्जयन्ति । संशुष्कसान्द्रमदलेखमिव भ्रमन्तः कालात्यये मधुकराः करिणः कपोलम् ॥१२॥
वस्तुतः प्रतिपच्चन्द्रस्याभावात् कृष्णचतुर्दशी-चन्द्रस्येवेति बोध्यम्, परिक्षयः=कला-क्षीणता, निर्धनत्वं च, रमणीयः=मनोहारी, प्रशंसनीय एवेति भावः ।
**विमर्श—**सुरजनपीतशेषस्य-पुराणादि में यह कथा वर्णित है कि कृष्णपक्ष में देवतागण चन्द्रमा की एक-एक कला का पान प्रतिदिन करते रहते हैं। इसलिये चतुर्दशी की रात्रि में वह अत्यन्त क्षीण हो जाता है। उसी का संकेत यहाँ किया गया है-प्रतिपच्चन्द्रस्येव । प्रतिपत् शब्द लाक्षणिक है क्योंकि प्रतिपत् को चन्द्रमा सर्वथा नहीं होता है।
**अन्वयः—**कालात्यये, करिणः, संशुष्कसान्द्रमदलेखम्, कपोलम्, भ्रमन्तः, मधुकराः, इव, अतिथयः, क्षीणार्थम्, इति, अस्मदीयम्, गृहम्, यत्, परिवर्जयन्ति, एतत्, तु, माम्, दहति ॥ १२ ॥
**शब्दार्थ—**कालात्यये=[ मदजल प्रवाहित होने का ] समय बीत जाने पर, करिणः=हाथी के, संशुष्कसान्द्रमदलेखम्=सूखी हुई गाढ़ी मदधारावाले, कपोलम्=गण्डस्थल को, भ्रमन्तः=घूमते हुये, मधुकराः=भौरों के, इव=समान, अतिथयः=अतिथिगण, क्षीणार्थम्=धन से रहित, इति=ऐसा [ सोंचकर ], अस्मदीयम्=मेरे [ चारुदत्त के ], गृहम्=घर को, यत्=जो, परिवर्जयन्ति=छोड़ देते हैं, एतत्=वह, तु=ही, माम्=मुझ [ चारुदत्त ] को, दहति=जला रहा है, अतिशय कष्ट दे रहा है ॥ १२ ॥
**अर्थ—चारुदत्त—**मित्र ! धन [ नष्ट हो जाने ] के विषय में मुझे कष्ट नहीं है। देखो—
[ मद जल बहने का ] समय बीत जाने पर हाथी की सूखी हुई गाढ़ी मदजल-धारा वाले गण्डस्थल को [ पूर्वकाल में उस पर ] मँडराने वाले भौरों के के समान अतिथि लोग 'धनहीन है' ऐसा सोंचकर मेरे घर को जो छोड़ देते हैं [ उसमें नहीं आते हैं ] यही मुझे जला रहा है, जलने के समान कष्ट दे रहा है। अर्थात् हाथी के सूखे मदजलरहित गण्डस्थल को छोड़कर भौंरे जैसे दूसरी जगह चले जाते हैं उसी प्रकार धनहीन मेरे घर को छोड़कर अतिथि लोग भी अन्यत्र चले जाते हैं । यह अतिथियों द्वारा छोड़ दिया जाना-मुझे जलने के समान कष्ट दे रहा है ॥ १२ ॥
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मृच्छकटिकम्
विदू०-भो वअस्स ! एदे खु दासीए पुत्ता अत्यकल्लवत्ता वरडाभीदा विअ गोबालदारआ अरण्णे जहिं जहिं ण खज्जन्ति - तहिं तहिं गच्छन्ति ।
( भो वयस्य ! एते खलु दास्याः पुत्रा अर्थकल्यवर्त्ताः, वरटाभीता इव गोपालदारका अरण्ये यस्मिन् यस्मिन् न खाद्यन्ते तस्मिन् तस्मिन् गच्छन्ति । )
टीका--कालात्यये=कालस्य = मदजलप्रवाहस्य समयस्य, अत्यये=अपगमे, करिणः=गजस्य, संशुष्क-सान्द्र-मदलेखम्=संशुष्काः = संशुष्कतामुपगताः, सान्द्राः=घनीभूताः, मदलेखाः = मदजलप्रवाहरेखाः यस्मिन् तम्, कपोलम्=गण्डस्थलम्, भ्रमन्तः = मदजलपानार्थमितस्ततो गच्छन्तः, मधुकराः = भ्रमराः, इव=तुल्यम्, अतिथयः=न विद्यते आगन्तुं तिथिः=निश्चितसमयो येषां ते, क्षीणार्थम्=धनरहितम्, इति=इत्थं विचिन्त्य, अस्मदीयम्=अस्माकम्, गृहम्=भवनम्, यत् परिवर्जयन्ति=परित्यजन्ति, एतत्=अतिथिकर्तृकगृहकर्मकवर्जनम्, तु=एव, माम्=तव मित्रं चारुदत्तम्, दहति=सन्तापयति । यथा पूर्वकाले मदजलव्याप्ते यत्र गजगण्डस्थले ये भ्रमराः भ्रमन्ति स्म त एव साम्प्रतं मदरहितं तं गजगण्डस्थलं विहायान्यत्र यथा व्रजन्ति तथैव मधुकरतुल्या अतिथयोऽपि धनशून्ये मम गृहे किमपि न लभ्यते इति विचार्य तत् परित्यज्य अन्यत्र गच्छन्ति इत्येव मां सन्तापयतीति भावः । उपमालंकारः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ।। १२ ।।
विमर्श--यहाँ उपमा अलंकार है। इसका उपमानोपमेयभाव विचारणीय है। अनेक व्याख्याकारों ने 'इव' का सम्बन्ध 'कपोलम्' के साथ किया है और सूखी, घनी मदजलधारा वाले हाथी के कपोल की तरह मेरे घर को छोड़ कर--इत्यादि अर्थ किया है। परन्तु मेरे अनुसार 'इव' का सम्बन्ध 'भ्रमराः' के साथ होना चाहिये और भ्रमरों को उपमान तथा अतिथियों को उपमेय मानकर यह अर्थ करना चाहिये--हाथी के सूखी मदजलधारा से रहित कपोल को भौंरे जैसे छोड़ कर अन्यत्र चले जाते हैं वैसे ही [ भौंरों के समान ] अतिथि जो पहले मेरे घर सदा आया करते थे, आज 'धनहीन' ऐसा सोच कर मेरे घर को छोड़ कर चले जाते हैं--यह अतिथियों द्वारा उपेक्षा करना ही मेरे लिये सन्तापकारक है। 'यत्' को गृहम् का विशेषण न मान कर 'परिवर्जयन्ति' क्रिया का विशेषण मानना चाहिये, यत् परिवर्जयन्ति, एतत् तु मा दहति । इसमें वसन्ततिलका छन्द है--
'उक्ता वसन्ततिलका त-भ-जा जगौ गः' ।। १२ ।।
अर्थ--विदूषक-मित्र ! दासीपुत्र [नीच], कलेवा [प्रातःकालीन स्वल्पाहार] के समान [ तुच्छ ] ये धन, बर्र से डरे हुये ग्वालों के समान, वहीं वहीं जाते हैं जहाँ-जहाँ खाये [ भोगे, काटे ] नहीं जाते हैं।
प्रथमोऽङ्कः ४७
चारु०--वयस्य !
