मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ५५
( नेपथ्ये ) तिष्ठ, वसन्तसेने ! तिष्ठ ।
( ततः प्रविशति विट-शकार-चेटैरनुगम्यमाना वसन्तसेना । )
विटः—वसन्तसेने ! तिष्ठ तिष्ठ ।
किं त्वं भयेन परिवर्त्तितसौकुमार्या नृत्यप्रयोगविशदौ चरणौ क्षिपन्ती ।
उद्विग्नचञ्चलकटाक्षविसृष्टदृष्टिर्व्याधानुसारचकिता हरिणीव यासि ? । १७।
शरीर, वेष एवं भाषा आदि के द्वारा हास्य कराने वाला, कलह में अनुराग रखने वाला और भोजनादि अपने कार्यों का जाननेवाला होता है —
कुसुमवसन्ताद्यभिधः कर्मवपुर्वेषभाषाद्यैः ।
हास्यकरः कलहरतिर्विदूषकः स्यात् स्वकर्मज्ञः ॥
— साहित्यदर्पण ३ । ४८
विट, चेट एवं विदूषक ये सभी नायक आदि के सहायक होते हैं। इस प्रकरण में नायक चारुदत्त का सहायक विदूषक है और प्रतिनायक शकार के सहायक विट तथा चेट हैं।
इस प्रसंग से ऐसा संकेत मिलता है कि उस समय सायंकाल से ही उक्त लोग सड़कों पर घूमने लगते थे। साथ ही उन्हें दण्डित करने के लिये या मनोविनोद के लिये राजा के प्रिय लोग भी घूमने लगते थे। इस वर्णन से शकार के आगामी प्रवेश आदि की सूचना भी दी गई है, क्योंकि बिना संकेत के पात्र-प्रवेश असंगत माना जाता है।
( नेपथ्य में )
अर्थ—हको, वसन्तसेना ! रुको ।
( इसके बाद विट, शकार एवं चेट के द्वारा पीछा की जाती हुई वसन्त-सेना प्रवेश करती है । )
विट—वसन्तसेना ! रुको, रुको ।
अन्वयः—भयेन, परिवर्त्तितसौकुमार्या, नृत्यप्रयोगविशदौ, चरणौ, क्षिपन्ती, उद्विग्नचञ्चलकटाक्षविसृष्टदृष्टिः, त्वम्, व्याधानुसारचकिता, हरिणी, इव, किम्, यासि ॥ १७ ॥
शब्दार्थ—भयेन=[ हम लोगों के ] भय के कारण, परिवर्त्तितसौकुमार्या=सुकुमारता [ मन्द-मन्द गति ] को छोड़ देने वाली, नृत्यप्रयोगविशदौ=नाचने की कला में चतुर, चरणौ=अपने दोनों पैरों को, क्षिपन्ती=फेंकती हुयी, जल्दी जल्दी चलाती हुई, उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्ष-विसृष्टदृष्टिः=भयविह्वल और चञ्चल कटाक्षों से देखती हुई, त्वम्=तुम, वसन्तसेना, व्याधानुसार-चकिता=शिकारी द्वारा पीछा किये जाने से घबड़ायी हुई, हरिणी=हिरनी, इव=के समान, किम्=किस लिये, यासि=भागी जा रही हो ? ॥ १७ ॥