मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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प्रथमोऽङ्कः
विटः--वसन्तसेने ! तिष्ठ, तिष्ठ ।
किं यासि बालकदलीव त्रिकम्पमाना रक्तांशुकं पवनलोलदशं वहन्ती ।
रक्तोत्पलप्रकरकुङ्मलमुत्सृजन्ती टङ्कैर्मनःशिलगुहेव विदार्यमाणा ॥२०॥
**विट--**वसन्तसेने ! ठहरो, ठहरो।
**अन्वयः--**बालकदली, इव, विकम्पमाना, पवनलोलदशम्, रक्तांशुकम्, वहन्ती, (त्वम्) टङ्कैः, विदीर्यमाणा, मनःशिलागुहा, इव, रक्तोत्पलप्रकरकुङ्मलम्, उत्सृजन्ती, किम्, यासि ? ॥ २० ॥
**शब्दार्थः--**बालकदली=नवीन ( कोमल ) केला के वृक्ष के इव=समान, विकम्पमाना=काँपती हुई, पवनलोलदशम्=हवा से चञ्चल आंचल वाले, रक्तांशुकम्=लाल रेशमी वस्त्र को, वहन्ती=धारण करती हुई; ( तुम ) टङ्कैः=टांकी द्वारा, विदार्यमाणा=छेदी ( काटी ) जाती हुई, मनःशिल-गुहा=मनसिल की कन्दरा के, इव=तुल्य ( उससे निकलने वाली चिनगारियों के समान ), —रक्तोत्पलप्रकर-कुङ्मलम्=( केशपाश में गुंथे हुये ) लाल कमलों के समुदाय की कलियों को, ( गुहापक्ष में रक्तकमल-समुदाय के तुल्य कलियों=कलीसद्श पत्थर के टुकड़ों को ), उत्सृजन्ती=बिखेरती हुई ( गुहापक्ष में निकालती हुई ), किम्=क्यों, यासि=भागी जा रही हो ? ॥ २० ॥
**अर्थ--**नये कदली वृक्ष के समान ( भय से ) काँपती हुई, वायु द्वारा चञ्चल आँचल वाले लाल रेशमी वस्त्र को धारण करती हुई, ( तुम ; टांकी ( छेनी आदि काटने के औजार ) के द्वारा काटी ( छेदी ) जाती हुई मनःशिला ( मनसिल ) की कन्दरा ( से निकलने वाली लाल लाल चिनगारियों ) के समान ( अपने केशपाश=जूड़े में गुंथे हुये ) रक्त-कमलसमुदाय की कलियों को ( गुहा-पक्ष में रक्त कमल-तुल्य जो लाल पत्थर उसकी कलियों के समान चिनगारियों ) को ( वेग से भागने के कारण बिखराती हुई ) ( गुहापक्ष में—निकालती हुयी ) क्यों जा रही हो ? ॥ २० ॥
**टीका--**बालकदली = नवीनकोमलकदलीवृक्षः, इव = यथा, विकम्पमाना = कम्पिता सती, पवनलोलदशम् = पवनेन = वायुना, लोला = चञ्चला, दशा = प्रान्तभागीय-दीर्घतन्तुसमुदायः, अञ्चलभागः, यस्य तत्, रक्तांशुकम् = रक्तवस्त्रम्, वहन्ती = धारयन्ती, ( त्वम् ), टङ्कैः = पाषाण-विदारणयन्त्रैः, विदार्यमाणा = भिद्यमाना, मनःशिल-गुहा इव = रक्तवर्णधातुविशेषस्य खनिः इव, ( यद्यपि 'मनःशिला' इति स्त्रीलिङ्ग एव साधुस्तथापि महाभारते मनःशिलशब्दोपि दृश्यते इति तथा प्रयुक्तः इति पृथ्वीधर आह ), रक्तोत्पलप्रकर-कुङ्मलम् = रक्तोत्पलानाम् = रक्तकमलानाम्, प्रकरः = समुदायः, तन्निर्मितं माल्यादिकमिति भावः, तस्य कुङ्मलम्=मुकुलम्, गमनतीव्रतया,