भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ६३

एशा णाणक-मूशि-काम-काशिका, मच्छ्राशिका लाशिका,
णीण्णाशा, कुलणाशिका, अवशिका, कामस्स मञ्जूशिका।
एशा वेशबहू, शुवेशणिलया वेशङ्गणा वेशिआ,
एशे शे दश णामके मइ कले, अज्जावि मं णेच्छदि ॥ २३ ॥

अन्वयः—एषा—(१) नाणकमोषिकाम-कशिका, (२) मत्स्याशिका, (३) लासिका, (४) निर्नासा (निर्नाशा), (५) कुलनाशिका, (६) अवशिका, (७) कामस्य मञ्जूषिका, एषा (८) वेशवधूः, (६) सुवेशनिलया, (१०) वेशाङ्गना, (११) वेशिका—एतानि, दश, नामानि, अस्याः, मया, कृतानि, (परन्तु इयम्) अद्य, अपि, माम्, न, इच्छति ॥ २३ ॥

शब्दार्थ—एषा = यह वसन्तसेना, नाणकमोषि-काम-कशिका = नाणकं = शिवांक-चिह्नित सिक्कों एवं रत्नादि के चुराने वालों की कामाग्नि को शान्त करने वाली, दूर करने वाली, मत्स्याशिका = मछली खाने वाली, लासिका = नृत्य करने वाली, निर्नासा = नकटी, बेइज्जत, कुलनाशिका = वंश का विनाश करने वाली, अवशिका = (किसी के भी) वश में न रहने वाली, कामस्य = काम (क्रीडा) की, मञ्जूषिका = पिटारी, (है) एषा = यह वसन्तसेना, वेशवधूः = वेश्यालय की वधू, सुवेशनिलया = सुन्दर भवन में रहनेवाली या सुन्दर वस्त्रों तथा घर वाली, वेशाङ्गना = वेश्यालय की स्त्री [अत्यन्त सुन्दरी,] वेशिका = वेश = वेश्यालय है जिसके पास अर्थात् वेश्यालयवाली, एतानि = ये, दश = दस नामानि = नाम, अस्याः = इस वसन्तसेना के, मया = मैने, कृतानि = रखे हैं [तथापि यह] अद्य, = इस समय = आज, अपि = भी, माम् = मुझ [शकार] को, न = नहीं, इच्छति = चाहती है ॥ २३ ॥

अर्थशकारमहानुभाव ! महानुभाव !
यह वसन्तसेना उत्तम सिक्के एवं रत्नादि को चुराने वालों के कामभाव को (रत्यादि के द्वारा) शान्त करने वाली, मछली खाने वाली, नाचनेवाली, नाकरहित (=बेइज्जत), कुल का नाश करने वाली, (किसी के भी) वश में न रहने वाली, काम की पेटी, वेश्यालय की वधू, सुन्दर भूषण एवं भवनवाली (अथवा सुन्दर प्रासाद में रहने वाली), वेश्यालय की कामिनी, वेश्यालयवाली (=वेश्या)—ये दश (वास्तव में ग्यारह) नाम इसके मैंने रखे है तो भी यह आज भी मुझे नहीं चाह रही है ॥ २३ ॥

टीका—गद्ये-भाव ! भाव ! इदमादरसूचकं सम्बोधनपदम् । श्लोके-एषा = दृश्यमाना वसन्तसेना, नाणकमोषि-कामकशिका=नाणकानि = शिवादिक्चिह्नाङ्कितानि टङ्ककादि-वित्तानि, बहुमूल्यनिष्कादिकानि वा मुष्णन्ति = चोरयन्ति-इति नाणकमोषिणः, तेषाम्—कामस्य = वासनायाः, कशिका = कशा, कामभावस्य उद्दीपिका, रत्यादिना शमयित्री वा, अतएवोक्तम्—