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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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सर्पिणी के सदृश तथा क्रोधाग्नि से निकलती हुई काली धूमरेखा के सदृश (कभी भी बँध चुकने वाली) मेरी इस शिखा (चोटी) को इस समय भी बँधती हुई नहीं देखना चाहता है? (१।६)।

रंगमंच पर स्थित चाणक्य के उपर्युक्त शब्दों के श्रवणमात्र से ही दर्शकों के हृदयों में समयोचित वीर रस का आस्वादन होने लगता है। इस स्थल पर कल्पना को दौड़ाने की कोई भी आवश्यकता प्रतीत नही होती है। रस को उद्दीप्त करने की सम्पूर्ण सामग्री उपस्थित है। परदा उठने के अनन्तर चाणक्य के शब्दों को सुनते ही रसास्वादन होना प्रारम्भ हो जाता है। इसमें तनिक भी विलम्ब नही होता है। अतः जीवन की सत्यता के अनुभव की दृष्टि से, रसा-प्लावित होने की दृष्टि से तथा रसास्वादन की क्षमता की दृष्टि से यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि काव्य के सम्पूर्ण भेदों में नाटक अथवा रूपक ही पूर्णतया चित्ताकर्षक तथा लोकरंजन का प्रमुख एवम् सर्वश्रेष्ठ साधन है। अतः महाकवि कालिदास द्वारा कथित निम्नलिखित उक्ति की सार्थकता स्पष्ट ही है :—

'नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम् ।' (माल० १।४)

नाट्यशास्त्रकार भरतमुनि के अनुसार भी नाट्य के अन्तर्गत समस्त शास्त्रों तथा कलाओं का समावेश हो जाया करता है। उन्होंने लिखा है :—

"न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो नतत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते।।" भरत नाट्यशास्त्र ।।

अर्थात् कोई भी ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग अथवा कर्म ऐसा नही है कि जिसका दर्शन इस नाट्य में न होता हो।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि काव्यों में नाटकों अथवा रूपको को सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया जाना सर्वथा उपयुक्त ही है।

रूपकों के प्रकार

भरतमुनि तथा उत्तरवर्ती नाट्यशास्त्रकारों ने रूपक के दश भेद स्वीकार किये हैं :—

"नाटकं सप्रकरणं भाणः प्रहसनं डिमः ।
व्यायोगसमवकारौ वीथ्यङ्केहामृगा इति ।।" दशरूपक १।८॥

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मूल की दृष्टि से कथावस्तु के पुन तीन भेद—यही कथावस्तु मूल की दृष्टि से पुन तीन प्रकार की हो जाती है। (१) प्रख्यात, (२) उत्पाद्य, (३) मिश्र —

"प्रख्यातोत्पाद्यमिश्रत्वभेदात् त्रेधाऽपि तत्रिधा॥" ॥ दशरूपक १।१५ का पूर्वार्द्ध ॥

(१) प्रख्यात नामक कथावस्तु रामायण, महाभारत, पुराण अथवा बृहत्कथा इत्यादि ऐतिहासिक ग्रन्थों के आधार पर हुआ करती है। यह कथानक प्रसिद्ध कथा के साथ सम्बद्ध रहा करता है। जैसे—अभिज्ञान शाकुन्तल, उत्तर रामचरित तथा वेणीसंहार इत्यादि नाटकों की कथावस्तुयें। (२) उत्पाद्य नामक कथावस्तु कवि द्वारा स्वयं की कल्पना प्रसूत हुआ करती है। (३) मिश्र नामक कथावस्तु की पृष्ठभूमि प्रख्यात हुआ करती है किन्तु उसमें का अधिकांश भाग कवि-कल्पित हुआ करता है। अतः इसका निर्माण प्रख्यात तथा उत्पाद्य दोनों ही प्रकार की कथावस्तुओं के मिश्रण से होता है। विभिन्न प्रकार की स्थितियों के आधार पर कथानक को पाँच अर्थप्रकृतियों, पाँच अर्थावस्थाओं तथा पञ्च-सन्धियों में विभक्त कर लिया जाया करता है।

