भारतकोश
मुद्गल पुराण (अष्टावतार चरितम्)

मुद्गल पुराण (अष्टावतार चरितम्)

Mudgala Puranam with Commentary

महर्षि मुद्गल द्वारा

स्रोत: निर्णय सागर प्रेस · निर्णय सागर प्रेस (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,023 पृष्ठ

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पृष्ठ 913

यहाँ पृष्ठ का मूल पाठ (पंक्तिबद्ध लिप्यंतरण), श्लोकानुसार अन्वय, हिन्दी अनुवाद तथा कथा-प्रसंग प्रस्तुत है:


मूल पाठ (पंक्तिबद्ध लिप्यंतरण)

खं. ८ अ. ४४ | पान १०४ 卐卐 खिन्न इव संस्थितः ॥२५॥ तदादि गाणपत्योऽहं जातः संपूर्णभावतः । अभजं तं विशेषेण पत्न्या चिंतामणिं सदा ॥२६॥ प्रियां गणेशस्यात्यंतं दूर्वां ज्ञात्वा महामुने । दूर्वाभिरयुतेनाऽपूजयं तं नित्यमादरात् ॥२७॥ मदीयसहगत्वेन किंचिच्छुद्धा- ऽब्रवीदूचः । आश्रया मां किमर्थं त्वं तृणानुष्ठानतत्परः ॥२८॥ भार्याया वचनं श्रुत्वा संशयेन समन्वितम् । तस्यै गणेश्वरे भक्तिदानार्थं त्वब्रुवं वचः ॥२९॥ दूर्वार्पणेन विघ्नेशः संतुष्टो जायते परे । न तथा द्रव्यकायैश्च वस्त्रैर्नैवेद्यमुख्यकैः ॥३०॥ विना दूर्वां निराहारो तिष्ठति गणनायकः । निष्फला जायते पूजा कृता नानाविधा किल ॥३१॥ एकदूर्वांकुरं भक्त्या फलं केन न गण्यते । समर्पयेद्गणेशाय तस्मात्तं दूर्वयाऽर्चयेत् ॥३२॥ ततस्तस्या हृदि संस्थः संशयो न जगाम ह । एकदूर्वांकुरं गृह्याऽऽददां तस्यै हिताय च ॥३३॥ अवदं गच्छ देवेशं देवेंद्रं दूर्वया समम् । सुवर्णं देहि विघ्नेश पूजायां स्थितया प्रभो ॥३४॥ प्रिये न न्यूनमधिकं त्वया ग्राह्यं कदाचन । तथेति नम्य मां सा वै जगाम देवनायकम् ॥३५॥ तेन संपूजिता देवी जगाद मे वचो हितम् । स इंद्रो हर्षसंयुक्तस्तथा चकार विप्रप ॥३६॥ त्रैलोक्यं घटमध्ये स समारोप्य क्रमेण च । तथापि दूर्वया तुल्यं न बभूव महामुने ॥३७॥ दृष्ट्वाऽतिखेदसंयुक्तः संस्मार पंच देवपान् । तेऽपि स्वपुरसंयुक्ता जग्मुः कार्यप्रसिद्धये ॥३८॥ सर्वे सग्रामसस्त्रीकाः शिवविष्णुमुखाऽमराः । घटे स्थितास्तथा तेऽपि दूर्वया नाभवन् समाः ॥३९॥ ततस्तैर्मायया सर्वं ब्रह्मांडं लोकसंकुलम् । घटे क्षिप्तं तथा तन्न दूर्वया च समं कदा ॥४०॥ दृष्ट्वा ते भयसंयुक्ता मम शापाच्च विप्रप । आययु- श्राश्रयायुक्ता आश्रमे मे सुदुःखिनः ॥४१॥ प्रणम्य मां विधिस्तत्र सर्वैर्जगाद शोकतः । दासास्ते मुनिशार्दूल दूर्वापुण्येन वै कृताः ॥४२॥ एकदूर्वासमं नैव ब्रह्मांडं भवति प्रभो । गणेशपूजने क्षिप्ता त्वया कौंडिन्यसत्तम ॥४३॥ एकदूर्वांकुराज्जातं फलं चिंतामणिः स्वयम् । दास्यति ते महाभाग न वयं तत्समा यतः ॥४४॥ आज्ञापय करिष्यामो दासास्ते कार्यमुत्तमम् । नित्यं कार्यकारणान् स्वामिन् पालयस्व सुरेश्वरान् ॥४५॥ तेषां वचनमाकर्ण्य तान् पूज्य प्राब्रुवं वचः । विधे सर्वैः समायुक्तो गच्छ त्वं स्वपदं प्रभो ॥४६॥ नाहं दूर्वाफले सक्तो भार्याबोधार्थमंजसा । कृतं मया महादेवा दासोऽहं क्षम्यतामिति ॥४७॥ ततस्ते सर्वदेवेशा ययुः स्वस्वपदं मुदा । भार्या मे श्रद्धया युक्ता गाणपत्याऽभवत् सदा ॥४८॥ स्त्रिया नित्यं महाभाग भजामि गणनायकम् । चित्तस्थिरकृते क्षेत्रे स्थितं चिंतामणिं मुदा ॥४९॥ अतस्त्वमपि विप्रेश शांतिमिच्छसि चेत्तदा । 卐


