भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ५३

तपसा मनसा वाग्भिः पूजिता बलिकर्मभिः । तुष्यन्ति शमिनां नित्यं देवताः किं विचारितैः ॥१६॥

तद् गच्छ, मातृभ्यो बलिमुपहर ।

ग्रन्थ देखें । नित्योऽयं विधिः--विधि तीन प्रकार की है—(१) नित्य, (२) काम्य, (३) नैमित्तिक । जिसके न करने पर प्रत्यवाय होता है, करने पर फल हो अथवा नहीं, यह पृथक् विषय है--वह नित्य-विधि है जैसे सन्ध्यावन्दन आदि । किसी कामना से की जाने वाली विधि-काम्य है 'पुत्रेष्टि' जो दशरथ ने की थी । निमित्त-विशेष के कारण होने वाली विधि नैमित्तिक है—सूर्यग्रहण में स्नान, पर्वश्राद्ध । नित्य-विधि होने से देवदेवी-पूजन करना ही है ।

**अन्वयः--**तपसा, मनसा, वाग्भिः, बलिकर्मभिः (नित्यम्), पूजिताः, देवताः, शमिनाम्, नित्यं तुष्यन्ति, (अस्मिन् विषये), विचारितैः, किम् ॥ १६ ॥

**शब्दार्थ--**तपसा=तपस्या से, मनसा=मन से, वाग्भिः=स्तुतिरुपी वचनों से (और) बलिकर्मभिः=बलिकर्मों से, (नित्यम्=प्रतिदिन), पूजिताः=पूजा किये गये, अर्चित, देवताः=देवगण, शमिनाम्=शमवाले, शान्त लोगों पर नित्यम्=सदैव, तुष्यन्ति=सन्तुष्ट रहते हैं, प्रसन्न रहते हैं, (इस विषय में), विचारितैः=समालोचना से, तर्क-वितर्क से, किम्=क्या (लाभ), अर्थात् कोई फल नहीं है अतः श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहिये ॥ १६ ॥

**अर्थ--**तपस्या, मन, स्तुतिरुपी वचनों (और) बलिकर्मों (पूजन में उपहार-स्वरूप भेंट किये जाने वाले अन्न आदि) से (नित्य) समर्चित देवता लोग शान्त चित्तवाले [भक्त] लोगों पर सदैव प्रसन्न रहते हैं। [इस विषय में] तर्क-वितर्क करने से कोई लाभ नहीं (होता है) ॥ १६ ॥

**टीका--**तपसा=तपश्चरणेन, तपस्यया, मनसा=चित्तेन, ध्यानेन, वाग्भिः=स्तुतिरूपवचनैः, बलिकर्मभिः=पूजादौ समर्पितान्नादिभिः, (नित्यम्) पूजिताः=समर्चिताः, देवताः = देवाः, शमिनाम्=शमवताम् = शान्तचित्तानाम्, नित्यम्=सदैव, तुष्यन्ति=प्रसीदन्ति, सन्तुष्टा भवन्ति, अत्र विचारितैः=आलोचनैः, तर्क-वितर्कादिभिः, किम्=फलम्, न किमपि फलमिति भावः । अतस्त्वया मातृणां पूजा-वश्यं कर्तव्येति चारुदत्तस्याभिप्रायः । आर्या वृत्तम् ॥ १६ ॥

**विमर्श--**चारुदत्त का तात्पर्य यह है कि देवपूजन के विषय में अनपेक्षित तर्क करने से कोई लाभ नहीं होता है । अतः पूजन करना ही चाहिये । शमिनाम्=शमः अस्ति येषां ते-इस अर्थ में मत्वर्थीय इनि प्रत्यय होता है-शम + इनि + षष्ठी ब. व. । विचारितैः-वि√-चर् + णि + क्त (भावे क्तः) + तृतीया ब.व. ।

**अर्थ--**इसलिये जाओ, मातृदेवियों को बलि अर्पित करो।