सत्यं न मे विभवनाशकृताऽस्ति चिन्ता भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति । एतत्तु मां दहति, नष्टधनाश्रयस्य यत् सौहृदादपि जनाः शिथिलीभवन्ति ॥१३॥
विमर्श-- जैसे बर्र से डरे हुये अहीरों के छोकरे भाग-भाग कर वहीं पहुँचते हैं जहाँ बर्र न काट सकें, उसी प्रकार ये नीच धन भी उसी के पास पहुँचते हैं जो इनका उपभोग नहीं करते हैं, अर्थात् कृपण के पास ही धन रहता है। दास्याः पुत्रः-समास है, गाली के लिये प्रयुक्त है। कल्ये=प्रातः काले वर्तन्ते ए-भिरिति कल्यवर्ताः=प्रातराशाः, अर्था एव कल्यवर्ताः--धनरूपी नास्ता। वरटा-भीताः=वरटा=दंशक कीट-विशेषः, ताभ्यः भीताः=भयग्रस्ताः गोपालदारकाः=गोपालानाम्=आभीराणाम् दारकाः=पुत्राः । खाद्यन्ते-इसके दो अर्थ हैं -गोपाल-दारकों के पक्ष में-काटे जाते हैं-और 'अर्थकल्यवर्त्त' के पक्ष में 'उपभोग किये जाते हैं।' गोपालदारक जैसे काटने वाले बर्र से छिपते हैं उसी प्रकार धन भी उपभोग करने वाले से छिपते हैं, कृपण के पास सुरक्षित रहते हैं।
अन्वयः-- विभवनाशकृता, चिन्ता, मे, न, अस्ति [इति], सत्यम्, हि, धनानि, भाग्यक्रमेण, भवन्ति, यान्ति ( च ) तु, जनाः, नष्टधनाश्रयस्य, सौहृदाद्, अपि, यत्, शिथिलीभवन्ति, एतत्, तु, माम्, दहति ॥ १३ ॥
शब्दार्थ-- विभवनाशकृता=धन के विनाश से उत्पन्न, चिन्ता=मानसिक क्लेश, मे=मुझे [ चारुदत्त को ], न=नहीं, अस्ति=है, [ इति=यह ], सत्यम्=सच [ समझो ], हि=क्योंकि, धनानि=धन सम्पत्ति, भाग्यक्रमेण=भाग्यचक्र के अनुसार, भवन्ति=[ प्राप्त ] होते हैं, [ च=और ] यान्ति=चले जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। तु=किन्तु, जनाः=लोग, नष्टधनाश्रयस्य=धन के आश्रय से हीन=निर्धन [ मुझ चारुदत्त ] की, सौहृदात्=मित्रता से, अपि=भी, यत्=जो, शिथिलीभवन्ति=ढीले पड़ने लगते हैं, विमुख होने लगते हैं, एतत्=वह, माम्=मुझ चारुदत्त को, दहति=सन्तप्त कर रहा है ॥ १३ ॥
अर्थ--चारुदत्त-मित्र !
धन के विनाश से होने वाली चिन्ता मुझे नहीं है, यह सच है, क्योंकि धन [ तो ] भाग्यक्रम से [ प्राप्त ] होते हैं और चले जाते हैं। किन्तु लोग धन और आश्रय से हीन अथवा धन रूपी आश्रय से हीन=निर्धन व्यक्ति [ चारुदत्त ] की मित्रता से भी जो मुख मोड़ने लगते हैं, वह मुझ [ चारुदत्त ] को सन्ताप दे रहा है ॥ १३ ॥
टीका-- धनाभावे मित्रताया अभाव एवं चिन्ताकारणमिति प्रतिपादयति - विभवनाशकृता = धनादिनाशोत्पन्ना, चिन्ता = मानसिकक्लेशः, मे = मम=
४८ | मृच्छकटिकम्
अपि च--दारिद्र्याद्ध्रियमेति, ह्रीपरिगतः प्रभ्रश्यते तेजसो निस्तेजाः परिभूयते, परिभवान्निर्वेदमापद्यते । निर्विण्णः शुचमेति, शोकपिहितो बुद्ध्या परित्यज्यते निर्बुद्धिः क्षयमेत्यहो निधनता सर्वापदामस्पदम् ॥१४॥
चारुदत्तस्य, न=नैव, अस्ति=वर्तते, इति, सत्यम्=तथ्यम् जानीहीति शेषः। हि=यतः, धनानि=वित्तादीनि, भवन्ति=आयान्ति, यान्ति=विनश्यन्ति, च। तदा कस्मात् कारणात् चिन्तयसि-अत आह--जनाः=लोकाः, नष्टधनाश्रयस्य = नष्टः=समाप्तः धनरूपः आश्रयः=अवलम्बनं यस्य सः तस्य, यद्वा धनम् च आश्रयः च=गृहादिकं च-इति धनाश्रयौ, नष्टौ धनाश्रयौ यस्य तस्य धनाश्रयरहितस्येत्यर्थः, मम चारुदत्तस्य अन्यस्य च निर्धनस्येति भावः, सौहृदात्=मित्रत्वात् अपि, यत्, शिथिलीभवन्ति = शैथिल्यमुपगच्छन्ति, विमुखीभवन्तीति भावः, एतत्=पूर्वोक्त-शिथिलीभवनमेव, माम्=चारुदत्तम्, दहति=सन्तापयति ॥ काव्यलिङ्गमलङ्कारः। वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ १३ ॥
**विमर्श—सत्यम्--**सामान्यतया धनहानि के कारण लोग चिन्तित होने लगते हैं, अपने बारे में उसका खण्डन करते हुये चारुदत्त कहता है कि धननाश के कारण मेरी चिन्ता नहीं हो रही है, क्योंकि धनी होना या निर्धन हो जाना यह सब तो भाग्य का खेल है। मेरी चिन्ता का कारण यह है कि जो लोग धन रहने पर सदैव मित्र बन कर साथ साथ रहा करते थे वे ही, धन नष्ट हो जाने पर मित्रता से भी मुँह मोड़ने लगते हैं, मित्रता भी छोड़ने लगते हैं—यही मेरी चिन्ता का कारण है। नष्टधनाश्रयस्य=धनरूपः आश्रयः धनाश्रयः, नष्टो धनाश्रयः यस्य तस्य—यह विग्रह है अथवा धनं च आश्रयः च=अवलम्बनं गृहादिकञ्च इति धनाश्रयौ, नष्टौ धनाश्रयौ यस्य सः तस्य-यह विग्रह भी सम्भव है। सौहृदात्-शोभनं हृदयं यस्य सः-इस अर्थ में बहुव्रीहि करने पर "सुहृद्-दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः" [पा. सू. ५।४।१५०] से हृदय का हृद् आदेश होने पर सुहृद्=मित्र शब्द सिद्ध होता है। सुहृदः भावः--इस अर्थ में अण् प्रत्यय करने पर "हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्वपदस्य च" (पा. सू. ७।३।१९) से उभयपद-वृद्धि होने से 'सौहार्दम्' यह रूप पाणिनि-सम्मत है। परन्तु संस्कृत साहित्य में 'सौहृद' शब्द का प्रचुर प्रयोग देख कर इसमें केवल आदिवृद्धि की ही कल्पना करनी चाहिये। शिथिलीभवन्ति--यहाँ अभूततद्भाव में च्वि प्रत्यय करके रूप बनता है। इसमें काव्यलिङ्ग अलङ्कार और वसन्ततिलका छन्द है ॥१३॥
अन्वयः--(नरः), दारिद्र्यात्, ह्रियम्, एति, ह्रीपरिगतः, तेजसः, प्रभ्रश्यते, निस्तेजाः, परिभूयते, परिभवात्, निर्वेदम्, आपद्यते, निर्विण्णः, शुचम्, एति, शोकपिहितः, बुद्ध्या, परित्यज्यते, निर्बुद्धिः, क्षयम्, एति, अहो, निधनता, सर्वापदाम्, आस्पदम् ॥ १४ ॥
प्रथमोऽङ्कः ४६
शब्दार्थ—[नरः = मनुष्य], दारिद्र्यात् = दरिद्रता के कारण, ह्रियम् = लज्जाको, एति = प्राप्त करता है, ह्रीपरिगतः = लज्जित [ व्यक्ति ], तेजसः = तेज से, प्रभ्रश्यते = भ्रष्ट हो जाता है, निस्तेज हो जाता है, निस्तेजाः = तेजहीन, परिभूयते = अपमानित होता है, परिभवात् = अपमान के कारण, निर्वेदम् = ग्लानि को, आपद्यते = प्राप्त करता है, निर्विष्णः = ग्लानियुक्त, शुचम् = शोक को, एति = प्राप्त करता है, शोकपिहितः = शोक से व्याकुल, [ व्यक्ति ] बुद्ध्या = विवेक के द्वारा, परित्यज्यते = छोड़ दिया जाता है, निर्बुद्धिः = बुद्धिहीन, क्षयम् = विनाश, को, एति = प्राप्त करता है, अहो ! = आश्चर्य है, निधनता = दरिद्रता, सर्वापदाम् = समस्त आपत्तियों का, आस्पदम् = स्थान [ अस्ति = है ] । १४ ।।