श्लोक, अन्वय एवं सरल हिन्दी अनुवाद

श्लोक २५-२६

तदादि गाणपत्योऽहं जातः संपूर्णभावतः । अभजं तं विशेषेण पत्न्या चिंतामणिं सदा ॥२६॥

  • अन्वय: तदादि अहं संपूर्णभावतः गाणपत्यः जातः। पत्न्या (सह) तं चिंतामणिं सदा विशेषेण अभजम्।
  • हिन्दी अनुवाद: उस समय से मैं पूर्ण भाव से गणेश-भक्त (गाणपत्य) हो गया और अपनी पत्नी के साथ उन चिन्तामणि गणेश का विशेष रूप से सदा भजन-पूजन करने लगा।

श्लोक २७-२९

प्रियां गणेशस्यात्यंतं दूर्वां ज्ञात्वा महामुने । दूर्वाभिरयुतेनाऽपूजयं तं नित्यमादरात् ॥२७॥ मदीयसहगत्वेन किंचिच्छुद्धाऽब्रवीद्वचः । आश्रया मां किमर्थं त्वं तृणानुष्ठानतत्परः ॥२८॥ भार्याया वचनं श्रुत्वा संशयेन समन्वितम् । तस्यै गणेश्वरे भक्तिदानार्थं त्वब्रुवं वचः ॥२९॥

  • अन्वय: हे महामुने! दूर्वां गणेशस्य अत्यंतं प्रियां ज्ञात्वा, आदरात् नित्यम् अयुतेन दूर्वाभिः तं अपूजयम्। मदीय-सहगत्वेन किंचित् शुद्धा (सा) वचः अब्रवीत्—मां आश्रया, त्वं किमर्थं तृणानुष्ठानतत्परः (असि)? भार्यायाः संशयेन समन्वितं वचनं श्रुत्वा, तस्यै गणेश्वरे भक्तिदानार्थं वचः अब्रुवम्।
  • हिन्दी अनुवाद: हे महामुनि! दूर्वा श्रीगणेश को अत्यंत प्रिय है—यह जानकर मैं प्रतिदिन आदरपूर्वक दस हज़ार (अयुत) दूर्वाओं से उनका पूजन करता था। मेरी सहधर्मिणी होने के नाते कुछ शुद्ध भाव से उसने मुझसे कहा—"मेरा आश्रय लेकर आप घास-फूस (दूर्वा) के इस अनुष्ठान में क्यों लगे हुए हैं?" पत्नी के इस संशययुक्त वचन को सुनकर, उसके हृदय में गणेश-भक्ति उत्पन्न करने के लिए मैंने ये वचन कहे।

