भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३० मृच्छकटिकम्

सूत्र०—अअं उववासो केण दे उवदिट्ठो ? (अयमुपवासः केन ते उपदिष्टः ?)
नटी—अज्जस्स ज्जेव पिअवअस्सेण चुण्णबुड्ढेण । ( आर्यस्यैव प्रियवयस्येन चूर्णवृद्धेन । )

इति रूपमेव साधु बोध्यम्, न तु इहलौकिक इति। पारलौकिकः=परलोके भवः, उभयत्र 'अध्यात्मादेष्ठञिष्यते' इति वार्त्तिकात् ठञि एकादेशे उभयपदवृद्धौ रूपं सिध्यति। प्रेक्षन्ताम्=अवलोकयन्तु, आर्यमिश्राः=माननीयाः सभायां विराजमानाः, भक्तपरिव्ययेन=भक्तस्य दानादावुपयोगेन, पारलौकिकः=स्वर्गादौ भवः देवादिरूपः, भर्त्ता=पतिः, अन्विष्यते=मृग्यते। प्रसीद, प्रसीद=प्रसन्नो भव, प्रसन्नो भव, जन्मान्तरेऽपि=अन्यत् जन्म=जन्मान्तरम् तत्र, त्वमेव मम पतिः स्याः इत्येतदर्थमयमपवासः क्रियते—

पूर्वजन्मनि या विद्या पूर्वजन्मनि यद्धनम्।
पूर्वजन्मनि या नारी अग्रे धावति धावति ॥

इति वचनमनुसृत्य साम्प्रतं भवतः सौन्दर्यादिवृद्ध्यर्थं कुरूपतापरिहारार्थञ्च मयाऽयमुपवासः गृहीत इति भवता न क्रोद्धव्यम्। उपोषिता=गृहीतोपवासा, अस्मि=भवामि।

विमर्श—अभिरूपपतिः—'अभिरूपो बुधे रम्ये' इस मेदिनीकोष के अनुसार सुन्दर एवं विद्वान् 'अभिरूप' होता है। इसीलिये 'अनुरूप' शब्द की अपेक्षा 'अभिरूप' शब्द का प्रयोग सुन्दर है। अभिरूपः पतिर्यस्मात्=यदनुष्ठानात् स अभिरूपपतिः। जिसके अनुष्ठान से सुन्दर और विद्वान् पति प्राप्त होता है, वैसा व्रत=उपवास है। उपवास - उपोष्यतेऽस्मिन् तत् — इस अधिकरण अर्थ में उप √ + वस् + घञ् है; और व्रत का विशेषण है, उपवासरूप व्रत। इहलौकिकः—यह अशुद्ध है क्योंकि इहलोके भवः—इस अर्थ में 'अध्यात्मादेष्ठञिष्यते' वार्त्तिक से ठञ = इक करने पर 'अनुशतिकादीनाञ्च' [ पा. सू. ] सूत्र से उभयपद की वृद्धि होनी चाहिये। अतः ऐहलौकिकः यही रूप शुद्ध है। आर्यमिश्राः — इसकी व्याख्या प्रारम्भ में सूत्रधार के व्याख्यान के समय की जा चुकी है। भक्तपरिव्ययेन=मेरे भात को खर्च करके परलोक में होने वाले देवता आदि को पतिरूप में प्राप्त करने की इच्छा अनुचित है। त्वमेव जन्मान्तरेऽपि……भविष्यसि। नटी का आशय यह है कि आप को ही अगले जन्म में पतिरूप में चाहती हूँ, इसीलिये यह व्रत कर रही हूँ, दूसरे पति की कामना से नहीं। अतः आपको नाराज नहीं होना चाहिये।

अर्थ—
**सूत्रधार—**यह, उपवास तुम्हें किसने बताया ?
**नटी—**आपके ही प्रिय मित्र जूर्णवृद्ध ने [ यह उपवास मुझे बताया है ] ।