मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ५९
( किं यासि, धावसि, पलायसे, प्रस्खलन्ती वासु ! प्रसीद, न मरिष्यसि, तिष्ठ तावत् । कामेन दह्यते खलु मे हृदयं तपस्वि अङ्गारराशिपतितमिव मांसखण्डम् ॥ १८ ॥ )
चेटः--अज्जुके ! चिट्ठ चिट्ठ। ( आर्यके ! तिष्ठ तिष्ठ । ) उत्ताशिता गच्छशि अन्तिका मे शंपुण्णपुच्छा विअ गिम्हमोरी । ओवग्गदी शामिअभट्टके मे वण्णे गडे कुक्कुडशावके व्व ॥१६॥
शब्दार्थ--प्रस्खलन्ती=लड़खड़ाती हुई, किम्=क्यों, यासि=जा रही हो, धावसि=दौड़ रही हो, पलायसे=भाग रही हो, हे वासु !=हे बाले ! प्रसीद= ( मुझ पर ) खुश हो जाओ, न=नहीं, मरिष्यसि=मरोगी, तावत्=कुछ, तिष्ठ=रुको, ठहर जाओ, अङ्गारराशिपतितम्=अङ्गारों के समुदाय में गिरे हुये, मांसखण्डम्=मांस के टुकड़े के, इव=समान, मे=मेरा, तपस्वि=बेचारा, हृदयम्=हृदय, दिल, कामेनं=कामरूपी अग्नि से, दह्यते=जलाया जा रहा है, खलु=यह निश्चित है ॥ १८ ॥
अर्थः--लड़खड़ाती हुई क्यों जा रही हो, दौड़ रही हो, भाग रही हो । हे बाले ! प्रसन्न हो जाओ, मरोगी नहीं, थोड़ा ठहरो । ( अथवा थोड़ी देर रुको, इससे मर नहीं जाओगी । ) ( जलते हुये ) अंगारों के समुदाय के ऊपर गिरे हुये मांस के टुकड़े के समान मेरा बेचारा ( सीधा साधा ) हृदय ( दिल ) काम ( कामाग्नि ) द्वारा जला डाला जा रहा है, यह निश्चित है ॥ १८ ॥
विमर्शः--शकार इस प्रकरण का प्रतिनायक है । यह राजा का शाला ( रखैल का भाई ) होता है। अतः इसमें अहंकार असीमित होता है। इसका लक्षण यह है
मद-मूर्खताभिमानी दुष्कुलतैश्वर्यसंयुक्तः । सोऽयमनूढाभ्राता राज्ञःश्यालः शकार इत्युक्तः ॥
यह शकारी बोली बोलता है, इसमें 'श' की बहुलता रहती है इस लिये इसका नाम शकार होता है। शकार की बातें--क्रमरहित, व्यर्थ, पुनरुक्त, हतोपम और लोक तथा न्याय से विरुद्ध होती हैं । यह लक्षण आगे कथानक से स्पष्ट है । 'बाला स्याद् वासू-( रार्यस्तु मारिषः ), अमरकोष १।७।६८। इसमें उपमा अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है- ज्ञेयं वसन्ततिलकं त-भ-जा जगौ गः ॥ १८ ॥
अन्वयः--सम्पूर्णपक्षा, ग्रीष्ममयूरी, इव, उत्त्रासिता, (त्वम् ) मम, अन्तिकात्, गच्छसि, वने, गतः, कुक्कुटशावकः, इव, मम, स्वामिभट्टारकः, अववल्गति ॥ १६ ॥