श्लोक ३०-३२

दूर्वार्पणेन विघ्नेशः संतुष्टो जायते परे । न तथा द्रव्यकायैश्च वस्त्रैर्नैवेद्यमुख्यकैः ॥३०॥ विना दूर्वां निराहारो तिष्ठति गणनायकः । निष्फला जायते पूजा कृता नानाविधा किल ॥३१॥ एकदूर्वांकुरं भक्त्या फलं केन न गण्यते । समर्पयेद्गणेशाय तस्मात्तं दूर्वयाऽर्चयेत् ॥३२॥

  • अन्वय: हे परे! दूर्वार्पणेन विघ्नेशः तथा संतुष्टः जायते, न द्रव्यकायैः, वस्त्रैः, नैवेद्यमुख्यकैः च। दूर्वां विना गणनायकः निराहारः तिष्ठति, नानाविधा कृता पूजा किल निष्फला जायते। भक्त्या गणेशाय एकदूर्वांकुरं समर्पयेत्, (तस्य) फलं केन न गण्यते? तस्मात् तं दूर्वया अर्चयेत्।
  • हिन्दी अनुवाद: हे प्रिये! केवल दूर्वा अर्पित करने से विघ्नहर्ता जैसे संतुष्ट होते हैं, वैसे अनेक द्रव्यों, वस्त्रों अथवा मुख्य नैवेद्यों से भी नहीं होते। दूर्वा के बिना गणनायक निराहार रहते हैं और उनके बिना की गई अनेक प्रकार की पूजा भी निष्फल हो जाती है। भक्तिपूर्वक गणेश जी को एक दूर्वांकुर समर्पित करने का जो फल है, उसकी गणना कौन कर सकता है? इसलिए दूर्वा से ही उनकी अर्चना करनी चाहिए।

श्लोक ३३-३६

ततस्तस्या हृदि संस्थः संशयो न जगाम ह । एकदूर्वांकुरं गृह्याऽऽददां तस्यै हिताय च ॥३३॥ अवदं गच्छ देवेशं देवेंद्रं दूर्वया समम् । सुवर्णं देहि विघ्नेश पूजायां स्थितया प्रभो ॥३४॥ प्रिये न न्यूनमधिकं त्वया ग्राह्यं कदाचन । तथेति नम्य मां सा वै जगाम देवनायकम् ॥३५॥ तेन संपूजिता देवी जगाद मे वचो हितम् । स इंद्रो हर्षसंयुक्तस्तथा चकार विप्रप ॥३६॥

  • अन्वय: ततः तस्याः हृदि संस्थः संशयः न जगाम ह। तस्यै हिताय एकं दूर्वांकुरं गृह्य आददाम्। अवदं—देवेशं देवेंद्रं गच्छ, (वद) प्रभो! विघ्नेश-पूजायां स्थितया दूर्वया समं सुवर्णं देहि। हे प्रिये! त्वया कदाचन न्यूनम् अधिकं वा न ग्राह्यम्। सा 'तथा' इति मां नम्य देवनायकं जगाम। तेन संपूजिता देवी मे हितं वचः जगाद। हे विप्रप! सः इंद्रः हर्षसंयुक्तः तथा चकार।
  • हिन्दी अनुवाद: इसके बाद भी उसके हृदय का संशय दूर नहीं हुआ। तब उसके कल्याण के लिए मैंने एक दूर्वांकुर लेकर उसे दिया और कहा—"तुम देवेश इन्द्र के पास जाओ और कहो कि हे प्रभो! गणेश-पूजा में प्रयुक्त इस एक दूर्वा के बराबर मुझे सुवर्ण (सोना) दीजिए। हे प्रिये! तुम इस दूर्वा से न तो रत्ती भर कम लेना और न ही अधिक।" वह 'बहुत अच्छा' कहकर मुझे प्रणाम कर इन्द्र के पास गई। इन्द्र द्वारा पूजित होकर उसने मेरी कही बात बताई। हे विप्रवर! इन्द्र ने भी प्रसन्न होकर वैसा ही करना स्वीकार किया।