पाँच अर्थप्रकृतियाँ

कथानक को प्रमुख फल की ओर अग्रसर करने वाले चमत्कारपूर्ण अंशों को "अर्थप्रकृति" कहा जाता है। कथानक का फल है—त्रिवर्ग सिद्धि अर्थात् धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति। नाटकीय अर्थ में प्रदर्शित इन उद्देश्यों की प्राप्ति के निमित्त जो उपाय किये जायें, उन्हीं को अर्थप्रकृति समझना चाहिये। इसके ५ प्रकार होते हैं—(१) बीज, (२) बिन्दु, (३) पताका, (४) प्रकरी और (५) कार्य। ये अर्थप्रकृतियाँ आधिकारिक-कथावस्तु के निर्वाह में सहायक हुआ करती हैं।

(१) बीज—बीज के द्वारा आधिकारिक कथावस्तु के उद्गम में सहायता प्राप्त हुआ करती है। प्रारम्भ में इसका कथन सूक्ष्म रूप में किया जाता है किन्तु जैसे-जैसे व्यापक शृङ्खला आगे बढ़ती जाती है वैसे ही वैसे इसका भी विस्तार होता चलता है।

(२) बिन्दु—विच्छिन्न कथावस्तु को इसके द्वारा आगे बढ़ाया जाया करता

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है। तात्पर्य यह है कि जो बात कारण बनकर बीच की कथा को आगे बढ़ाती है तथा प्रधान कथा को भी चालू रखती है, वही बिन्दु है।

(३) पताका तथा (४) प्रकरी— इन दोनों ही अर्थप्रकृतियों के आधार पर प्रासङ्गिक कथावस्तु के द्वारा मुख्य कथानक का उपकार किया जाया करता है। इन दोनों प्रकार की प्रासङ्गिक-कथाओ के नायको की सम्पूर्ण चेष्टाये प्रधान नायक की फल की सिद्धि करने के लिये ही हुआ करती हैं।

(५) कार्य— जिस फल की प्राप्ति के निमित्त सम्पूर्ण साधनादि सामग्री एकत्रित की जाती है, उसे कार्य कहते हैं।

अर्थावस्थाये

फल-प्राप्ति के इच्छुक पात्रों द्वारा प्रारम्भ किये हुये कार्य की पाँच अवस्थाये हुआ करती हैं :—(१) आरम्भ, (२) यत्न, (३) प्राप्त्याशा, (४) नियताप्ति तथा (५) फलागम।

(१) आरम्भ— महान् फल की प्राप्ति के हेतु जहाँ मात्र उत्कण्ठा ही हुआ करती है, प्रयत्न नही होता, उसी को 'आरम्भ' कहा जाता है।

(२) यत्न— फल-प्राप्ति के लिये अत्यन्त शीघ्रता के साथ जो व्यापार किया जाता है, उसे यत्न कहते है।

(३) प्राप्त्याशा— जहाँ प्राप्ति की आशा, उपाय तथा अपाय (विघ्न) की आशंकाओं से घिरी रहती है किन्तु फिर भी प्राप्ति की संभावना रहा करती है, उसी को प्राप्त्याशा नामक अवस्था कहा जाता है।

(४) नियताप्ति— जब विघ्न समाप्त हो जाते है तथा फल की प्राप्ति निश्चित हो जाया करती है तो इसी अवस्था को नियताप्ति नाम से कहा जाता है।

(५) फलागम— अभीष्ट फल का पूर्ण रूप से मिल जाना ही फलागम कहा जाता है।

पञ्च सन्धियाँ

उपर्युक्त पाँच अर्थप्रकृतियों तथा पाँच अर्थावस्थाओं के क्रमिक संयोग से पाँच

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सन्धियों का सृजन हुआ करता है। ये हैं—(१) मुख सन्धि, (२) प्रतिमुख सन्धि, (३) गर्भ सन्धि, (४) अवमर्श अथवा विमर्श सन्धि तथा (५) निर्वहण (उपसंहार) सन्धि।

(१) मुख सन्धि—बीज तथा आरम्भ को मिलाने वाली सन्धि का नाम ही मुख सन्धि है। इसमें रगो की कल्पना होती है।

(२) प्रतिमुख सन्धि—विन्दु तथा यत्न को मिलाने वाली सन्धि का नाम प्रतिमुख सन्धि है। इसमे मुख सन्धि मे अंकुरित बीज कभी लक्षित होता है और कभी अलक्षित।

(३) गर्भ सन्धि—जिस सन्धि मे उपाय कभी दब जाय और उसकी खोज करने के लिये बीज का और भी विकास हो, उसे गर्भ सन्धि कहते हैं। इसमे प्राप्त्याशा तथा पताका का योग होता है। इसमे पताका की सर्वत्र आवश्यकता नहीं पड़ा करती है। कही पर वह विद्यमान रहती है और कही पर नहीं। किन्तु प्राप्त्याशा का तो होना निश्चित है। इसमे फल अन्तर्निहित रहा करता है। इसी कारण इसका नाम गर्भ सन्धि है।

