भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 488 में से

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मुद्राराक्षसम्

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**हिन्दी अनुवाद—नटी—**आर्य ! यह मैं हूँ । आप मुझे आज्ञा देकर अनुगृहीत करें ।

**सूत्रधार—**आर्ये ! आज्ञा अभी रहने दो। यह तो बताओ कि क्या आज तुमने पूज्य ब्राह्मणों को निमन्त्रण देकर परिजनों को कृतार्थ किया है, अथवा माननीय अतिथिगण घर पर पधारे हैं, जिससे यह विशिष्ट भोजन का आयोजन हो रहा है ।

**नटी—**आर्य ! मैंने महिमाशाली ब्राह्मणों को निमंत्रित किया है ।

**सूत्रधार—**कहो, किसलिए ।

**नटी—**भगवान् चन्द्रमा का ग्रहण लग रहा है ।

**सूत्रधार—**आर्ये ! किसने ऐसा कहा है ।

**नटी—**नगर के लोग ऐसा कह रहे हैं ।

**टिप्पणी—आर्ये—**पूज्य ! आराद् याता इति आर्या अर्थात् 'आराद् दूरसमीपयोः' इत्यनेन आराद् = असभ्यतादुराचारादिदोषेभ्यो दूरं गताश्च शिक्षासभ्यताविद्यादिभि देवास्पदत्वं प्राप्ता इति आर्याः । पृषोदरादित्वात् साधुत्वम् । अथवा अर्त्तुं योग्या आर्या √ऋ ( गतौ ) + ण्यत् 'ऋहलोर्ण्यत्' इत्यनेन । वसिष्ठ के मत से आर्य का लक्षण यह है—'कर्त्तव्यमाचरन् काममकर्त्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारे स वा आर्य इति स्मृत ।।' नटी और सूत्रधार परस्पर 'आर्य' और 'आर्या' कहकर एक दूसरे को सम्बोधित करते हैं—'वाच्यौ नटीसूत्रधारावाद्य नाम्ना परस्परम्' । आज्ञानियोग—आदेश द्वारा कार्य मे लगाना। नि√युज् + णिच् + घञ् भावे = नियोग । आज्ञया नियोग आज्ञानियोग-तृतीयातत्० । **तत्रभवताम्—**पूज्य । भवत् शब्द के साथ 'तत्र' और 'अत्र' जोड देने से आदर सूचित होता है । किन्तु उपस्थित व्यक्ति के लिए 'अत्र' और अनुपस्थित के लिए 'तत्र' जोडना चाहिये । तेषां भवताम् इति तत्रभवताम् । यहाँ 'तेषाम्' 'तत्र' के रूप मे परिणत हो जाता है । तद् + तल् 'इतराम्योऽपि दृश्यन्ते' इत्यनेन । अतएव 'तत्र और 'भवताम्' अलग-अलग मानना चाहिए । यदि एक ही शब्द मानना हो तो इस प्रकार समास करना चाहिए—'ते भवन्त तत्रभवन्त'

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