श्लोक ३७-४१

त्रैलोक्यं घटमध्ये स समारोप्य क्रमेण च । तथापि दूर्वया तुल्यं न बभूव महामुने ॥३७॥ दृष्ट्वाऽतिखेदसंयुक्तः संस्मार पंच देवपान् । तेऽपि स्वपुरसंयुक्ता जग्मुः कार्यप्रसिद्धये ॥३८॥ सर्वे सग्रामसस्त्रीकाः शिवविष्णुमुखाऽमराः । घटे स्थितास्तथा तेऽपि दूर्वया नाभवन् समाः ॥३९॥ ततस्तैर्मायया सर्वं ब्रह्मांडं लोकसंकुलम् । घटे क्षिप्तं तथा तन्न दूर्वया च समं कदा ॥४०॥ दृष्ट्वा ते भयसंयुक्ता मम शापाच्च विप्रप । आययुश्चाश्रयायुक्ता आश्रमे मे सुदुःखिनः ॥४१॥

  • अन्वय: हे महामुने! सः क्रमेण त्रैलोक्यं घटमध्ये (तुलायाम्) समारोप्य, तथापि दूर्वया तुल्यं न बभूव। दृष्ट्वा अतिखेदसंयुक्तः (इंद्रः) पंच देवपान् संस्मार। ते अपि स्वपुरसंयुक्ताः कार्यप्रसिद्धये जग्मुः। सर्वे सग्राम-सस्त्रीकाः शिव-विष्णु-मुखाः अमराः घटे स्थिताः, तथा ते अपि दूर्वया समाः न अभवन्। ततः तैः मायया सर्वं लोकसंकुलं ब्रह्मांडं घटे क्षिप्तम्, तथापि तत् कदा दूर्वया समं न (अभवत्)। हे विप्रप! ते दृष्ट्वा मम शापात् भयसंयुक्ताः सुदुःखिनः आश्रयायुक्ताः मे आश्रमे आययुः।
  • हिन्दी अनुवाद: हे महामुने! इन्द्र ने तराजू के एक पलड़े पर क्रमशः तीनों लोकों का भार रख दिया, फिर भी वह उस एक दूर्वा के बराबर न हो सका। यह देखकर अत्यंत खिन्न हुए इन्द्र ने अन्य पाँचों दिक्पालों/देवों का स्मरण किया। वे भी अपने-अपने नगरों सहित कार्य-सिद्धि के लिए आए। शिव, विष्णु आदि समस्त देवता अपने ग्रामों और पत्नियों सहित तराजू के पलड़े पर बैठ गए, फिर भी वे उस दूर्वा की बराबरी न कर सके। इसके पश्चात् उन्होंने अपनी माया से सम्पूर्ण लोकों से भरे ब्रह्माण्ड को तराजू में डाल दिया, फिर भी वह उस दूर्वा के समान भारी न हो सका। यह देखकर तथा मेरे शाप के भय से अत्यंत दुःखी व भयभीत होकर वे सभी देवता सहायता की आस में मेरे आश्रम में आए।

श्लोक ४२-४५

प्रणम्य मां विधिस्तत्र सर्वैर्जगाद शोकतः । दासास्ते मुनिशार्दूल दूर्वापुण्येन वै कृताः ॥४२॥ एकदूर्वासमं नैव ब्रह्मांडं भवति प्रभो । गणेशपूजने क्षिप्ता त्वया कौंडिन्यसत्तम ॥४३॥ एकदूर्वांकुराज्जातं फलं चिंतामणिः स्वयम् । दास्यति ते महाभाग न वयं तत्समा यतः ॥४४॥ आज्ञापय करिष्यामो दासास्ते कार्यमुत्तमम् । नित्यं कार्यकारणान् स्वामिन् पालयस्व सुरेश्वरान् ॥४५॥