**अर्थ—**दरिद्रता के कारण [ व्यक्ति ] लज्जा को प्राप्त करता है [ सर्वत्र लज्जित होता है ]; लज्जित [ व्यक्ति ] तेज से भ्रष्ट हो जाता है [ निस्तेज हो जाता है ], तेजहीन [ व्यक्ति ] अपमानित होता है, अपमान से ग्लानि प्राप्त करता है, ग्लानियुक्त [व्यक्ति] शोक प्राप्त करता है, शोकाकुल [व्यक्ति] को बुद्धि = विवेक द्वारा त्याग दिया जाता है, बुद्धिहीन = अविवेकी विनाश को प्राप्त करता है । अहो ! निर्धनता (गरीबी) समस्त आपत्तियों का निवासस्थल है । [सभी विपत्तियों का मूल कारण निर्धनता ही है ] ।। १४ ।।
**टीका—**दारिद्र्यस्य सर्वविपत्तिमूलत्वमाह—दारिद्र्येति । ( मनुष्यः ) दारिद्र्यात् = निर्धनत्वात्, ह्रियम् = लज्जाम्, एति = प्राप्नोति, लज्जितो भवतीत्यर्थः, ह्रीपरिगतः = ह्रिया = लज्जया, परिगतः = युक्तः = लज्जितः, तेजसः = प्रतापात्, प्रभ्रश्यते = प्रभ्रष्टो भवति, निस्तेजाः जायते इत्यर्थः, निस्तेजाः = तेजःशून्यः, परिभूयते = तिरस्क्रियते, सर्वैरिति भावः, परिभवात् = तिरस्कारात्, निर्वेदम् = ग्लानिम्, आपद्यते = सर्वतः प्राप्नोति, निर्विष्णः = ग्लानियुक्तः, खिन्नमनाः, शुचम् = शोकम्, एति = गच्छति, शोकपिहितः = शोकेन = दुःखेन पिहितः = युक्तः, दुःखीत्यर्थः, बुद्ध्या = विवेकेन, परित्यज्यते = परिहीयते, कर्तव्याकर्तव्य विवेकशून्यो भवतीत्यर्थः, निर्बुद्धिः = विवेकशून्यः, क्षयम् = विनाशम्, एति = गच्छति, अहो ! इति आश्चर्यसूचकमव्ययम्, निधनता = दरिद्रता, धनहीनता, सर्वापदाम् = सकलापत्तीनाम्, आस्पदम् = आश्रयः, मूलकारणं वेति । एवञ्च दरिद्रताया प्रभावोऽवर्णनीय इति बोध्यम् । कारणमाला अलङ्कारः, शार्दूलविक्रीडितं छन्दः ।।१४।।
विमर्श—निर्विष्णः—निर् + √ विद् + क्त । द् तथा त के स्थानों पर न्, न आदेश और णत्व होता है । निधनता—यहाँ छन्द की दृष्टि से 'निर्' के अर्थ में 'नि' उपसर्ग है—निवृत्तं धनं यस्मात् सः = निधनः, तस्य भावः-इस अर्थ में तल् प्रत्यय होता है । अतः निधनता = निर्धनता पर्याय हैं । निर्बुद्धिः क्षयमेति—इसका आधार गीता का वचन है—"बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ।" ( गीता २।६३ )
४ मृ०
५० मृच्छकटिकम्
विदू०—भो वअस्स ! तं ज्जेव अत्थकल्लवत्तं सुमरिअ अलं सन्तप्पिदेण ।
( भो वयस्य ! तमेव अर्थकल्यवत्तं स्मृत्वा अलं सन्तापितेन । )
चारु०—वयस्य ! दारिद्र्यं हि पुरुषस्य—
निवासश्चिन्तायाः परपरिभवो वैरमपरं
जुगुप्सा मित्राणां स्वजनजनविद्वेषकरणम् ।
वनं गन्तुं बुद्धिर्भवति च कलत्रात् परिभवो
हृदिस्थः शोकाग्निर्न च दहति सन्तापयति च ॥१५॥
यहाँ उत्तर उत्तर वाक्यार्थ के प्रति पूर्व पूर्व वाक्यार्थ के हेतु बन जाने से कारणमाला अलंकार है—
परं परं प्रति यदा पूर्वपूर्वस्य हेतुता ।
तदा कारणमाला स्यात् ।। साहित्यदर्पण १०।७६
इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है—लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तता सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् ।। १४ ।।
**अर्थ—विदूषक—**हे मित्र ! उसी धनरूपी कलेवा ( क्षणभंगुर पदार्थ ) का स्मरण करके चिन्ता करना व्यर्थ है ।
अन्वयः—[ हि दारिद्र्यं पुरुषस्य-इति पूर्वोक्तगद्यभागेनान्वयः ] चिन्तायाः, निवासः, परपरिभवः, अपरम्, वैरम्, मित्राणाम्, जुगुप्सा, स्वजनजन-विद्वेष-करणम्, कलत्रात्, परिभवः, भवति, [ अतः ] वनम्, गन्तुम्, बुद्धिः, च, भवति, हृदिस्थः, शोकाग्निः, न, दहति, सन्तापयति, च, ।। १५ ।।
शब्दार्थ—[ हि = क्योंकि, दारिद्र्यम् = दरिद्रता, पुरुषस्य=मनुष्य की—इसको मिलाकर श्लोक का अर्थ करना चाहिये ] चिन्तायाः=चिन्ता का, निवासः=रहने का घर ( है ), परपरिभवः=दूसरों के द्वारा किया जानेवाला अनादर अथवा महान् अपमान है, अपरम्=दूसरी, विलक्षण, वैरम्=शत्रुता, ( है ) मित्राणाम्=मित्रों की, जुगुप्सा=घृणा ( है ), स्व-जन-जन-विद्वेष-करणम्=अपने बन्धुओं तथा अन्य लोगों के साथ होने वाले विद्वेष का कारण है, च=और, कलत्रात्=स्त्री से ( होने वाला ), परिभवः=तिरस्कार है, ( अतः=इस लिये ), वनम्=वन को, गन्तुम्=जाने के लिये, बुद्धिः=ज्ञान, विचार, होता है, हृदिस्थः=हृदय में रहने वाली, शोकाग्निः=शोकरूपी आग, न=नहीं, दहति=जलाती है, च=किन्तु, सन्ताप-यति=सन्ताप देती रहती है ।। १५ ।।
अर्थ—चारुदत्त—दरिद्रता पुरुष की —
[ निर्धनता पुरुषों की ] चिन्ता का घर ( निवासस्थान ) है; दूसरों के द्वारा किया जाने वाला अनादर अथवा महान् अपमान है; दूसरी=विलक्षण
प्रथमोऽङ्कः ५१
शत्रुता है, मित्रों की घृणा ( की जनक ) है, अपने बन्धु-बान्धवों तथा अन्य लोगों के विद्वेष का कारण है; पत्नी से [ होने वाला ] तिरस्कार है, ( अतः ), वन जाने की इच्छा होती है, हृदय में स्थित शोकरूपी आग [ पूरी तरह ] जला नहीं डालती है, अपितु तपाती रहती है [ अर्थात् धीरे-धीरे तपा तपा कर प्राण लेती रहती है । ] ।। १५ ।।
टीका-- ( हि=यतः, दारिद्र्यम्=निर्धनत्वम्, पुरुषस्य=मनुष्यस्य-इति गद्य-भागेनान्वयः -) चिन्तायाः=मम जीवननिर्वाहः कथं स्यादित्येवंरूपायाः मानसिकव्यथायाः, निवासः=आश्रयः=निवासस्थानम्; परपरिभवः=परेषाम्=शत्रूणाम् परिभवः=शत्रुकर्तृकतिरस्कारः, यद्वा परः=उत्कृष्टः, परिभवः=तिरस्कारः इति कर्मधारयः; अपरम्=अन्यत्, विलक्षणम्, निकृष्टम् वा, वैरम्=शत्रुत्वम्, निर्धनं प्रति सर्वेषां वैरं दृश्यते, मित्राणाम्=सुहृदाम्, जुगुप्सा=घृणा, तत्कारणम्, उपकारासमर्थत्वादिति भावः, स्वजन-जन-विद्वेष-करणम् = स्वजनानाम् = आत्मीय-बन्धूनाम्, जनानाम्=अन्येषां च जनानाम् विद्वेषस्य=विरोधस्य, करणम्=उत्पादकम्, कलत्रात्=भार्यायाः, परिभवः=अनादरः, च=तस्मात्, चो हेतौ बोध्यः, वनम्=अरण्यम्, गन्तुम्=यातुम्, बुद्धिः=ज्ञानम् विचारो वा, भवति=उत्पद्यते, हृदिस्थः=हृदये दन्दह्यमानः, शोकाग्निः = दुःखाग्निः ( शोकरूपोऽग्निर्नतु शोकस्य अग्निः, भेदाभावात् षष्ठ्यनुपपत्तेरिति बोध्यम्, ) न=नैव, दहति=भस्मसातकरोति, च=किन्तु, अत्र चस्त्वर्थे बोध्यः, सन्तापयति=भृशं सन्तापं समुत्पादयन् व्यथयतीति भावः । अत्र मालारूपकमलंकारः इति पृथ्वीधरः । शिखरिणी वृत्तम् -रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभला गः शिखरिणी ।। १५ ।।
विमर्श--इस श्लोक में दरिद्रता के विभिन्न रूपों का चित्रण किया गया है । जुगुप्सा--निन्दा, परन्तु इसका प्रयोग घृणा अर्थ में अधिक होता है । √गुप् से 'गुपेर्निन्दायाम्' वार्त्तिक के अनुसार "गुप्-तिज्-किद्भ्यः सन्" ( पा० सू० ३।१।५ ) से सन् प्रत्यय और द्वित्वादि कार्य होने पर 'जुगुप्स' होता है, इस स्थिति में 'अ' प्रत्यय करके स्त्रीलिङ्ग में टाप्=आ होता है जुगुप्स + अ + आ । परपरिभवः - शत्रुओ द्वारा होने वाला अपमान अथवा महान् अपमान ये दोनों अर्थ हो सकते हैं । स्त्री से परिभव होना वनगमनबुद्धि का कारण है । अतः वाक्ययोजना बदल लेनी चाहिये । दहति और सन्तापयति ये क्रियापद महत्त्वपूर्ण हैं । शोकाग्नि दरिद्र को काष्ठ आदि के तुल्य जलाकर भस्म नहीं करती है अपि तु पानी आदि की तरह उसे सन्तप्त कर के धीरे धीरे घुटन के साथ मारती रहती है । एक दारिद्र्य का विभिन्नरूपों से उल्लेख होने से उल्लेख अलंकार है । शोकाग्निः=शोकरूपी आग--रूपक है । अग्निरूप कारण के रहने पर भी दाहरूप कार्य के न होने से
३२ मृच्छकटिकम्
तद्वयस्य ! कृतो मया गृहदेवताभ्यो बलिः । गच्छ, त्वमपि चतुष्पथे मातृभ्यो बलिमुपहर ।
विदू०— ण गमिस्सं । ( न गमिष्यामि । )
चारु०— किमर्थम् ?
