मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ५१
शत्रुता है, मित्रों की घृणा ( की जनक ) है, अपने बन्धु-बान्धवों तथा अन्य लोगों के विद्वेष का कारण है; पत्नी से [ होने वाला ] तिरस्कार है, ( अतः ), वन जाने की इच्छा होती है, हृदय में स्थित शोकरूपी आग [ पूरी तरह ] जला नहीं डालती है, अपितु तपाती रहती है [ अर्थात् धीरे-धीरे तपा तपा कर प्राण लेती रहती है । ] ।। १५ ।।
टीका-- ( हि=यतः, दारिद्र्यम्=निर्धनत्वम्, पुरुषस्य=मनुष्यस्य-इति गद्य-भागेनान्वयः -) चिन्तायाः=मम जीवननिर्वाहः कथं स्यादित्येवंरूपायाः मानसिकव्यथायाः, निवासः=आश्रयः=निवासस्थानम्; परपरिभवः=परेषाम्=शत्रूणाम् परिभवः=शत्रुकर्तृकतिरस्कारः, यद्वा परः=उत्कृष्टः, परिभवः=तिरस्कारः इति कर्मधारयः; अपरम्=अन्यत्, विलक्षणम्, निकृष्टम् वा, वैरम्=शत्रुत्वम्, निर्धनं प्रति सर्वेषां वैरं दृश्यते, मित्राणाम्=सुहृदाम्, जुगुप्सा=घृणा, तत्कारणम्, उपकारासमर्थत्वादिति भावः, स्वजन-जन-विद्वेष-करणम् = स्वजनानाम् = आत्मीय-बन्धूनाम्, जनानाम्=अन्येषां च जनानाम् विद्वेषस्य=विरोधस्य, करणम्=उत्पादकम्, कलत्रात्=भार्यायाः, परिभवः=अनादरः, च=तस्मात्, चो हेतौ बोध्यः, वनम्=अरण्यम्, गन्तुम्=यातुम्, बुद्धिः=ज्ञानम् विचारो वा, भवति=उत्पद्यते, हृदिस्थः=हृदये दन्दह्यमानः, शोकाग्निः = दुःखाग्निः ( शोकरूपोऽग्निर्नतु शोकस्य अग्निः, भेदाभावात् षष्ठ्यनुपपत्तेरिति बोध्यम्, ) न=नैव, दहति=भस्मसातकरोति, च=किन्तु, अत्र चस्त्वर्थे बोध्यः, सन्तापयति=भृशं सन्तापं समुत्पादयन् व्यथयतीति भावः । अत्र मालारूपकमलंकारः इति पृथ्वीधरः । शिखरिणी वृत्तम् -रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभला गः शिखरिणी ।। १५ ।।
विमर्श--इस श्लोक में दरिद्रता के विभिन्न रूपों का चित्रण किया गया है । जुगुप्सा--निन्दा, परन्तु इसका प्रयोग घृणा अर्थ में अधिक होता है । √गुप् से 'गुपेर्निन्दायाम्' वार्त्तिक के अनुसार "गुप्-तिज्-किद्भ्यः सन्" ( पा० सू० ३।१।५ ) से सन् प्रत्यय और द्वित्वादि कार्य होने पर 'जुगुप्स' होता है, इस स्थिति में 'अ' प्रत्यय करके स्त्रीलिङ्ग में टाप्=आ होता है जुगुप्स + अ + आ । परपरिभवः - शत्रुओ द्वारा होने वाला अपमान अथवा महान् अपमान ये दोनों अर्थ हो सकते हैं । स्त्री से परिभव होना वनगमनबुद्धि का कारण है । अतः वाक्ययोजना बदल लेनी चाहिये । दहति और सन्तापयति ये क्रियापद महत्त्वपूर्ण हैं । शोकाग्नि दरिद्र को काष्ठ आदि के तुल्य जलाकर भस्म नहीं करती है अपि तु पानी आदि की तरह उसे सन्तप्त कर के धीरे धीरे घुटन के साथ मारती रहती है । एक दारिद्र्य का विभिन्नरूपों से उल्लेख होने से उल्लेख अलंकार है । शोकाग्निः=शोकरूपी आग--रूपक है । अग्निरूप कारण के रहने पर भी दाहरूप कार्य के न होने से