भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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६२ मृच्छकटिकम्

शकारः-भावे ! भावे ! (भाव ! भाव ! )


मुझ विट के, पदानि=पैरों को (पैरों के चिह्नों को), विशेषयन्ती=अतिक्रान्त करती हुई, किम्=किस लिये, यासि ? =जा रही हो ? हे वरगात्रि ! सुन्दर अवयवों वाली, वेगात्=वेगसे, प्रविसृतः=दौड़ा हुआ, अहम्=मैं (विट), पवनम्=हवा को निरुन्ध्याम्=रोक सकता हूँ (न=नहीं, रुन्ध्याम्=रोक सकता हूँ ? अर्थात् अवश्य ही रोक सकता हूँ।) तु=लेकिन, त्वन्निग्रहे=तुम्हें (बलपूर्वक) पकड़ने में, मम=मेरा, प्रयत्नः=प्रयास, न=नहीं है ।। २२ ।।

अर्थ-विट— हे वसन्तसेने ! पक्षिराज गरुड के [द्वारा पकड़ लिये जाने के] भय से भयाकुल नागिन के समान (तुम) (अपने) पैरों से मेरे पैरों (के चिह्नों) का अतिक्रमण करती हुई अर्थात् उन्हें लाँघकर उनके आगे क्यों भागी जा रही हो ? वेग से दौड़ा हुआ मैं क्या पवन को नहीं रोक सकता हूँ ? (अर्थात् अत्यन्त तीव्रगामी पवन को भी रोक=पकड़ सकता हूँ तो तुम्हारी बात ही क्या है,) परन्तु हे सुन्दर अवयवों वाली ! तुम्हें (बलपूर्वक) पकड़ने के लिये मेरा प्रयास नहीं है । (अतः रुक जाओ ।) ।। २२ ।।

**टीका-**पतगेन्द्रभयात्=पतगानाम्=पक्षिणाम् इन्द्रः=राजा गरुडः तस्मात् भयात्=भीतेः, अभिभूता=व्याकुला, व्याली=सर्पिणी, इव=तुल्या, (त्वम्,) पदैः=स्वपदक्षेपैः, मम=विटस्य, पदानि=चरणविक्षेपान्, विशेषयन्ती=अतिशयाना, अतिक्रामन्ती, किम्=किमर्थम्, यासि=पलायसे, एवञ्च वसन्तसेनायाः शीघ्रगामित्वं वक्रत्वञ्च सूच्यते, वेगात्=जवात् यद्वा ‘वेगमाश्रित्य' इति ल्यब्लोपे पञ्चमी, प्रविसृतः=प्रस्थितः, अहम्=विटः, पवनम्=वायुम्, अपीति शेषः, निरुन्ध्याम्=रोद्धुं शक्नुयाम्, न=नैव, रुन्ध्याम् = रोद्धुं शक्नुयाम्, इत्यपि, पाठः अत्र काक्वा, अवश्यमेव रुन्ध्यामिति भावः, तु=किन्तु, हे वरगात्रि ! शोभनावयवे !, त्वन्निग्रहे=बलपूर्वकं त्वद्ग्रहणे, मे=मम, न=नैव, प्रयत्नः=प्रयासः अपितु अनुनयेनैवेति भावः । अत्रोपमालङ्कारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ।। २२ ।।

**विमर्श—**जैसे गरुड़ द्वारा पकड़े जाने के भय से सर्पिणी शीघ्र और टेढ़े मेढ़े चलती है उसी प्रकार शकार आदि द्वारा पकड़ लिये जाने के भय से वसन्तसेना भी जल्दी-जल्दी और टेढ़े-मेढ़े भाग रही है। निरुन्ध्याम्-विट का आशय यह है कि वेग से जब दौड़ूँगा तो पवन को भी पकड़ कर रोक लूँगा, वसन्तसेने ! तुम्हारी क्या बात है । 'न रुन्ध्याम्' यह पाठ भी मिलता है। इसमें काकु से अर्थ करना पड़ता है—'नहीं पकड़ सकता हूँ ?' अर्थात् अवश्य पकड़ सकता हूँ । किन्तु बलात् पकड़ने की इच्छा नहीं है, अनुनय से ही वश में करना चाहता हूँ । यहाँ उपमा अलङ्कार और वसन्ततिलका छन्द है ।। २२ ।।