विदू— जदो व्वं पूईज्जन्ता वि देवदा ण दे पसीदन्ति ता को गुणो देवेसुं अच्चिदेसुं । ( यत एवं पूज्यमाना अपि देवता न ते प्रसीदन्ति । तत् को गुणो देवेषु अर्चितेषु । )
चारु०— वयस्य ! मा मैवम् । गृहस्थस्य नित्योऽयं विधिः ।
विशेषोक्ति है । इन सभी का परस्पर अङ्गाङ्गिभाव होने से सङ्कर अलङ्कार है । शिखरिणी छन्द है—रसैः रुद्रैश्छिन्ना य-मन-सभला गः शिखरिणी ॥ १५ ॥
अर्थ— इस लिये मित्र ! मैं गृहदेवताओं के लिये बलि [ पूजनादि में अन्ना-दिदान ] दे चुका हूँ । जाओ, तुम भी चौराहे पर मातृदेवियों के लिये बलि अर्पित कर दो ।
विदूषक— नहीं जाऊँगा ।
चारूदत्त— किस लिये ?
विदूषक— क्योंकि इस प्रकार से पूजित होते हुये भी देवता तुम्हारे ऊपर प्रसन्न नहीं होते हैं । तब ( इस लिये ) देवताओं के पूजने पर क्या लाभ ? [ इन देवताओं की पूजा का क्या फल है ? ]
चारूदत्त— नहीं मित्र ! ऐसा मत कहो । गृहस्थ के लिये यह [ देवपूजन ] नित्य-विधि=कर्तव्य है ।
टीका— चतुष्पथे=शृङ्गाटके शृङ्गाटकचतुष्पथे । इति ( अमरकोषः २।१५ ), मातृभ्यः= ब्राह्मीप्रभृतिभ्यः,
ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री वाराही वैष्णवी तथा । कौमारी चैव चामुण्डा चर्चिकेत्यष्टमातरः ॥
बलिम्= पूजनोपहारद्रव्यम्, उपहर= समर्पय, यतः= यस्मात् कारणात्, एवम्= अनेन रूपेण, पूज्यमानाः= समभ्यर्च्यमाना अपि, देवताः= देवाः, ते= तवोपरि, न= नैव, प्रसीदन्ति= प्रसन्नाः भूत्वा फलं प्रदर्शयन्ति, तत्= तस्मात्, देवेषु= सुरेषु, अर्चितेषु= पूजितेषु कः= कीदृशः, गुणः= लाभः, फलं वा । एवञ्च व्यर्थं देवपूजनमित्यतोऽहं नैव गमिष्यामीति विदूषकस्याशयः । अयम्= देवपूजनरूपः, विधिः= कर्तव्यम्, नित्यः= अवश्यानुष्ठेयः, अकरणे प्रत्यवायात् ।”
विमर्श— मातृभ्यः— देवमातृकाओं की संख्या के विषय में अलग-अलग उल्लेख हैं कोई सात, कोई आठ और कोई सोलह मानता है । इस विषय में धार्मिक
प्रथमोऽङ्कः ५३
तपसा मनसा वाग्भिः पूजिता बलिकर्मभिः । तुष्यन्ति शमिनां नित्यं देवताः किं विचारितैः ॥१६॥
तद् गच्छ, मातृभ्यो बलिमुपहर ।
ग्रन्थ देखें । नित्योऽयं विधिः--विधि तीन प्रकार की है—(१) नित्य, (२) काम्य, (३) नैमित्तिक । जिसके न करने पर प्रत्यवाय होता है, करने पर फल हो अथवा नहीं, यह पृथक् विषय है--वह नित्य-विधि है जैसे सन्ध्यावन्दन आदि । किसी कामना से की जाने वाली विधि-काम्य है 'पुत्रेष्टि' जो दशरथ ने की थी । निमित्त-विशेष के कारण होने वाली विधि नैमित्तिक है—सूर्यग्रहण में स्नान, पर्वश्राद्ध । नित्य-विधि होने से देवदेवी-पूजन करना ही है ।
**अन्वयः--**तपसा, मनसा, वाग्भिः, बलिकर्मभिः (नित्यम्), पूजिताः, देवताः, शमिनाम्, नित्यं तुष्यन्ति, (अस्मिन् विषये), विचारितैः, किम् ॥ १६ ॥
**शब्दार्थ--**तपसा=तपस्या से, मनसा=मन से, वाग्भिः=स्तुतिरुपी वचनों से (और) बलिकर्मभिः=बलिकर्मों से, (नित्यम्=प्रतिदिन), पूजिताः=पूजा किये गये, अर्चित, देवताः=देवगण, शमिनाम्=शमवाले, शान्त लोगों पर नित्यम्=सदैव, तुष्यन्ति=सन्तुष्ट रहते हैं, प्रसन्न रहते हैं, (इस विषय में), विचारितैः=समालोचना से, तर्क-वितर्क से, किम्=क्या (लाभ), अर्थात् कोई फल नहीं है अतः श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहिये ॥ १६ ॥
**अर्थ--**तपस्या, मन, स्तुतिरुपी वचनों (और) बलिकर्मों (पूजन में उपहार-स्वरूप भेंट किये जाने वाले अन्न आदि) से (नित्य) समर्चित देवता लोग शान्त चित्तवाले [भक्त] लोगों पर सदैव प्रसन्न रहते हैं। [इस विषय में] तर्क-वितर्क करने से कोई लाभ नहीं (होता है) ॥ १६ ॥
**टीका--**तपसा=तपश्चरणेन, तपस्यया, मनसा=चित्तेन, ध्यानेन, वाग्भिः=स्तुतिरूपवचनैः, बलिकर्मभिः=पूजादौ समर्पितान्नादिभिः, (नित्यम्) पूजिताः=समर्चिताः, देवताः = देवाः, शमिनाम्=शमवताम् = शान्तचित्तानाम्, नित्यम्=सदैव, तुष्यन्ति=प्रसीदन्ति, सन्तुष्टा भवन्ति, अत्र विचारितैः=आलोचनैः, तर्क-वितर्कादिभिः, किम्=फलम्, न किमपि फलमिति भावः । अतस्त्वया मातृणां पूजा-वश्यं कर्तव्येति चारुदत्तस्याभिप्रायः । आर्या वृत्तम् ॥ १६ ॥
**विमर्श--**चारुदत्त का तात्पर्य यह है कि देवपूजन के विषय में अनपेक्षित तर्क करने से कोई लाभ नहीं होता है । अतः पूजन करना ही चाहिये । शमिनाम्=शमः अस्ति येषां ते-इस अर्थ में मत्वर्थीय इनि प्रत्यय होता है-शम + इनि + षष्ठी ब. व. । विचारितैः-वि√-चर् + णि + क्त (भावे क्तः) + तृतीया ब.व. ।
**अर्थ--**इसलिये जाओ, मातृदेवियों को बलि अर्पित करो।
५४ | मृच्छकटिकम्
विदू०—भो ! ण गमिस्सं । अण्णो को वि पउञ्जीअदु । मम उण बह्म-णस्स सव्वं ज्जेव विपरीदं परिणमदि, आदंसगदा विअ छाआ, वामादो दक्खिणा दक्खिणादो वामा । अण्णं अ, एदाये पदोसबेलाए इध राअमग्गे गणिआ विडा चेडा राअवल्लहा अ पुरिसा सञ्चरन्ति । ता मण्डु अलुद्धस्स कालसप्पस्स मूसओ विअ अहिमुहापदिदो वज्झो दाणिं भविस्सं । तुमं इध उवबिट्ठो किं करिस्ससि ? (भोः ! न गमिष्यामि । अन्यः कोऽपि प्रयुज्यताम्, मम पुनर्ब्राह्मणस्य सर्वमेव विपरीतं परिणमति, आदर्शगता इव छाया, वामतो दक्षिणा, दक्षिणतो वामा । अन्यच्च, एतस्यां प्रदोषवेलायाम् इह राजमार्गे गणिका विटाश्चेटा राजवल्लभाश्च पुरुषाः सञ्चरन्ति । तत् मण्डूकलुब्धस्य कालसर्पस्य मूषिक इव अभिमुखापतितो वध्य इदानीं भविष्यामि । त्वमिह उपविष्टः किं करिष्यसि ?)