(४) विमर्श सन्धि—जहाँ पर फल का उपाय तो पहुचने की अपेक्षा अधिक विकसित होता है किंतु विघ्नो के उपस्थित हो जाने से उसमे आघात पहुँचा करता है वहाँ विमर्श सन्धि हुआ करती है। इसमे फल-प्राप्ति की पर्यालोचना की जाती है। इसमे नियताप्ति तथा प्रकरी का योग होता है। किन्तु प्रकरी की स्थिति वैकल्पिक रहा करती है।

(५) निर्वहण सन्धि—जहाँ कार्य और फलागम मिलते हैं अर्थात् प्रयोजन की पूर्ण सिद्धि हो जाती है वहाँ निर्वहण सन्धि होती है।

सन्धियो के उपर्युक्त विवेचन द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि मुख से कार्य का प्रारम्भ होता है, प्रतिमुख मे वह वृद्धि को प्राप्त करता है, गर्भ में वह उत्कर्ष को प्राप्त करता है, विमर्श में फल की ओर झुकता है तथा निर्वहण मे वह पूर्ण सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

नेता (नायक)

सभी प्रकार के काव्यों में जो प्रधान पात्र होता है वही नेता अथवा

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नायक कहलाता है। नेता शब्द 'नी' धातु से बनता है, जिसका अर्थ ले चलना है। जो पात्र कथानक को फल की ओर ले चलता है उसी को 'नेता' कहते हैं। फल का भोक्ता अथवा प्राप्त करने वाला भी यही होता है।

नेता के चार प्रकार— नाट्यशास्त्र की दृष्टि से नेता चार प्रकार का माना गया है—(१) धीरललित, (२) धीरशान्त (३) धीरोदात्त (४) धीरोद्धत। भरतमुनि के अनुसार देवगण धीरोद्धत की श्रेणी में आते हैं। राजा धीरललित, सेनापति एव अमात्य धीरोदात्त तथा ब्राह्मण और वैश्य धीरशान्त श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं :—

" देवा धीरोद्धता ज्ञेयाः स्युर्धीरललिता नृपाः ।
सेनापतिरमात्यश्च धीरोदात्तौ प्रकीर्तितौ ॥
धीरप्रशान्ता विज्ञेया ब्राह्मणा वणिजस्तथा ॥"

॥ नाट्यशास्त्र २४,१८-१९॥

(१) धीरललित नेता का लक्षण— धीरललित नायक राज्य-सम्बन्धी तथा अन्य प्रकार की भी चिन्ताओं से मुक्त होता है क्योंकि उसके योगक्षेम की चिन्ता उसके मन्त्री आदि के द्वारा की जाती है। इसी कारण वह संगीत, नृत्य, चित्र आदि कलाओं का प्रेमी तथा सांसारिक भोग-विलासादि में निरन्तर संलग्न और रसिकवृत्ति का होता है। उसमे शृंगार रस की प्रधानता हुआ करती है। अतः वह सुकोमल स्वभाव एव आचरण से युक्त होता है। इस प्रकार के नायक प्रायः राजा ही हुआ करते हैं :—

"निश्चिन्तो धीरललितः कलासक्त सुखी मृदुः ॥" दशरूपक २।३ ॥

कालिदास द्वारा रचित 'मालविकाग्निमित्र' नामक नाटक का नायक अग्निमित्र इसी श्रेणी का नायक है।

(२) धीरशान्त नेता का लक्षण— विनय इत्यादि सामान्य गुणों से युक्त ब्राह्मण, वैश्य अथवा मन्त्रिपुत्र आदि धीरशान्त नेता कहे जाते हैं। (भवभूति के 'मालतीमाधव' नामक रूपक का नायक 'माधव' इसी कोटि का नायक है) :—

"सामान्यगुणयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिकः ॥" दशरूपक २।४ ॥

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(३) **धीरोदात्त नेता का लक्षण—**यह नायक अतिशय शक्ति-सम्पन्न हुआ करता है । उसका अन्तःकरण क्रोध, शोक आदि विकारों में अभिभूत नहीं होता है । वह अत्यन्त गम्भीर, सहनशील, अविकत्थन (आत्मप्रशंसक न होना) स्थिरचित्त (चंचलता रहित मन वाला), स्वाभिमानी होने पर भी विनम्रता द्वारा दबे हुये अभिमान वाला, दृढ़व्रत (अर्थात् जिस बात को करने का प्रण कर लेता है उसे अन्त तक निभाने वाला) होता है । नाटक का नायक इसी प्रकृति का होना आवश्यक है —

