भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः

( प्रविश्य प्रावारहस्तः )

मैत्रेयः— ('अण्णं बम्हणम्' इति पूर्वोक्तं पठित्वा ।) अधवा मए वि मित्तेण परस्स आमन्तणआईं भक्खिदव्वाईं। हा अवत्थे ! तुलोअसि। जो णाम अहं तत्तभवदो चारुदत्तस्स रिद्धीए अहो-रत्तं पअतणसिद्धेहिं उग्गारसुरहिगन्धेहिं मोदकेहिं ज्जेव असिदो अब्भन्तरचदुस्सालदुआए उवविट्ठो मल्लकसद्परिखुदो चित्तअरो विअ अङ्गु-


निबन्धः=दुराग्रहः । एतेन=मैत्रेयेण, भवतु=विकल्प इति भावः । अन्यमिति कथनेन ब्राह्मणभोजनाभावे स्वस्यापि भोजनदौर्लभ्यमिति सूचितम् ।

**विमर्श—**प्रत्यादिष्टः—प्रति+आङ्+√विश्+क्त । अन्यं ब्राह्मणमुपनिमन्त्रयामि अन्य ब्राह्मण को निमन्त्रित करना आवश्यक है; क्योंकि ब्राह्मण-भोजन के बिना सूत्रधार को भी भोजन मिलना सम्भव नहीं है और वह बहुत अधिक भूखा है । अतः दूसरा कोई मार्ग नहीं है ।

**आमुखम्—**जहाँ सूत्रधार नटी या विदूषक आदि के साथ वार्तालाप करते हुये विचित्र उक्ति के द्वारा प्रस्तुत वस्तु का संकेत करता हुआ अपने कार्य का कथन करता है-वहाँ आमुख अथवा प्रस्तावना होती है । इसका लक्षण—

नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा । सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते ॥ चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः । आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनाऽपि ।। साहित्यदर्पण ६-३१-३३

इस प्रस्तावना के पाँच भेद होते हैं—

(१) उद्घातक, (२) कथोद्घात, (३) प्रयोगातिशय, (४) प्रवर्तक, (५) अवगलित—द्र० साहित्यदर्पण ६।३३। यहाँ पर प्रयोगातिशय नामक प्रस्तावना है क्योंकि यहाँ एक प्रयोग-सूत्रधार का निमन्त्रणार्थ ब्राह्मण को खोजना—यह प्रस्तुत है, उसी समय 'एष चारुदत्तस्य मित्रं मैत्रेय इत एवागच्छति' इस अन्य प्रयोग से दूसरे पात्र का प्रवेश बताया जा रहा है—

यदि प्रयोग एकस्मिन् प्रयोगोऽन्यः प्रयुज्यते । तेन पात्रप्रवेशश्चेत् प्रयोगातिशयस्तदा ।। सा० द० ६।३६

कुछ लोगों के अनुसार 'कथोद्घात' यह भेद है क्योंकि सूत्रधार के वाक्य को लेकर अन्य पात्र विदूषक का प्रवेश होता हैं—

सूत्रधारस्य वाक्यं वा समादायार्थमस्य वा । भवेत् पात्रप्रवेशश्चेत् कथोद्घातः स उच्यते ।। सा० द० ६।३५