चारु०—भवतु । तिष्ठ तावत् । अहं समाधिं निर्वर्त्तयामि ।
विदूषक—श्रीमन् ! मैं नहीं जाऊँगा, [ इस कार्य में ] किसी दूसरे को लगा दीजिये ( भेज दीजिये ) । मुझ ब्राह्मण का सभी कुछ उसी प्रकार विपरीत=उल्टा प्रतिफलित हो जाता है जिस प्रकार शीशे में प्रतिबिम्बित परछाईं बायीं से दाहिनी और दाहिनी से बायीं हो जाती है। दूसरा कारण यह है कि इस सन्ध्याकाल में सड़क पर वेश्यायें, विट, चेट तथा राजा के प्रिय लोग ( राजश्याल आदि ) घूम रहे हैं। इस लिये मेढक के लालची काले सर्प ( गेहुअन साँप ) के मुख में चूहे के समान गिर कर ( फँस कर ) इस समय वधयोग्य ( मार डालने योग्य ) हो जाऊँगा। आप यहाँ बैठें क्या करेंगे ?
चारुदत्त—अच्छा, तब तक ठहरो, ( जब तक ) मैं समाधि ( सायंकालीन सन्ध्यावन्दनादि ) समाप्त कर लेता हूँ ।
विमर्श—(१) विट वह पात्र होता है जो संभोग में सम्पत्ति व्यय करके गरीब हो जाने वाला धूर्त, कला-विशेष में निपुण, वेश बनाने में कुशल, बोलने में चतुर, विनोदप्रेमी और गोष्ठी में पसन्द किया जाता है। यह वेश्याकामुक व्यक्ति के सन्देशों को एक दूसरे के पास पहुँचाता है—
संभोगहीन सम्पद् विटस्तु धूर्तः कलैकदेशज्ञः ।
वेशोपचारकुशलो वाग्मी मधुरोऽथ बहुमतो गोष्ठ्याम् ॥
साहित्यदर्पण ३ । ४१
**(२) चेट—**सेवक, यह शृङ्गारसम्बन्धी कार्यों में सहायक होता है।
**(३) विदूषक—**जो कुसुम, वसन्त आदि नामों वाला होता है। यह अपने कार्यों,
प्रथमोऽङ्कः ५५
( नेपथ्ये ) तिष्ठ, वसन्तसेने ! तिष्ठ ।
( ततः प्रविशति विट-शकार-चेटैरनुगम्यमाना वसन्तसेना । )
विटः—वसन्तसेने ! तिष्ठ तिष्ठ ।
किं त्वं भयेन परिवर्त्तितसौकुमार्या नृत्यप्रयोगविशदौ चरणौ क्षिपन्ती ।
उद्विग्नचञ्चलकटाक्षविसृष्टदृष्टिर्व्याधानुसारचकिता हरिणीव यासि ? । १७।
शरीर, वेष एवं भाषा आदि के द्वारा हास्य कराने वाला, कलह में अनुराग रखने वाला और भोजनादि अपने कार्यों का जाननेवाला होता है —
कुसुमवसन्ताद्यभिधः कर्मवपुर्वेषभाषाद्यैः ।
हास्यकरः कलहरतिर्विदूषकः स्यात् स्वकर्मज्ञः ॥
— साहित्यदर्पण ३ । ४८
विट, चेट एवं विदूषक ये सभी नायक आदि के सहायक होते हैं। इस प्रकरण में नायक चारुदत्त का सहायक विदूषक है और प्रतिनायक शकार के सहायक विट तथा चेट हैं।
इस प्रसंग से ऐसा संकेत मिलता है कि उस समय सायंकाल से ही उक्त लोग सड़कों पर घूमने लगते थे। साथ ही उन्हें दण्डित करने के लिये या मनोविनोद के लिये राजा के प्रिय लोग भी घूमने लगते थे। इस वर्णन से शकार के आगामी प्रवेश आदि की सूचना भी दी गई है, क्योंकि बिना संकेत के पात्र-प्रवेश असंगत माना जाता है।
( नेपथ्य में )
अर्थ—हको, वसन्तसेना ! रुको ।
( इसके बाद विट, शकार एवं चेट के द्वारा पीछा की जाती हुई वसन्त-सेना प्रवेश करती है । )
विट—वसन्तसेना ! रुको, रुको ।
अन्वयः—भयेन, परिवर्त्तितसौकुमार्या, नृत्यप्रयोगविशदौ, चरणौ, क्षिपन्ती, उद्विग्नचञ्चलकटाक्षविसृष्टदृष्टिः, त्वम्, व्याधानुसारचकिता, हरिणी, इव, किम्, यासि ॥ १७ ॥
शब्दार्थ—भयेन=[ हम लोगों के ] भय के कारण, परिवर्त्तितसौकुमार्या=सुकुमारता [ मन्द-मन्द गति ] को छोड़ देने वाली, नृत्यप्रयोगविशदौ=नाचने की कला में चतुर, चरणौ=अपने दोनों पैरों को, क्षिपन्ती=फेंकती हुयी, जल्दी जल्दी चलाती हुई, उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्ष-विसृष्टदृष्टिः=भयविह्वल और चञ्चल कटाक्षों से देखती हुई, त्वम्=तुम, वसन्तसेना, व्याधानुसार-चकिता=शिकारी द्वारा पीछा किये जाने से घबड़ायी हुई, हरिणी=हिरनी, इव=के समान, किम्=किस लिये, यासि=भागी जा रही हो ? ॥ १७ ॥
५६ | मृच्छकटिकम्
शकारः--चिट्ठ, वशन्तशणिए ! चिट्ठ । (तिष्ठ वसन्तसेने ! तिष्ठ ।)
किं याशि, धावशि, पलाअशि, पक्खलन्ती वाशू ! पशीद ण मलिश्शशि, चिट्ठ दाव । कामेण दज्झदि हु हलके मे तवश्शी अङ्गाललाशिपडिदे विअ मंसखण्डे ॥१८॥
अर्थ--[ हम लोगों के ] भय के कारण ( अपनी ) मन्द गति को बदल=छोड़ देनी वाली, नृत्यकला में कुशल अपने ) पैरों को जल्दी-जल्दी फेंकती ( आगे बढ़ाती ) हुई, भय से विह्वल एवं चञ्चल कटाक्षों से ( चारों ओर ) दृष्टिपात करती हुई तुम [ वसन्तसेना ], शिकारी द्वारा पीछा किये जाने से घबड़ायी हुई हिरनी के समान, क्यों भागी जा रही हो ? ॥ १७ ॥
टीका--( अनुगन्तृभ्योऽस्मभ्यम् ) भयेन = भीत्या, परिवर्त्तितसौकुमार्या=परिवर्त्तितम्=द्रुतगमनाय अन्यथाकृतं परित्यक्तमिति यावत्, सौकुमार्यम्=गमन-मार्दवम्, मन्दगमनम्, यया सा शीघ्रगतिकेति भावः, नृत्यप्रयोगे=नृत्यकलायाम् विशदौ=निपुणौ चरणौ=पादौ, क्षिपन्ती=इतस्ततः पातयन्ती, उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्ष-विसृष्ट-दृष्टिः=(१) उद्विग्नाः=अत्यन्तं व्यग्राः, चञ्चलाः=चाञ्चल्ययुक्ताः कटाक्षाः=अपाङ्गदृष्टयः यस्मिन् कर्मणि यथा स्यात् तथा ( क्रियाविशेषणमिदम् ) विसृष्टा=प्रेरिता, दृष्टिः=नेत्रं यया सा, (२) यद्वा उद्विग्नं चंचलं च यथा स्यात् तथा कटाक्षेण विसृष्टा दृष्टिः यया सा, (३) यद्वा-उद्विग्ना च चञ्चला च, कटाक्ष-विसृष्टा च ( एषां द्वन्द्वं कृत्वा ) दृष्टिःयस्याः सा इति बहुव्रीहिः, (४) यद्वा-उद्विग्नचञ्चलकटाक्षरूपेण विसृष्टा दृष्टिर्यया सा इति पृथ्वोधरः । त्वम्=वसन्त-सेना, व्याधानुसारचकिता=व्याधस्य=मृगयालुब्धकस्य अनुसारेण=अनुसरणेन, पश्चाद्-धावनेनेत्यर्थः, चकिता=त्रस्ता, हरिणी इव=मृगी इव, किम्=किमर्थम्, कस्मात् हेतोः, यासि=धावसि । त्वदनुरागाकृष्टेभ्यः मादृशजनेभ्यो भयं नोचितमिति भावः । उपमालंकारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ १७ ॥