"महासत्त्वोऽतिगम्भीर क्षमावानविकत्थन ।
स्थिरो निगूढहंकारो धीरोदात्तो दृढव्रत ॥" दशरूपक २।४-५ ॥

'अभिज्ञान शाकुन्तल' नामक नाटक का नायक 'दुष्यन्त' इसी श्रेणी के अन्तर्गत आता है ।

(४) **धीरोद्धत नेता का लक्षण—**यह नायक घमण्डी, ईर्ष्यालु, माया (अर्थात् मन्त्रबल से असत्य वस्तुओं को प्रस्त करना) और कपट में परिपूर्ण, अभिमानी, चंचल मन वाला, क्रोधी तथा आत्मप्रशंसक होता है । उसे अपने शौर्य आदि का अभिमान होता है । उसका मन अस्थिर हुआ करता है । इसके अतिरिक्त वह स्वयं ही अपनी डींग मारने वाला होता है —

"दर्पमात्सर्यभूयिष्ठो मायाछद्मपरायण ।
धीरोद्धतस्त्वहं कारी चलश्चण्डो विकत्थन ॥" दशरूपक २।५-६ ॥

परशुराम तथा भीमसेन को इसी श्रेणी का नायक कहा जा सकता है ।

इन चारों प्रकार के नायकों में से 'धीरोदात्त' नायक को ही संस्कृत नाटककारों ने सर्वाधिक स्थान प्रदान किया है (क्योंकि समाज के लिए यही आदर्श होने योग्य है) । यत्र-तत्र धीरशान्त अथवा धीरललित नायक भी दृष्टिगोचर होते हैं, किन्तु धीरोद्धत नायक का प्रयोग तो संस्कृत नाटककारों ने प्रायः प्रतिनायक के रूप में ही किया है ।

नायिका

नाटक इत्यादि रूपकों में नायिका का भी उतना ही महत्त्व है जितना नायक

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का, विशेष रूप से शृंगार रस-प्रधान रूपकों में। नायक की पत्नी अथवा प्रेयसी को ही नायिका कहा जाता है। नायक के सामान्य गुणों का नायिका में भी होना आवश्यक है। नायिका के तीन प्रकार माने गये हैं :—(१) स्वकीया, (२) परकीया तथा (३) सामान्या। स्वकीया अपनी स्त्री, परकीया परायी स्त्री अथवा कन्या तथा सामान्या किसी की भी स्त्री नहीं हुआ करती है।

(१) स्वकीया नायिका—यह नायिका शील, लज्जा आदि गुणों से युक्त होती है। यह पतिव्रता, सच्चरित्रा, अकुटिला, लज्जायुक्त तथा पति के प्रति व्यवहार में कुशल और पति-सेवारत होती है :—

'विनयार्जवादियुक्ता गृहकर्मपरा पतिव्रता स्वीया"

॥ सा० द० ३।५७ ॥

(२) परकीया नायिका—इसके दो प्रकार होते हैं—(१) ऊढा, (२) अनूढा। किसी दूसरे की विवाहिता स्त्री ऊढा की श्रेणी में आती है तथा किसी की अविवाहित पुत्री (कन्या), अनूढा की श्रेणी में आती है :—

"परकीया द्विधा प्रोक्ता परोढा कन्यका तथा। यात्रादिनिरताऽन्योढा कुलटा गलितत्रपा ॥ कन्या त्वजातोपयमा सलज्जा नवयौवना॥" सा० द० ३।६६-६७।।

(३) सामान्या नायिका—यह साधारण स्त्री होती है। गणिका की गणना इसके अन्तर्गत आती है। धन की दृष्टि से यह केवल वाह्य प्रेम को ही प्रकट किया करती है :—

"साधारण स्त्री गणिका कलाप्रागल्भ्यधौर्ययुक् ॥"

