मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ | मृच्छकटिकम्
विदू०—भो ! ण गमिस्सं । अण्णो को वि पउञ्जीअदु । मम उण बह्म-णस्स सव्वं ज्जेव विपरीदं परिणमदि, आदंसगदा विअ छाआ, वामादो दक्खिणा दक्खिणादो वामा । अण्णं अ, एदाये पदोसबेलाए इध राअमग्गे गणिआ विडा चेडा राअवल्लहा अ पुरिसा सञ्चरन्ति । ता मण्डु अलुद्धस्स कालसप्पस्स मूसओ विअ अहिमुहापदिदो वज्झो दाणिं भविस्सं । तुमं इध उवबिट्ठो किं करिस्ससि ? (भोः ! न गमिष्यामि । अन्यः कोऽपि प्रयुज्यताम्, मम पुनर्ब्राह्मणस्य सर्वमेव विपरीतं परिणमति, आदर्शगता इव छाया, वामतो दक्षिणा, दक्षिणतो वामा । अन्यच्च, एतस्यां प्रदोषवेलायाम् इह राजमार्गे गणिका विटाश्चेटा राजवल्लभाश्च पुरुषाः सञ्चरन्ति । तत् मण्डूकलुब्धस्य कालसर्पस्य मूषिक इव अभिमुखापतितो वध्य इदानीं भविष्यामि । त्वमिह उपविष्टः किं करिष्यसि ?)
चारु०—भवतु । तिष्ठ तावत् । अहं समाधिं निर्वर्त्तयामि ।
विदूषक—श्रीमन् ! मैं नहीं जाऊँगा, [ इस कार्य में ] किसी दूसरे को लगा दीजिये ( भेज दीजिये ) । मुझ ब्राह्मण का सभी कुछ उसी प्रकार विपरीत=उल्टा प्रतिफलित हो जाता है जिस प्रकार शीशे में प्रतिबिम्बित परछाईं बायीं से दाहिनी और दाहिनी से बायीं हो जाती है। दूसरा कारण यह है कि इस सन्ध्याकाल में सड़क पर वेश्यायें, विट, चेट तथा राजा के प्रिय लोग ( राजश्याल आदि ) घूम रहे हैं। इस लिये मेढक के लालची काले सर्प ( गेहुअन साँप ) के मुख में चूहे के समान गिर कर ( फँस कर ) इस समय वधयोग्य ( मार डालने योग्य ) हो जाऊँगा। आप यहाँ बैठें क्या करेंगे ?
चारुदत्त—अच्छा, तब तक ठहरो, ( जब तक ) मैं समाधि ( सायंकालीन सन्ध्यावन्दनादि ) समाप्त कर लेता हूँ ।
विमर्श—(१) विट वह पात्र होता है जो संभोग में सम्पत्ति व्यय करके गरीब हो जाने वाला धूर्त, कला-विशेष में निपुण, वेश बनाने में कुशल, बोलने में चतुर, विनोदप्रेमी और गोष्ठी में पसन्द किया जाता है। यह वेश्याकामुक व्यक्ति के सन्देशों को एक दूसरे के पास पहुँचाता है—
संभोगहीन सम्पद् विटस्तु धूर्तः कलैकदेशज्ञः ।
वेशोपचारकुशलो वाग्मी मधुरोऽथ बहुमतो गोष्ठ्याम् ॥
साहित्यदर्पण ३ । ४१
**(२) चेट—**सेवक, यह शृङ्गारसम्बन्धी कार्यों में सहायक होता है।
**(३) विदूषक—**जो कुसुम, वसन्त आदि नामों वाला होता है। यह अपने कार्यों,