मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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कला को' यह अर्थ है। (३) वेश:=अग्निवेशनामक राजा, 'नाम का जहाँ ग्रहण होता है, वहाँ उसके एक भाग का भी ग्रहण होता है' इस नियम से 'वैशिकीम्= राजा अग्निवेश द्वारा लिखित चौंसठ कलाओं के प्रतिपादक ग्रन्थ को' यह अर्थ होता है।
'वैशिकी' शब्द तद्धितान्त है अतः इसे 'कला' का विशेषण का मानना उचित है।
इस श्लोक में 'अग्निं प्रविष्ट;' इस भूतकालिक प्रयोग से अनेक शङ्काएँ उपस्थित हुई हैं। (१) लेखक स्वयम् अपनी मृत्यु का उल्लेख कैसे कर सकता है? (२) यदि यह अंश लेखक द्वारा नहीं लिखा गया है तो इसे प्रक्षिप्त मानने में क्या बाधा है? (३) मृत्यु रूप अमङ्गल का उल्लेख करना कहाँ तक उचित है?
इनके समाधानार्थ विद्वानों ने कुछ सुझाव रखे हैं—(१) ज्योतिष आदि के द्वारा अपनी पूर्ण आयु का ज्ञान होने पर स्वेच्छा से अग्नि में अपनी देह का परित्याग करना सम्भव है। प्रस्तुत श्लोक लेखक के पुत्र अथवा अन्य किसी विद्वान् ने लिखकर जोड़ दिया है। इसका समर्थन अग्रिम श्लोक में प्रयुक्त 'बभूव' पद भी करता है। (२) जिस प्रकार अन्य अनेक कवियों की कृतियाँ धनप्राप्ति के बाद आश्रयदाता राजा के नाम से प्रसिद्ध हुई हैं, सम्भव है उसी प्रकार यह भी किसी आश्रित कवि की कृति है जो राजा शूद्रक के नाम से प्रसिद्ध है। (३) प्रक्षिप्त अंश अथवा अन्य की कृति मान लेने पर अमंगल का उल्लेख उतना अनुचित नहीं रहता है क्योंकि शूद्रक के जीवन की पूर्ण सफलता का चित्रण इसमें किया गया है। इस सन्दर्भ में मेरा यह विनम्र परामर्श है कि यहाँ 'प्रविष्ट:' यह अशुद्ध पाठ मानकर इसके स्थान पर भविष्यत्कालिक लुट् लकार का प्रयोग 'प्रवेष्टा' यह मान लेना चाहिये। इससे स्वयं मरण का उल्लेख करना सम्भव है। ज्योतिष आदि के द्वारा अपनी आयु का ज्ञान हो जाने पर उस निश्चित क्षण में वह अपनी इच्छा से अग्नि में प्रवेश कर जायगा। इस प्रकार समस्त शंकाओं का समाधान हो जाता है। दूसरा सुझाव यह है कि यहाँ भूतत्व की अविवक्षा कर दी जाय। तीसरा समाधान है 'प्रविष्टो भविष्यति' यह अर्थ करने के लिये 'भविष्यति' पद का आक्षेप कर लिया जाय। 'सिद्धस्य गतिश्चिन्तनीया' के अनुसार तर्कसंगत समाधान आवश्यक है।
शर्व—ईश्वरः शर्व ईशानः शङ्करश्चन्द्रशेखरः। अमरकोश १।३०
वीक्ष्य=वि√ईक्ष्+ल्यप्। इष्ट्वा=√यज्+क्त्वा, 'य्' का सम्प्रसारण 'इ' और 'अ' का पूर्वरूप तथा ज् का ष् और त् का ष्टुत्व। अश्वमेधः--अश्वस्य मेधः=पशु-त्वेनोपालम्भनं यस्मिन् यागे सः—बहुव्रीहिसमास। स्रग्धरा छन्द है। इसका लक्षण—
म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम् ॥४॥