॥ दशरूपक २।२१ ॥

रस

सामाजिकों अथवा दर्शकों के हृदय में रसोद्रेक उत्पन्न करना, दृश्य-काव्य का प्रधान उद्देश्य हुआ करता है। किन्तु रस का उतना ही परिपोष किया जाना उचित है कि जिससे कथावस्तु विच्छिन्न न होने पाये। नाटक के लिए जितना आवश्यक तत्त्व 'रस' है उतना ही आवश्यक तत्त्व वस्तु (कथानक) भी है। दोनों ही परस्पर एक दूसरे के सहायक हैं। कथावस्तु का सम्यक् एवं आकर्षक

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प्रतिपादन बिना रस के किया जाना संभव नहीं है। इसी प्रकार जब मुख्य कथा-वस्तु ही नहीं होगी तो रस की अनुभूति किसके आधार पर की जा सकेगी। अतः नाटक में वस्तु तथा रस दोनों ही तत्वों की उपयोगिता समान रूप में है।

कथावस्तु के दो पक्ष और रस

कथावस्तु के दो पक्ष होते हैं—प्रथम पक्ष है व्यवहार पक्ष अर्थात् वास्तव जगत् में यह घटना जिस भाँति घटती है, तथा द्वितीय पक्ष है शास्त्र पक्ष अर्थात् नाटक के द्वारा उसी घटना का चित्रण नाटककार द्वारा जिस किसी रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनमें प्रथम पक्ष लौकिक है तथा द्वितीय अलौकिक। प्रथम पक्ष में रस की अनुभूति नहीं हुआ करती है। यह वह अवस्था होती है जिसमें केवल भाव का उदय-मात्र ही हुआ करता है। रसानुभूति तो द्वितीय पक्ष में हुआ करती है, अर्थात् जब वही घटना कवि की प्रतिभा के बल पर शब्दों के माध्यम द्वारा काव्य अथवा नाटक का चोला पहनकर आती है, तब वह एक अलौकिक वस्तु होती है और तभी वह रस की अनुभूति कराने में समर्थ हुआ करती है। आनन्द की प्राप्ति भी तभी होती है।

इस भौतिक जगत् में रति आदि स्थायी भाव के जो कारण, कार्य और सहकारी हुआ करते हैं वे यदि नाटक अथवा काव्य में प्रयुक्त होते हैं तो वे ही क्रमशः विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव नाम से कहे जाते हैं। इन विभावादि के द्वारा व्यक्त (रति आदि) स्थायी भाव ही 'रस' कहलाता है।

रस-विभाग—भरतमुनि आदि नाट्यशास्त्रकारों ने नाट्य में केवल आठ रसों की ही स्थिति को स्वीकार किया है और वे हैं—(१) शृंगार, (२) हास्य, (३) करुण, (४) रौद्र, (५) वीर, (६) भयानक, (७) वीभत्स तथा (८) अद्भुत।

अंगी (प्रधान) रस

नाटक में अंगी अथवा प्रधान रस एक ही हुआ करता है। यह या तो शृङ्गार रस हो सकता है अथवा वीर। अन्य सभी रसों का प्रयोग अंग (गौण) रूप में किया जा सकता है। इतना अवश्य है कि निर्वहण-संधि में अद्भुत रस का उपनिबन्धन किया जाना नाट्य-सौंदर्य का द्योतक हुआ करता है। अतः उसका वर्णन उक्त संधि के अन्तर्गत किया जाना आवश्यक तथा उचित भी है :—

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“एक एव भवेदङ्गी शृङ्गारो वीर एव वा ।
अङ्गमन्ये रसाः सर्वे कार्यों निर्वहणेऽद्भुतः ॥ सा० द० ६।१०॥

नाटकों का उद्भव

"नाटकों अथवारूपकों का उद्भव कब तथा कैसे हुआ ?" यह एक विवादग्रस्त विषय है। इस विषय में नाट्यशास्त्र-प्रणेता भरतमुनि ने लिखा है कि एक बार सम्पूर्ण देवगण एकत्रित होकर ब्रह्मा के समीप गये तथा उनसे प्रार्थना की कि आप हमको एक ऐसा मनोरंजन का साधन प्रदान कीजिये कि जो श्रव्य तथा दृश्य दोनों ही हो तथा जिसे सभी वर्णों के लोग समान रूप से अपना सके। इनकी इस प्रार्थना को ध्यान में रखते हुये ब्रह्मा ने चारों वेदों से आवश्यक भागो को लेकर पंचम वेद "नाट्य-वेद" की रचना की। इसके निमित्त उन्होने ऋग्वेद से पाठ्य (संवाद, कथोपकथन इत्यादि), सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस के तत्वों को प्राप्त कर इसकी रचना की :-