विमर्श--नृत्यप्रयोगविशदौ-नृत्य के अभ्यास से पटु अथवा नृत्य के प्रयोग में कुशल । इसमें विवादग्रस्त पद है -उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्ष-विसृष्ट-दृष्टिः । यहाँ (१) उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्ष-इन्हें 'विसृष्ट' क्रिया का विशेषण बनाकर बहुव्रीहि करना चाहिये । (२) उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्षरूपेण विसृष्टा दृष्टिः यया सा । (३) उद्विग्ना च चञ्चला च कटाक्ष-विसृष्टा च दृष्टिर्यस्याः सा ।
यहाँ उपमा अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है ॥ १७ ॥
अर्थ--शकार--ठहरो, वसन्तसेने ! ठहरो ।
अन्वयः--प्रस्खलन्ती, किम् यासि, धावसि, पलायसे, ( हे ) वासु ! प्रसीद, न, मरिष्यसि, तावत्, तिष्ठ, अङ्गारराशि-पतितम्, मांसखण्डम्, इव, तपस्वि, मे, हृदयम्, कामेन, दह्यते, खलु ॥ १८ ॥
प्रथमोऽङ्कः ५९
( किं यासि, धावसि, पलायसे, प्रस्खलन्ती वासु ! प्रसीद, न मरिष्यसि, तिष्ठ तावत् । कामेन दह्यते खलु मे हृदयं तपस्वि अङ्गारराशिपतितमिव मांसखण्डम् ॥ १८ ॥ )
चेटः--अज्जुके ! चिट्ठ चिट्ठ। ( आर्यके ! तिष्ठ तिष्ठ । ) उत्ताशिता गच्छशि अन्तिका मे शंपुण्णपुच्छा विअ गिम्हमोरी । ओवग्गदी शामिअभट्टके मे वण्णे गडे कुक्कुडशावके व्व ॥१६॥
शब्दार्थ--प्रस्खलन्ती=लड़खड़ाती हुई, किम्=क्यों, यासि=जा रही हो, धावसि=दौड़ रही हो, पलायसे=भाग रही हो, हे वासु !=हे बाले ! प्रसीद= ( मुझ पर ) खुश हो जाओ, न=नहीं, मरिष्यसि=मरोगी, तावत्=कुछ, तिष्ठ=रुको, ठहर जाओ, अङ्गारराशिपतितम्=अङ्गारों के समुदाय में गिरे हुये, मांसखण्डम्=मांस के टुकड़े के, इव=समान, मे=मेरा, तपस्वि=बेचारा, हृदयम्=हृदय, दिल, कामेनं=कामरूपी अग्नि से, दह्यते=जलाया जा रहा है, खलु=यह निश्चित है ॥ १८ ॥
अर्थः--लड़खड़ाती हुई क्यों जा रही हो, दौड़ रही हो, भाग रही हो । हे बाले ! प्रसन्न हो जाओ, मरोगी नहीं, थोड़ा ठहरो । ( अथवा थोड़ी देर रुको, इससे मर नहीं जाओगी । ) ( जलते हुये ) अंगारों के समुदाय के ऊपर गिरे हुये मांस के टुकड़े के समान मेरा बेचारा ( सीधा साधा ) हृदय ( दिल ) काम ( कामाग्नि ) द्वारा जला डाला जा रहा है, यह निश्चित है ॥ १८ ॥
विमर्शः--शकार इस प्रकरण का प्रतिनायक है । यह राजा का शाला ( रखैल का भाई ) होता है। अतः इसमें अहंकार असीमित होता है। इसका लक्षण यह है
मद-मूर्खताभिमानी दुष्कुलतैश्वर्यसंयुक्तः । सोऽयमनूढाभ्राता राज्ञःश्यालः शकार इत्युक्तः ॥
यह शकारी बोली बोलता है, इसमें 'श' की बहुलता रहती है इस लिये इसका नाम शकार होता है। शकार की बातें--क्रमरहित, व्यर्थ, पुनरुक्त, हतोपम और लोक तथा न्याय से विरुद्ध होती हैं । यह लक्षण आगे कथानक से स्पष्ट है । 'बाला स्याद् वासू-( रार्यस्तु मारिषः ), अमरकोष १।७।६८। इसमें उपमा अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है- ज्ञेयं वसन्ततिलकं त-भ-जा जगौ गः ॥ १८ ॥
अन्वयः--सम्पूर्णपक्षा, ग्रीष्ममयूरी, इव, उत्त्रासिता, (त्वम् ) मम, अन्तिकात्, गच्छसि, वने, गतः, कुक्कुटशावकः, इव, मम, स्वामिभट्टारकः, अववल्गति ॥ १६ ॥
५८ मृच्छकटिकम्
( उत्त्रासिता गच्छसि अन्तिकान्मे सम्पूर्णपक्षेव ग्रीष्ममयूरी ।
अववल्गति स्वामिभट्टारको मे वने गतः कुक्कुटशावक इव ॥ १६ ॥
**शब्दार्थः—**सम्पूर्णपक्षां=समस्त पंखों से परिपूर्ण, ग्रीष्ममयूरी=ग्रीष्मकालीन मोरनी, इव=के तुल्य, उत्त्रासिता=घबड़ायी हुई, ( त्वम्=तुम ), मम=मेरे, अन्तिकात्=समीप से, गच्छसि=जा रही हो; वने=जंगल में, गतः=गये हुये, कुक्कुट-शावकः इव=मुर्गी के बच्चे के समान, मम=मेरा, स्वामि-भट्टारकः=सम्मानित स्वामी ( शकार ), अववल्गति=( तुम्हारे पीछे पीछे ) दौड़ रहा है ॥ १६ ॥
**अर्थ—चेट—**आर्ये ! ठहरो, ठहरो ।
सम्पूर्ण पंखोंवाली, ग्रीष्मऋतु की मोरनी के समान भयभीत हुई ( तुम ) मेरे पास से भागी जा रही हो ? वन में गये हुये मुर्गी के बच्चे के समान मेरा सम्मानित स्वामी ( शकार ) ( तुम्हारे पीछे पीछे ) दौड़ रहा है ॥ १६ ॥
विमर्शः—'अन्तिका' इस प्राकृतपाठ का संस्कतरूप 'अन्तिकात्' है जैसा कि ऊपर लिखा गया है । कुछ व्याख्याकारों ने 'अन्तिका' यह पाठ माना है और 'अन्तिका' भगिनी ज्येष्ठा' ( अमरकोष १।७।१५ ) के अनुसार बड़ी बहन यह अर्थ किया है । और वसन्तसेना को बड़ी बहन के तुल्य माना है । यहाँ विचारणीय यह है कि संस्कृत शब्द का प्राकृत में भी क्या 'अन्तिका' यही रूप रहता है ? सम्पूर्णपक्षा—गर्मी के दिनों में मयूरी के पंख पूरे-पूरे होते हैं, उन्हें कोई तोड़ न ले-इस भयं से वह सदैव सावधान रह कर भागती रहती है, वैसे ही वसन्तसेना के भागने का उल्लेख किया है । यहाँ कवि की एक अनभिज्ञता का परिचय मिलता है क्योंकि मयूरी के पंखों को नहीं अपितु मोर के पंखों को लोग तोड़ते हैं । मोर के ही पंखों की सुन्दरता अनुभव-सिद्ध है । अतः यह लोकानुभवविरुद्ध ही समझना चाहिये ! कुक्कुटशावक इव—यहाँ—मुर्गी के बच्चे के समान—यही अर्थ उचित है क्योंकि बच्चे मुर्गी के ही पीछे दौड़ते हैं मुर्गा के नहीं । यहाँ शकार नीच पात्र की नीच मुर्गी के बच्चे के साथ उपमा देना ठीक ही है । इसमें दो बार सादृश्य-वर्णन होने से उपमा अलंकार है । इन्द्रवज्रा छन्द है । इसका लक्षण—स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ॥
