भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५० मृच्छकटिकम्

विदू०—भो वअस्स ! तं ज्जेव अत्थकल्लवत्तं सुमरिअ अलं सन्तप्पिदेण ।
( भो वयस्य ! तमेव अर्थकल्यवत्तं स्मृत्वा अलं सन्तापितेन । )
चारु०—वयस्य ! दारिद्र्यं हि पुरुषस्य—

निवासश्चिन्तायाः परपरिभवो वैरमपरं
जुगुप्सा मित्राणां स्वजनजनविद्वेषकरणम् ।
वनं गन्तुं बुद्धिर्भवति च कलत्रात् परिभवो
हृदिस्थः शोकाग्निर्न च दहति सन्तापयति च ॥१५॥


यहाँ उत्तर उत्तर वाक्यार्थ के प्रति पूर्व पूर्व वाक्यार्थ के हेतु बन जाने से कारणमाला अलंकार है—

परं परं प्रति यदा पूर्वपूर्वस्य हेतुता ।
तदा कारणमाला स्यात् ।। साहित्यदर्पण १०।७६

इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है—लक्षण—

सूर्याश्वैर्मसजस्तता सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् ।। १४ ।।

**अर्थ—विदूषक—**हे मित्र ! उसी धनरूपी कलेवा ( क्षणभंगुर पदार्थ ) का स्मरण करके चिन्ता करना व्यर्थ है ।

अन्वयः—[ हि दारिद्र्यं पुरुषस्य-इति पूर्वोक्तगद्यभागेनान्वयः ] चिन्तायाः, निवासः, परपरिभवः, अपरम्, वैरम्, मित्राणाम्, जुगुप्सा, स्वजनजन-विद्वेष-करणम्, कलत्रात्, परिभवः, भवति, [ अतः ] वनम्, गन्तुम्, बुद्धिः, च, भवति, हृदिस्थः, शोकाग्निः, न, दहति, सन्तापयति, च, ।। १५ ।।

शब्दार्थ—[ हि = क्योंकि, दारिद्र्यम् = दरिद्रता, पुरुषस्य=मनुष्य की—इसको मिलाकर श्लोक का अर्थ करना चाहिये ] चिन्तायाः=चिन्ता का, निवासः=रहने का घर ( है ), परपरिभवः=दूसरों के द्वारा किया जानेवाला अनादर अथवा महान् अपमान है, अपरम्=दूसरी, विलक्षण, वैरम्=शत्रुता, ( है ) मित्राणाम्=मित्रों की, जुगुप्सा=घृणा ( है ), स्व-जन-जन-विद्वेष-करणम्=अपने बन्धुओं तथा अन्य लोगों के साथ होने वाले विद्वेष का कारण है, च=और, कलत्रात्=स्त्री से ( होने वाला ), परिभवः=तिरस्कार है, ( अतः=इस लिये ), वनम्=वन को, गन्तुम्=जाने के लिये, बुद्धिः=ज्ञान, विचार, होता है, हृदिस्थः=हृदय में रहने वाली, शोकाग्निः=शोकरूपी आग, न=नहीं, दहति=जलाती है, च=किन्तु, सन्ताप-यति=सन्ताप देती रहती है ।। १५ ।।

अर्थ—चारुदत्त—दरिद्रता पुरुष की —
[ निर्धनता पुरुषों की ] चिन्ता का घर ( निवासस्थान ) है; दूसरों के द्वारा किया जाने वाला अनादर अथवा महान् अपमान है; दूसरी=विलक्षण