भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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है। तात्पर्य यह है कि जो बात कारण बनकर बीच की कथा को आगे बढ़ाती है तथा प्रधान कथा को भी चालू रखती है, वही बिन्दु है।

(३) पताका तथा (४) प्रकरी— इन दोनों ही अर्थप्रकृतियों के आधार पर प्रासङ्गिक कथावस्तु के द्वारा मुख्य कथानक का उपकार किया जाया करता है। इन दोनों प्रकार की प्रासङ्गिक-कथाओ के नायको की सम्पूर्ण चेष्टाये प्रधान नायक की फल की सिद्धि करने के लिये ही हुआ करती हैं।

(५) कार्य— जिस फल की प्राप्ति के निमित्त सम्पूर्ण साधनादि सामग्री एकत्रित की जाती है, उसे कार्य कहते हैं।

अर्थावस्थाये

फल-प्राप्ति के इच्छुक पात्रों द्वारा प्रारम्भ किये हुये कार्य की पाँच अवस्थाये हुआ करती हैं :—(१) आरम्भ, (२) यत्न, (३) प्राप्त्याशा, (४) नियताप्ति तथा (५) फलागम।

(१) आरम्भ— महान् फल की प्राप्ति के हेतु जहाँ मात्र उत्कण्ठा ही हुआ करती है, प्रयत्न नही होता, उसी को 'आरम्भ' कहा जाता है।

(२) यत्न— फल-प्राप्ति के लिये अत्यन्त शीघ्रता के साथ जो व्यापार किया जाता है, उसे यत्न कहते है।

(३) प्राप्त्याशा— जहाँ प्राप्ति की आशा, उपाय तथा अपाय (विघ्न) की आशंकाओं से घिरी रहती है किन्तु फिर भी प्राप्ति की संभावना रहा करती है, उसी को प्राप्त्याशा नामक अवस्था कहा जाता है।

(४) नियताप्ति— जब विघ्न समाप्त हो जाते है तथा फल की प्राप्ति निश्चित हो जाया करती है तो इसी अवस्था को नियताप्ति नाम से कहा जाता है।

(५) फलागम— अभीष्ट फल का पूर्ण रूप से मिल जाना ही फलागम कहा जाता है।

पञ्च सन्धियाँ

उपर्युक्त पाँच अर्थप्रकृतियों तथा पाँच अर्थावस्थाओं के क्रमिक संयोग से पाँच