कुछ व्यख्याकारो ने 'अज्जुके' को संस्कृत शब्द माना है और गणिका का पर्याय माना है—"नाट्योक्तौ गणिकाऽज्जुका" ( अमरकोष ७।७।११ ) किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि प्राकृतभाषी चेट संस्कृत शब्द का प्रयोग नहीं करता है । अतः 'अज्जुके' यह प्राकृत शब्द ही समझना चाहिये और इसका संस्कृत 'आर्यके !' यह करना चाहिये । अतः यही पाठ रखा गया है ॥ १६ ॥
५९
प्रथमोऽङ्कः
विटः--वसन्तसेने ! तिष्ठ, तिष्ठ ।
किं यासि बालकदलीव त्रिकम्पमाना रक्तांशुकं पवनलोलदशं वहन्ती ।
रक्तोत्पलप्रकरकुङ्मलमुत्सृजन्ती टङ्कैर्मनःशिलगुहेव विदार्यमाणा ॥२०॥
**विट--**वसन्तसेने ! ठहरो, ठहरो।
**अन्वयः--**बालकदली, इव, विकम्पमाना, पवनलोलदशम्, रक्तांशुकम्, वहन्ती, (त्वम्) टङ्कैः, विदीर्यमाणा, मनःशिलागुहा, इव, रक्तोत्पलप्रकरकुङ्मलम्, उत्सृजन्ती, किम्, यासि ? ॥ २० ॥
**शब्दार्थः--**बालकदली=नवीन ( कोमल ) केला के वृक्ष के इव=समान, विकम्पमाना=काँपती हुई, पवनलोलदशम्=हवा से चञ्चल आंचल वाले, रक्तांशुकम्=लाल रेशमी वस्त्र को, वहन्ती=धारण करती हुई; ( तुम ) टङ्कैः=टांकी द्वारा, विदार्यमाणा=छेदी ( काटी ) जाती हुई, मनःशिल-गुहा=मनसिल की कन्दरा के, इव=तुल्य ( उससे निकलने वाली चिनगारियों के समान ), —रक्तोत्पलप्रकर-कुङ्मलम्=( केशपाश में गुंथे हुये ) लाल कमलों के समुदाय की कलियों को, ( गुहापक्ष में रक्तकमल-समुदाय के तुल्य कलियों=कलीसद्श पत्थर के टुकड़ों को ), उत्सृजन्ती=बिखेरती हुई ( गुहापक्ष में निकालती हुई ), किम्=क्यों, यासि=भागी जा रही हो ? ॥ २० ॥
**अर्थ--**नये कदली वृक्ष के समान ( भय से ) काँपती हुई, वायु द्वारा चञ्चल आँचल वाले लाल रेशमी वस्त्र को धारण करती हुई, ( तुम ; टांकी ( छेनी आदि काटने के औजार ) के द्वारा काटी ( छेदी ) जाती हुई मनःशिला ( मनसिल ) की कन्दरा ( से निकलने वाली लाल लाल चिनगारियों ) के समान ( अपने केशपाश=जूड़े में गुंथे हुये ) रक्त-कमलसमुदाय की कलियों को ( गुहा-पक्ष में रक्त कमल-तुल्य जो लाल पत्थर उसकी कलियों के समान चिनगारियों ) को ( वेग से भागने के कारण बिखराती हुई ) ( गुहापक्ष में—निकालती हुयी ) क्यों जा रही हो ? ॥ २० ॥
**टीका--**बालकदली = नवीनकोमलकदलीवृक्षः, इव = यथा, विकम्पमाना = कम्पिता सती, पवनलोलदशम् = पवनेन = वायुना, लोला = चञ्चला, दशा = प्रान्तभागीय-दीर्घतन्तुसमुदायः, अञ्चलभागः, यस्य तत्, रक्तांशुकम् = रक्तवस्त्रम्, वहन्ती = धारयन्ती, ( त्वम् ), टङ्कैः = पाषाण-विदारणयन्त्रैः, विदार्यमाणा = भिद्यमाना, मनःशिल-गुहा इव = रक्तवर्णधातुविशेषस्य खनिः इव, ( यद्यपि 'मनःशिला' इति स्त्रीलिङ्ग एव साधुस्तथापि महाभारते मनःशिलशब्दोपि दृश्यते इति तथा प्रयुक्तः इति पृथ्वीधर आह ), रक्तोत्पलप्रकर-कुङ्मलम् = रक्तोत्पलानाम् = रक्तकमलानाम्, प्रकरः = समुदायः, तन्निर्मितं माल्यादिकमिति भावः, तस्य कुङ्मलम्=मुकुलम्, गमनतीव्रतया,
| ६० | मृच्छकटिकम् |
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शकारः—चिट्ठ, वसन्तशेणिए ! चिट्ठ । (तिष्ठ, वसन्तसेनिके ! तिष्ठ ।)
मम मअणमणङ्गं मम्महं वड्ढअन्ती
णिशि अ शअणके मे णिद्दअं आक्खिवन्ती ।
पशलशि भअभीदा पक्खलन्ती खलन्ती
मम वशमणुजादा लावणश्शेव कुन्ती ॥ २१ ॥
उत्सृजन्ती=पातयन्ती, किम्=किमर्थम्, यासि=धावासि, व्रजसि। अत्र गुहापक्षे रक्तोत्पलप्रकरवत् कुड्मलान्=कुडमलसदृशप्रस्तरखण्डान्, उत्क्षिपन्तीत्यर्थो बोध्य । यथा विदारणकाले मनःशिलागुहातः रक्तकमलतुल्यः स्फुलिङ्गाः निःसरन्ति तथैव वसन्तसेनाशरीरे सज्जनार्थमुपयुक्तानि पुष्पाणि भयेन तीव्रगमनात् पतन्तीति भावः। अत्रोपमालंकारः, 'उत्सृजन्ती इव' इति व्याख्यायामुत्प्रेक्षापीति बोध्यम् । वसन्त-तिलकं वृत्तम् । लक्षणन्तु पूर्वमुक्तम् ॥ २० ॥
विमर्श—यहाँ वसन्तसेना को नवकदली के समान और उसके वस्त्रों को कदली के लाल फूलों के समान बताया गया है । उसके शरीर पर सजाने के लिये लगे फूल, भागने के कारण गिरने से उसी प्रकार लग रहे हैं जैसे मनसिलपत्थर काटते समय निकलने वाली चिनगारियाँ । मनःशिला शब्द यद्यपि स्त्रीलिङ्ग है तथापि महा भारतादि के अनुसार पुंलिंग मानकर यहाँ का प्रयोग समझना चाहिये । यहाँ उपमा अलंकार स्पष्ट है । उत्सृजन्ती क्रिया के साथ 'इव' का आक्षेप से योग करने पर उत्प्रेक्षा भी सम्भव है । वसन्ततिलका छन्द है—उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः ॥ २० ॥
अन्वयः—मम, मदनम्, अनङ्गम्, मन्मथम्, वर्धयन्ती, निशि, च, शयनके, मम, निद्राम्, आक्षिपन्ती, (साम्प्रतम्), भयभीता, प्रस्खलन्ती, स्खलन्ती, प्रसरसि, (तथापि), रावणस्य, कुन्ती, इव, मम, वशम्, अनुयाता ॥ २१ ॥
शब्दार्थ—मम=मेरे [=शकार के] मदनम्, अनङ्गम्, मन्मथम्=काम को, वर्द्धयन्ती=बढ़ाती हुई, च=और, निशि=रात में, शयनके=शय्या (पलंग) पर, मम=मेरी, निद्राम्=नींद को, आक्षिपन्ती=उचाटती हुई, भगाती हुई, (तुम इस समय) भयभीता=भय से डरी हुई, प्रस्खलन्ती, स्खलन्ती=बार बार लड़खड़ाती हुई, (यद्यपि) प्रसरसि=भागी जा रही हो, (तथापि) रावणस्य=लंकापति रावण के, (वश में आई हुई) कुन्ती इव=पाण्डवों की माता के समान (तुम), मम=मेरे, वशम्=वश, अधिकार में, अनुयाता=आ गयी हो (अतः अब भागना व्यर्थ है)।।२१।।
अर्थ—शकार—रुको, वसन्तसेने ! रुको ।
मेरे, मदन, अनङ्ग, मन्मथ (=काम) को बढ़ाने वाली, और रात्रि में पलंग (शय्या) पर मेरी नींद को उचाटनेवाली=भगाने वाली, (तुम इस समय)
प्रथमोऽङ्कः ६१
( मम मदनमनङ्गं मन्मथं वर्द्धयन्ती, निशि च शयनके मे निद्रामाक्षिपन्ती । प्रसरसि भयभीता प्रस्खलन्ती, स्खलन्ती, मम वशमनुयाता रावणस्येव कुन्ती ॥२१॥
विटः—वसन्तसेने !