  • हिन्दी अनुवाद: वहाँ ब्रह्मा जी ने सभी देवों के साथ मुझे प्रणाम कर शोकपूर्वक कहा—"हे मुनिश्रेष्ठ! आपकी दूर्वा के पुण्य ने हमें आपका दास बना दिया है। हे कौण्डिन्य श्रेष्ठ! गणेश-पूजन में आपके द्वारा अर्पित एक दूर्वा के बराबर यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी नहीं हो सकता। उस एक दूर्वांकुर से उत्पन्न फल स्वयं चिन्तामणि गणेश ही आपको देंगे, क्योंकि हम देवतागण उसके समान कदापि नहीं हैं। आप हमें आज्ञा दें, हम आपके दास बनकर उत्तम कार्य करेंगे। हे स्वामी! हम आज्ञाकारी सुरेश्वरों का आप नित्य पालन-रक्षण करें।"

श्लोक ४६-४९

तेषां वचनमाकर्ण्य तान् पूज्य प्राब्रुवं वचः । विधे सर्वैः समायुक्तो गच्छ त्वं स्वपदं प्रभो ॥४६॥ नाहं दूर्वाफले सक्तो भार्याबोधार्थमंजसा । कृतं मया महादेवा दासोऽहं क्षम्यतामिति ॥४७॥ ततस्ते सर्वदेवेशा ययुः स्वस्वपदं मुदा । भार्या मे श्रद्धया युक्ता गाणपत्याऽभवत् सदा ॥४८॥ स्त्रिया नित्यं महाभाग भजामि गणनायकम् । चित्तस्थिरकृते क्षेत्रे स्थितं चिंतामणिं मुदा ॥४९॥

  • हिन्दी अनुवाद: उनके वचनों को सुनकर और उनका सत्कार कर मैंने कहा—"हे ब्रह्मदेव! आप सभी देवताओं सहित प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने धाम को पधारें। मैं दूर्वा के किसी फल में आसक्त नहीं हूँ, यह सब तो केवल मैंने अपनी पत्नी के संशय-निवारण (ज्ञानवर्धन) के लिए किया था। हे देवगण! मैं तो आपका दास हूँ, मुझे क्षमा करें।" तदुपरांत वे सभी देवेश्वर प्रसन्न होकर अपने-अपने लोकों को चले गए। मेरी पत्नी भी पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर सदा के लिए अनन्य गणेश-भक्त बन गई। हे महाभाग! तब से मैं अपनी पत्नी सहित चित्त को स्थिर करने वाले इस क्षेत्र में विराजमान श्री चिन्तामणि गणनायक का नित्य हर्षपूर्वक भजन करता हूँ।

कथा-प्रसंग (सारांश)

प्रस्तुत अंश में महर्षि कौण्डिन्य अपनी पत्नी के मन में गणेश-पूजन में अर्पित होने वाली 'दूर्वा' की महिमा के प्रति संशय मिटाने की कथा का वर्णन कर रहे हैं। जब उनकी पत्नी एक साधारण घास की महत्ता पर संदेह करती है, तो महर्षि उसे गणेश जी पर चढ़ी एक दूर्वा देकर इन्द्र से उसके बराबर सुवर्ण तोलकर लाने को कहते हैं। इन्द्र, शिव, विष्णु, समस्त देवता और अंततः सम्पूर्ण त्रिलोकी व ब्रह्माण्ड भी तराजू पर रखे जाने के बाद उस एक दूर्वा के भार की समता नहीं कर पाते। अंत में पराजित होकर सभी देवता महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम में आकर क्षमा मांगते हैं और भगवान गणेश की दूर्वा की असीम महिमा को स्वीकार करते हैं।