भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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मूल की दृष्टि से कथावस्तु के पुन तीन भेद—यही कथावस्तु मूल की दृष्टि से पुन तीन प्रकार की हो जाती है। (१) प्रख्यात, (२) उत्पाद्य, (३) मिश्र —

"प्रख्यातोत्पाद्यमिश्रत्वभेदात् त्रेधाऽपि तत्रिधा॥" ॥ दशरूपक १।१५ का पूर्वार्द्ध ॥

(१) प्रख्यात नामक कथावस्तु रामायण, महाभारत, पुराण अथवा बृहत्कथा इत्यादि ऐतिहासिक ग्रन्थों के आधार पर हुआ करती है। यह कथानक प्रसिद्ध कथा के साथ सम्बद्ध रहा करता है। जैसे—अभिज्ञान शाकुन्तल, उत्तर रामचरित तथा वेणीसंहार इत्यादि नाटकों की कथावस्तुयें। (२) उत्पाद्य नामक कथावस्तु कवि द्वारा स्वयं की कल्पना प्रसूत हुआ करती है। (३) मिश्र नामक कथावस्तु की पृष्ठभूमि प्रख्यात हुआ करती है किन्तु उसमें का अधिकांश भाग कवि-कल्पित हुआ करता है। अतः इसका निर्माण प्रख्यात तथा उत्पाद्य दोनों ही प्रकार की कथावस्तुओं के मिश्रण से होता है। विभिन्न प्रकार की स्थितियों के आधार पर कथानक को पाँच अर्थप्रकृतियों, पाँच अर्थावस्थाओं तथा पञ्च-सन्धियों में विभक्त कर लिया जाया करता है।

पाँच अर्थप्रकृतियाँ

कथानक को प्रमुख फल की ओर अग्रसर करने वाले चमत्कारपूर्ण अंशों को "अर्थप्रकृति" कहा जाता है। कथानक का फल है—त्रिवर्ग सिद्धि अर्थात् धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति। नाटकीय अर्थ में प्रदर्शित इन उद्देश्यों की प्राप्ति के निमित्त जो उपाय किये जायें, उन्हीं को अर्थप्रकृति समझना चाहिये। इसके ५ प्रकार होते हैं—(१) बीज, (२) बिन्दु, (३) पताका, (४) प्रकरी और (५) कार्य। ये अर्थप्रकृतियाँ आधिकारिक-कथावस्तु के निर्वाह में सहायक हुआ करती हैं।

(१) बीज—बीज के द्वारा आधिकारिक कथावस्तु के उद्गम में सहायता प्राप्त हुआ करती है। प्रारम्भ में इसका कथन सूक्ष्म रूप में किया जाता है किन्तु जैसे-जैसे व्यापक शृङ्खला आगे बढ़ती जाती है वैसे ही वैसे इसका भी विस्तार होता चलता है।

(२) बिन्दु—विच्छिन्न कथावस्तु को इसके द्वारा आगे बढ़ाया जाया करता