मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३२ | मृच्छकटिकम् |
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**सूत्र०--**अज्जे ! उठ्ठेहि, उठ्ठेहि ! कहेहि, कहेहि एत्थ उपवासे केण कज्जं ? ( आर्ये ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ, कथय कथय-अत्र उपवासे केन कार्यम् ? )
**नटी--**अम्हारिसजणजोगेण बम्हणेण उवणिमन्तिदेण ( अस्मादृश-जनयोगयेन ब्राह्मणेन उपनिमन्त्रितेन । )
**सूत्र०--**तेण हि गच्छदु अज्जा । अहं पि अम्हारिसजणजोग्गं बम्हणं उपणिमन्तेमि । ( तेन हि गच्छतु आर्या । अहमपि अस्मादृशजनयोग्यं ब्राह्मण-मुपनिमन्त्रयामि । )
**नटी--**जं अज्जो आणवेदि । ( इति निष्क्रान्ता ) । ( यदार्य आज्ञापयति । )
सूत्र०--(परिक्रम्य ।) हीमाणहे ! ता कधं मए एव्वं सुसमिद्धाए उज्जयिणीए अम्हारिसजणजोग्गो बम्हणो अण्णेसितव्वो । ( विलोक्य ) । एसो चारुदत्तस्स मित्तं मित्तेओ इदो ज्जेव आअच्छति । भोदु, पुच्छिस्सं दाव । अज्ज मित्तेअ ! अम्हाणं गेहे असिदं अग्गणी भोदु अज्जो । ( आश्चर्यम् ? तत् कथं मया एवं
तस्याः केशकलापम्—नवीन परिणीता वधू के केशकलाप जिस प्रकार सुगन्धित तैलादि युक्त होते हैं और उनको काटने में राजा पालक की रुचि है, उसी प्रकार जूर्णवृद्ध के सिर को काटने में भी उसे आनन्द ही आयेगा। आर्यमैत्रेय—नटी का अभिप्राय यह है कि यह उपवास आपके सम्बन्ध में ही है; आपको ही भावी जन्म में भी पतिरूप से प्राप्त करने की इच्छा से यह व्रत कर रही हूँ। अतः आपको क्रुद्ध नहीं होना चाहिये।
**अर्थ--सूत्रधार—**आर्ये ! उठो, उठो, बताओ, बताओ—इस उपवास में किस प्रकार की आवश्यकता है ? [ अर्थात् क्या क्या पदार्थ चाहिये । ]
नटी--[ निर्धन ] हमलोगों के योग्य ब्राह्मण को निमन्त्रित करने की आवश्यकता है।
**सूत्रधार—**तो आर्या आप जाइये । मैं भी [ निर्धन ] हमलोगों के योग्य ब्राह्मण को उपनिमन्त्रित करता हूँ । [ भोजन के लिये बुलाता हूँ । ]
**नटी—**श्रीमान् की जैसी आज्ञा । [ ऐसा कह कर चली जाती है । ]
सूत्रधार—( घूमकर ) आश्चर्य ! तो कैसे इस सुसमृद्ध उज्जैन नगरी में मैं [निर्धन] अपने योग्य ब्राह्मण को खोजूँ । ( देख कर ) चारुदत्त का मित्र यह मैत्रेय इधर ही आ रहा है ! अच्छा, तो उससे पूछता हूँ । आर्य मैत्रेय ! श्रीमान् जी ( आज ) मेरे घर भोजन करने के लिये पधारें ।
**टीका--**अत्र=अस्मिन् उपवासे, केन=पदार्थेन, कीदृशेन पुरुषविशेषेण वा, कार्यम्=प्रयोजनम्, साध्यमिति शेषः । अस्मादृशजन-योग्येन=अस्मत्सदृशस्य निर्धनस्य जनस्यानुरूपेण, अस्मन्निमन्त्रणस्वीकारकत्र्रेत्यर्थः, उपनिमन्त्रितेन=भोजन-