भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 147
६०मृच्छकटिकम्

शकारः—चिट्ठ, वसन्तशेणिए ! चिट्ठ । (तिष्ठ, वसन्तसेनिके ! तिष्ठ ।)

मम मअणमणङ्गं मम्महं वड्ढअन्ती
णिशि अ शअणके मे णिद्दअं आक्खिवन्ती ।
पशलशि भअभीदा पक्खलन्ती खलन्ती
मम वशमणुजादा लावणश्शेव कुन्ती ॥ २१ ॥

उत्सृजन्ती=पातयन्ती, किम्=किमर्थम्, यासि=धावासि, व्रजसि। अत्र गुहापक्षे रक्तोत्पलप्रकरवत् कुड्मलान्=कुडमलसदृशप्रस्तरखण्डान्, उत्क्षिपन्तीत्यर्थो बोध्य । यथा विदारणकाले मनःशिलागुहातः रक्तकमलतुल्यः स्फुलिङ्गाः निःसरन्ति तथैव वसन्तसेनाशरीरे सज्जनार्थमुपयुक्तानि पुष्पाणि भयेन तीव्रगमनात् पतन्तीति भावः। अत्रोपमालंकारः, 'उत्सृजन्ती इव' इति व्याख्यायामुत्प्रेक्षापीति बोध्यम् । वसन्त-तिलकं वृत्तम् । लक्षणन्तु पूर्वमुक्तम् ॥ २० ॥

विमर्श—यहाँ वसन्तसेना को नवकदली के समान और उसके वस्त्रों को कदली के लाल फूलों के समान बताया गया है । उसके शरीर पर सजाने के लिये लगे फूल, भागने के कारण गिरने से उसी प्रकार लग रहे हैं जैसे मनसिलपत्थर काटते समय निकलने वाली चिनगारियाँ । मनःशिला शब्द यद्यपि स्त्रीलिङ्ग है तथापि महा भारतादि के अनुसार पुंलिंग मानकर यहाँ का प्रयोग समझना चाहिये । यहाँ उपमा अलंकार स्पष्ट है । उत्सृजन्ती क्रिया के साथ 'इव' का आक्षेप से योग करने पर उत्प्रेक्षा भी सम्भव है । वसन्ततिलका छन्द है—उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः ॥ २० ॥

अन्वयः—मम, मदनम्, अनङ्गम्, मन्मथम्, वर्धयन्ती, निशि, च, शयनके, मम, निद्राम्, आक्षिपन्ती, (साम्प्रतम्), भयभीता, प्रस्खलन्ती, स्खलन्ती, प्रसरसि, (तथापि), रावणस्य, कुन्ती, इव, मम, वशम्, अनुयाता ॥ २१ ॥

शब्दार्थ—मम=मेरे [=शकार के] मदनम्, अनङ्गम्, मन्मथम्=काम को, वर्द्धयन्ती=बढ़ाती हुई, च=और, निशि=रात में, शयनके=शय्या (पलंग) पर, मम=मेरी, निद्राम्=नींद को, आक्षिपन्ती=उचाटती हुई, भगाती हुई, (तुम इस समय) भयभीता=भय से डरी हुई, प्रस्खलन्ती, स्खलन्ती=बार बार लड़खड़ाती हुई, (यद्यपि) प्रसरसि=भागी जा रही हो, (तथापि) रावणस्य=लंकापति रावण के, (वश में आई हुई) कुन्ती इव=पाण्डवों की माता के समान (तुम), मम=मेरे, वशम्=वश, अधिकार में, अनुयाता=आ गयी हो (अतः अब भागना व्यर्थ है)।।२१।।

अर्थशकार—रुको, वसन्तसेने ! रुको ।

मेरे, मदन, अनङ्ग, मन्मथ (=काम) को बढ़ाने वाली, और रात्रि में पलंग (शय्या) पर मेरी नींद को उचाटनेवाली=भगाने वाली, (तुम इस समय)