मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ मृच्छकटिकम्
( उत्त्रासिता गच्छसि अन्तिकान्मे सम्पूर्णपक्षेव ग्रीष्ममयूरी ।
अववल्गति स्वामिभट्टारको मे वने गतः कुक्कुटशावक इव ॥ १६ ॥
**शब्दार्थः—**सम्पूर्णपक्षां=समस्त पंखों से परिपूर्ण, ग्रीष्ममयूरी=ग्रीष्मकालीन मोरनी, इव=के तुल्य, उत्त्रासिता=घबड़ायी हुई, ( त्वम्=तुम ), मम=मेरे, अन्तिकात्=समीप से, गच्छसि=जा रही हो; वने=जंगल में, गतः=गये हुये, कुक्कुट-शावकः इव=मुर्गी के बच्चे के समान, मम=मेरा, स्वामि-भट्टारकः=सम्मानित स्वामी ( शकार ), अववल्गति=( तुम्हारे पीछे पीछे ) दौड़ रहा है ॥ १६ ॥
**अर्थ—चेट—**आर्ये ! ठहरो, ठहरो ।
सम्पूर्ण पंखोंवाली, ग्रीष्मऋतु की मोरनी के समान भयभीत हुई ( तुम ) मेरे पास से भागी जा रही हो ? वन में गये हुये मुर्गी के बच्चे के समान मेरा सम्मानित स्वामी ( शकार ) ( तुम्हारे पीछे पीछे ) दौड़ रहा है ॥ १६ ॥
विमर्शः—'अन्तिका' इस प्राकृतपाठ का संस्कतरूप 'अन्तिकात्' है जैसा कि ऊपर लिखा गया है । कुछ व्याख्याकारों ने 'अन्तिका' यह पाठ माना है और 'अन्तिका' भगिनी ज्येष्ठा' ( अमरकोष १।७।१५ ) के अनुसार बड़ी बहन यह अर्थ किया है । और वसन्तसेना को बड़ी बहन के तुल्य माना है । यहाँ विचारणीय यह है कि संस्कृत शब्द का प्राकृत में भी क्या 'अन्तिका' यही रूप रहता है ? सम्पूर्णपक्षा—गर्मी के दिनों में मयूरी के पंख पूरे-पूरे होते हैं, उन्हें कोई तोड़ न ले-इस भयं से वह सदैव सावधान रह कर भागती रहती है, वैसे ही वसन्तसेना के भागने का उल्लेख किया है । यहाँ कवि की एक अनभिज्ञता का परिचय मिलता है क्योंकि मयूरी के पंखों को नहीं अपितु मोर के पंखों को लोग तोड़ते हैं । मोर के ही पंखों की सुन्दरता अनुभव-सिद्ध है । अतः यह लोकानुभवविरुद्ध ही समझना चाहिये ! कुक्कुटशावक इव—यहाँ—मुर्गी के बच्चे के समान—यही अर्थ उचित है क्योंकि बच्चे मुर्गी के ही पीछे दौड़ते हैं मुर्गा के नहीं । यहाँ शकार नीच पात्र की नीच मुर्गी के बच्चे के साथ उपमा देना ठीक ही है । इसमें दो बार सादृश्य-वर्णन होने से उपमा अलंकार है । इन्द्रवज्रा छन्द है । इसका लक्षण—स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ॥
कुछ व्यख्याकारो ने 'अज्जुके' को संस्कृत शब्द माना है और गणिका का पर्याय माना है—"नाट्योक्तौ गणिकाऽज्जुका" ( अमरकोष ७।७।११ ) किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि प्राकृतभाषी चेट संस्कृत शब्द का प्रयोग नहीं करता है । अतः 'अज्जुके' यह प्राकृत शब्द ही समझना चाहिये और इसका संस्कृत 'आर्यके !' यह करना चाहिये । अतः यही पाठ रखा गया है ॥ १६ ॥