“एव संकल्प्य भगवान् सर्ववेदाननुस्मरन् ।
नाट्यवेदं ततश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् ॥
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥” ना० शा० १।१६-१७।।

नाटक के निमित्त प्रधान रूप से चार प्रकार के साधनो की आवश्यकता हुआ करती है—(१) सवाद, (२) संगीत, (३) अभिनय तथा (४) रस । ये चारों प्रकार के साधन वेदों में विद्यमान है। अतः उक्त आधार पर वेदों द्वारा नाटकों का उद्भव मानना उचित ही प्रतीत होता है।

ऋग्वेद मे अनेक संवाद-सूक्तों का उल्लेख प्राप्त होता है :- यम-यमी सूक्त-१०।१०।।, पुरूरवा-उर्वशी संवाद-सूक्त-१०।६५।।, इन्द्र-मरुत्-संवाद-१।१६५ तथा १७० ।।, इन्द्र-इन्द्राणी-वृषा-कपि-संवाद-१०।८६।। इत्यादि। इन सूक्तों में नाटकोपयोगी 'संवाद' नामक साधन उपलब्ध होता है। उषस्, मरुत्, इन्द्र, अग्नि आदि देवताओं से सम्बन्धित सूक्तों के अन्तर्गत भी उक्त साधन-सम्बन्धी विषय उपलब्ध होता है। सामवेद में तो संगीत की प्रधानता को सभी ने स्वीकार किया है। यजुर्वेद में वर्णित विभिन्न प्रकार के यज्ञों के

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क्रिया-कलाप मे अभिनय-सम्बन्धी अंश विद्यमान है ही। अथर्ववेद मे भी प्रायः सभी प्रकार के रसो का वर्णन प्राप्त होता है।

उपर्युक्त अति सूक्ष्म विवरण के आधार पर यह मान लेना कि वेदो मे ही नाटकों का उद्भव हुआ है, उचित ही प्रतीत होता है।

किन्तु कुछ पाश्चात्य विद्वानो एव आलोचको ने इस विषय मे जो अनुसंधान किया है उसके आधार पर अनेक विचारधारायें प्रस्तुत करते हुये उनके द्वारा अनेक वादो की स्थापना की गई है। इन वादो मे से कुछ का सम्बन्ध धार्मिक भावनाओ से है तथा कुछ का लौकिक लीलाओ अथवा रीति-रिवाजो से। इन सभी वादो का विभाजन तीन भागो में किया जा सकता है —

(१) परम्परागतवाद, (२) धार्मिक भावनावाद, (३) लौकिक लीलावाद।

(१) परम्परागतवाद

**(१) द्युलोकवाद—**धर्मप्रधान भारतीयो का यह विश्वास है कि नाट्य विज्ञान का प्रादुर्भाव द्युलोक से हुआ है। इसके प्रकटीकरण का काल त्रेता युग में माना गया है। सत्ययुग मे तो सभी प्राणी प्रसन्न व सुखी थे। त्रेता युग के आने पर दुःखों का आविर्भाव हुआ, इसी कारण मनोरजन अथवा मनोविनोद की भी आवश्यकता प्रतीत हुई। अतः देव तथा दानव मिलकर ब्रह्मा के समीप गये और उनसे कहा कि कुछ समय के लिये ही दुःखों से छुटकारा प्राप्त करने के हेतु कोई मनोविनोद का साधन हमे प्रदान कीजिये कि जिससे हम लोग कुछ समय के लिए कष्टो को भूल जाया करें। उन्होंने ध्यानावस्थित होकर संसार के प्राणियो के हितार्थ नाट्यवेद नामक पंचम वेद का सृजन किया (जिसका सूक्ष्म वर्णन अभी किया जा चुका है)। उक्त नाट्य-कला की रचना में शिवजी ने ताण्डवनृत्य, पार्वती जी ने लास्यनृत्य तथा विष्णु जी ने चार प्रकार की वृत्तियों का समावेश पूर्ण कर पूर्ण कलात्मकता को ही उत्पन्न कर दिया। इतना ही नहीं, देवलोक के निर्माण-कार्य-विज्ञ विश्वकर्मा ने एक मनोहर रंगमंच का निर्माण किया तथा उस पर रूपको (नाटको) का अभिनय भी सम्पन्न होने लगा। प्राचीनतम नाटक थे—"त्रिपुरदाह" और "समुद्रमन्थन", जिनका अभिनय इन्द्रध्वज-पर्व के अवसर पर किया गया था तथा जिसमे पुरुषों का अभिनय पुरुषो द्वारा और स्त्रियों का अभिनय स्त्रियो द्वारा प्रस्तुत