किं त्वं पदैर्मम पदानि विशेषयन्ती व्यालीव यासि पतगेन्द्रभयाभिभूता । वेगादहं प्रविसृतः पवनं निरुन्ध्यां त्वन्निग्रहे तु वरगात्रि ! न मे प्रयत्नः ॥ २२ ॥
भय से घबड़ायी हुई बार-बार लड़खड़ाती हुई ( यद्यपि ) भाग रही हो, (तथापि) उसी प्रकार मेरे वश में आगई हो जिस प्रकार रावण के वश में कुन्ती (आगई थी) अतः अब भागने का प्रयास व्यर्थ है ॥ २१ ॥
**टीका—**मम=शकारस्येत्यर्थः, मदनम्, अनङ्गम, मन्मथम्=कामम्, कामवेग-मित्यर्थः, वर्द्धयन्ती=उद्दीपयन्ती, निशि=निशायाम्, शयनके=शय्यायाम्, अधिकरणे ल्युट् ततः स्वार्थे कः, च=तथा, मम=शकारस्य, निद्राम्,=स्वापम्, आक्षिपन्ती=स्वचिन्तनेनापसारयन्ती, साम्प्रतम्, भयभीता=भयत्रस्ता, भीतेत्येनेनैव निर्वाहे भयशब्दोऽपार्थकः, प्रस्खलन्ती-स्खलन्ती=त्वरिततरगमनेन चरणौ स्खलितौ कुर्वन्ती, प्रसरसि=प्रगच्छसि, तथापि, रावणस्य=लङ्काधिपतेः, वशमायाता, कुन्ती इव=युधिष्ठिरादीनां माता इव, मम=शकारस्य, वशम्=अधीनताम्, अनुयाता=आपतिता असि । 'रावणस्येव कुन्ती' त्यत्र हतोपमा, शास्त्रविरुद्धत्वात् । मालिनीवृत्तम्—न-न-मयययु-तेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥ २१ ॥
**विमर्श—**शकार अनर्गल पुनरुक्तियुक्त एवं व्यर्थ की बातें बोलता है । अतः श्लोक असंगत नहीं है । भयभीता —भीता इतना पर्याप्त है, भय शब्द व्यर्थ प्रयुक्त है । रावण त्रेता में हुआ था और कुन्ती द्वापर में । इनका कोई सम्बन्ध नहीं था फिर भी शंकार का वचन होने से दोष नहीं है । 'रावणस्येव कुन्ती' इसमें शास्त्र-विरुद्ध होने से हतोपमा है । इसीलिये कहा गया है—
आगम-लिङ्ग-विहीनं देशकालन्याय-विपरीतम् । व्यर्थैकार्थमपार्थं हि भवति वचनं शकारस्य ॥
इसमें मालिनी छन्द है । लक्षण—न-न-म-य-य-युतेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥२१॥
**अन्वयः—**पतगेन्द्रभयाभिभूता, व्याली, इव, त्वम्, पदैः, मम, पदानि, विशेष-यन्ती, किम्, यासि ? हे वरगात्रि ! वेगात्, प्रविसृतः, अहम्, पवनम्, निरुन्ध्याम् ( न, रुन्ध्याम् ? ) तु, त्वन्निग्रहे, मे, प्रयत्नः, न [ भवति ] ॥ २२ ॥
**शब्दार्थ—**पतगेन्द्रभयाभिभूता=गरुड [ के द्वारा पकड़े जाने ] के भय से घबड़ाई हुई, व्याली=नागिन, इव=के तुल्य ( त्वम्=तुम ) पदैः=पैरों से, मम=
६२ मृच्छकटिकम्
शकारः-भावे ! भावे ! (भाव ! भाव ! )
मुझ विट के, पदानि=पैरों को (पैरों के चिह्नों को), विशेषयन्ती=अतिक्रान्त करती हुई, किम्=किस लिये, यासि ? =जा रही हो ? हे वरगात्रि ! सुन्दर अवयवों वाली, वेगात्=वेगसे, प्रविसृतः=दौड़ा हुआ, अहम्=मैं (विट), पवनम्=हवा को निरुन्ध्याम्=रोक सकता हूँ (न=नहीं, रुन्ध्याम्=रोक सकता हूँ ? अर्थात् अवश्य ही रोक सकता हूँ।) तु=लेकिन, त्वन्निग्रहे=तुम्हें (बलपूर्वक) पकड़ने में, मम=मेरा, प्रयत्नः=प्रयास, न=नहीं है ।। २२ ।।
अर्थ-विट— हे वसन्तसेने ! पक्षिराज गरुड के [द्वारा पकड़ लिये जाने के] भय से भयाकुल नागिन के समान (तुम) (अपने) पैरों से मेरे पैरों (के चिह्नों) का अतिक्रमण करती हुई अर्थात् उन्हें लाँघकर उनके आगे क्यों भागी जा रही हो ? वेग से दौड़ा हुआ मैं क्या पवन को नहीं रोक सकता हूँ ? (अर्थात् अत्यन्त तीव्रगामी पवन को भी रोक=पकड़ सकता हूँ तो तुम्हारी बात ही क्या है,) परन्तु हे सुन्दर अवयवों वाली ! तुम्हें (बलपूर्वक) पकड़ने के लिये मेरा प्रयास नहीं है । (अतः रुक जाओ ।) ।। २२ ।।
**टीका-**पतगेन्द्रभयात्=पतगानाम्=पक्षिणाम् इन्द्रः=राजा गरुडः तस्मात् भयात्=भीतेः, अभिभूता=व्याकुला, व्याली=सर्पिणी, इव=तुल्या, (त्वम्,) पदैः=स्वपदक्षेपैः, मम=विटस्य, पदानि=चरणविक्षेपान्, विशेषयन्ती=अतिशयाना, अतिक्रामन्ती, किम्=किमर्थम्, यासि=पलायसे, एवञ्च वसन्तसेनायाः शीघ्रगामित्वं वक्रत्वञ्च सूच्यते, वेगात्=जवात् यद्वा ‘वेगमाश्रित्य' इति ल्यब्लोपे पञ्चमी, प्रविसृतः=प्रस्थितः, अहम्=विटः, पवनम्=वायुम्, अपीति शेषः, निरुन्ध्याम्=रोद्धुं शक्नुयाम्, न=नैव, रुन्ध्याम् = रोद्धुं शक्नुयाम्, इत्यपि, पाठः अत्र काक्वा, अवश्यमेव रुन्ध्यामिति भावः, तु=किन्तु, हे वरगात्रि ! शोभनावयवे !, त्वन्निग्रहे=बलपूर्वकं त्वद्ग्रहणे, मे=मम, न=नैव, प्रयत्नः=प्रयासः अपितु अनुनयेनैवेति भावः । अत्रोपमालङ्कारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ।। २२ ।।
**विमर्श—**जैसे गरुड़ द्वारा पकड़े जाने के भय से सर्पिणी शीघ्र और टेढ़े मेढ़े चलती है उसी प्रकार शकार आदि द्वारा पकड़ लिये जाने के भय से वसन्तसेना भी जल्दी-जल्दी और टेढ़े-मेढ़े भाग रही है। निरुन्ध्याम्-विट का आशय यह है कि वेग से जब दौड़ूँगा तो पवन को भी पकड़ कर रोक लूँगा, वसन्तसेने ! तुम्हारी क्या बात है । 'न रुन्ध्याम्' यह पाठ भी मिलता है। इसमें काकु से अर्थ करना पड़ता है—'नहीं पकड़ सकता हूँ ?' अर्थात् अवश्य पकड़ सकता हूँ । किन्तु बलात् पकड़ने की इच्छा नहीं है, अनुनय से ही वश में करना चाहता हूँ । यहाँ उपमा अलङ्कार और वसन्ततिलका छन्द है ।। २२ ।।