भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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सर्पिणी के सदृश तथा क्रोधाग्नि से निकलती हुई काली धूमरेखा के सदृश (कभी भी बँध चुकने वाली) मेरी इस शिखा (चोटी) को इस समय भी बँधती हुई नहीं देखना चाहता है? (१।६)।

रंगमंच पर स्थित चाणक्य के उपर्युक्त शब्दों के श्रवणमात्र से ही दर्शकों के हृदयों में समयोचित वीर रस का आस्वादन होने लगता है। इस स्थल पर कल्पना को दौड़ाने की कोई भी आवश्यकता प्रतीत नही होती है। रस को उद्दीप्त करने की सम्पूर्ण सामग्री उपस्थित है। परदा उठने के अनन्तर चाणक्य के शब्दों को सुनते ही रसास्वादन होना प्रारम्भ हो जाता है। इसमें तनिक भी विलम्ब नही होता है। अतः जीवन की सत्यता के अनुभव की दृष्टि से, रसा-प्लावित होने की दृष्टि से तथा रसास्वादन की क्षमता की दृष्टि से यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि काव्य के सम्पूर्ण भेदों में नाटक अथवा रूपक ही पूर्णतया चित्ताकर्षक तथा लोकरंजन का प्रमुख एवम् सर्वश्रेष्ठ साधन है। अतः महाकवि कालिदास द्वारा कथित निम्नलिखित उक्ति की सार्थकता स्पष्ट ही है :—

'नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम् ।' (माल० १।४)

नाट्यशास्त्रकार भरतमुनि के अनुसार भी नाट्य के अन्तर्गत समस्त शास्त्रों तथा कलाओं का समावेश हो जाया करता है। उन्होंने लिखा है :—

"न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो नतत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते।।" भरत नाट्यशास्त्र ।।

अर्थात् कोई भी ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग अथवा कर्म ऐसा नही है कि जिसका दर्शन इस नाट्य में न होता हो।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि काव्यों में नाटकों अथवा रूपको को सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया जाना सर्वथा उपयुक्त ही है।

रूपकों के प्रकार

भरतमुनि तथा उत्तरवर्ती नाट्यशास्त्रकारों ने रूपक के दश भेद स्वीकार किये हैं :—

"नाटकं सप्रकरणं भाणः प्रहसनं डिमः ।
व्यायोगसमवकारौ वीथ्यङ्केहामृगा इति ।।" दशरूपक १।८॥

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