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किया गया था । इस कला को पृथ्वी-लोक में पहुँचाने का कार्य भरतमुनि द्वारा सम्पन्न किया गया । इस प्रकार उक्त कला का आगमन देवलोक अथवा द्युलोक से इस मर्त्यलोक पर हुआ ।

उपर्युक्त वर्णन में वास्तविकता कितनी है, यह कहा नही जा सकता । किन्तु इतना अवश्य है कि इसके द्वारा नाट्यकला-सम्बन्धी निम्नलिखित बातो का ज्ञान तो प्राप्त हो ही जाता है :—

(१) नाट्य-कला के निर्माण मे चारो वेदों का किसी न किसी अंश मे योग अवश्य है ।

(२) पुरातन समय में स्त्री तथा पुरुष दोनो ही अपना-अपना अभिनय किया करते थे ।

(३) तत्कालीन सभी नाटक धर्मप्रधान हुआ करते थे जिनका अभिनय धार्मिक पर्वों पर ही हुआ करता था ।

(४) वैदिक काल में किसी भी नाटक की रचना नहीं हो सकी थी । इसी कारण देव तथा दानवों को मिलकर ब्रह्मा से प्रार्थना करनी पड़ी होगी ।

(२) धार्मिक भावनावाद

(२) मृतक पूजावाद — डा० रिजवे का कथन है कि संसार में नाटकों की उत्पत्ति मृत आत्माओं को प्रसन्न करने तथा उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने की दृष्टि से हुई । भारत, यूनान आदि प्राचीन देशों में प्राचीन काल से ही इस भाँति की श्रद्धा प्रकट करने की प्रथा चली आती है । यह श्रद्धा ही सभी धर्मों का मूल है । इस भाँति नाटको का अभिनय मृत आत्माओं को प्रसन्न करने के निमित्त हुआ करता था । रामलीला एवं कृष्णलीला आदि लीलाये इसी भावना की प्रतीक कही जा सकती हैं । इस मृतक पूजा के आधार पर ही शनैः-शनैः नृत्य, गान तथा अभिनय होने लगे । इस भाँति नाटकों की रचना का प्रादुर्भाव हुआ ।

किन्तु उपर्युक्त मत को विद्वानों द्वारा मान्यता प्राप्त न हो सकी, क्योंकि

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राम, कृष्ण आदि की लीलायें करने का उद्देश्य श्रद्धा प्रकट करना नहीं है वरन् उनके चरित्र का स्मरण तथा श्रवण कर तदनुकूल अपने जीवन का निर्माण करना ही है। साथ ही राम एवं कृष्ण की स्मृति को स्थायित्व प्रदान करना भी है।

(३) मे पोलवाद— उपर्युक्त वाद में पाश्चात्य विद्वानों को भी विश्वास न हो सका अतः उन्होंने नाटकों का उद्भव मे-पोल-नृत्य से स्वीकार किया। पाश्चात्य देशों में मई मास महान् उल्लास एवं हर्ष का मास माना जाता है। इसमे लोग अत्यन्त प्रसन्नता एवं उल्लास के साथ उत्सव मनाते हैं, नृत्य करते हैं तथा पूर्ण आनन्द का अनुभव किया करते हैं। इतना ही नहीं, वे लोग एक लम्बा बाँस गाड़कर उसके नीचे एकत्रित होते तथा सभी स्त्री-पुरुष मिलकर नृत्य किया करते हैं। इस देश में भी 'इन्द्रध्वज' नामक पर्व लगभग इसी रूप में मनाया जाया करता था!

प्राय सभी देशों में वसन्त ऋतु का उत्सव अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मे-पोल का उत्सव भी इसी ऋतु में हुआ करता है किन्तु 'इन्द्रध्वज' सम्बन्धी उत्सव तो भारत में वर्षा ऋतु में मनाया जाता है। अतः मे-पोल उत्सव के साथ इसका सम्बन्ध जोड़ना पूर्णतया अनुचित ही प्रतीत होता है।

(४) कृष्णोपासनावाद— इस वाद के अनुसार नाटकों का उद्भव केवल कृष्ण की उपासना से ही माना गया है। इसमें सन्देह नहीं कि कृष्णो-पासना से सम्बन्धित रथयात्रायें, नृत्य, वाद्य, गीत तथा लीलायें आदि कृष्णो-पासना के अंगो (साधनों) का नाटकों के अभिनय इत्यादि से घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा ये इस प्रकार के साधन हैं कि जो सम्पूर्ण नाटकों के निर्माण में सहायक भी सिद्ध हुये हैं। अतः इसी आधार पर सम्पूर्ण नाटकों का विकास कृष्णोपासना से माना गया है।

किन्तु इस वाद में सबसे बड़ा दोष यह है कि कृष्ण-सम्बन्धी नाटक ही सर्वाधिक प्राचीन हों, इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। इसके अतिरिक्त यह भी सम्भव हो सकता है कि राम, शिव आदि देवों की उपासनाओं द्वारा भी भारतीय नाटकों के विकास में सहयोग प्राप्त हुआ हो, किन्तु इस बात की उपर्युक्त बातों में पूर्णतया उपेक्षा की गई।

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( ३ ) लौकिक लीलावाद

(५) लोकप्रिय स्वांगवाद—प्रो० हिलेब्रांट तथा प्रो० स्टेनकोनो के मतानुसार नाटको का उद्भव लोकप्रिय स्वांगों द्वारा हुआ। भारत में प्राचीन काल में लोकप्रिय स्वांगों का प्रचलन अधिक था। इन स्वांगों के साथ रामायण तथा महाभारत के आख्यानो का सम्मिश्रण कर नाटकों के कथानक तैयार किये जाते रहे होगे।

किन्तु डा० कीथ ने इस मत का विरोध करते हुये कहा कि उपर्युक्त वाद में सबसे बडा दोष यही है कि नाटक के प्रचार से पहले स्वांगों के प्रचलित होने के बारे में कोई सुदृढ़ प्रमाण उपलब्ध नही होता है। श्री कोनो द्वारा जिन प्रमाणों का उल्लेख किया गया है वे प्रायः सभी महाभाष्य के समकालीन तथा उसके पश्चाद् के ज्ञात होते हैं। अतः उनसे स्वांगो की प्राचीनता सिद्ध नही होती है। इसकी अपेक्षा प्रो० हिलेब्राण्ट ने जो युक्तियाँ दी हैं उनसे कुछ बल अवश्य मिलता है। उन्होने नाटको में गद्य-पद्य दोनों का प्रयोग, संस्कृत भाषा के साथ प्राकृत भाषा का प्रयोग, रंगशालाओं के अन्दर आडम्बरहीनता तथा सादगी का होना तथा विदूषक जैसे लोकप्रिय पात्र के आधार पर नाटकों का उद्भव लोकप्रिय स्वांगो द्वारा माना है। इनमें से प्रथम तीन बातों का समाधान तो हो जाता है साथ ही नाटकों के विकास का सम्बन्ध भी धार्मिक संस्कारों के साथ जुड जाता है। किन्तु विदूषक जैसे पात्र का आविर्भाव महाव्रत-संस्कार में शूद्र पात्र की आवश्यकता से हुआ माना जा सकता है। महाव्रत वास्तव में एक धार्मिक संस्कार है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई इस प्रकार का प्रमाण नही मिलता कि जिसके आधार पर नाटको में विदूषक जैसे पात्र को रखने का सम्बन्ध किसी लौकिक लीला के साथ रहा हो।

(६) पुत्तलिका नृत्यवाद—जर्मन-विद्वान् डा० पिशेल के मतानुसार नाटकों का उद्भव कठपुतलियो के नृत्य से हुआ है। नाटकों में प्रयुक्त सूत्रधार तथा स्थापक आदि शब्द इस मत के पोषक हैं। कथासरित्सागर, महाभारत तथा राजशेखर कृत बाल-रामायण में इनका उल्लेख प्रायः पुत्तलिका, दारुमयी पुत्रिका इत्यादि नामों के रूप में पाया जाता है।

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किन्तु यह वाद भी भ्रान्तिपूर्ण ही प्रतीत होता है। प्रो० हिलेब्राण्ट के सिद्धान्तानुसार कठपुतलियों के नाच के इतिहास को ध्यान में रखते हुए यह मानना पड़ता है कि नाटकों का उद्भव इससे पूर्व ही हो चुका था। इसके अतिरिक्त नाना प्रकार के भावों तथा रसों से युक्त नाटक की उत्पत्ति इस साधारण से पुत्तलिका नृत्य से हुई हो ऐसा मानना पूर्णतया निराधार तथा हास्यास्पद ही प्रतीत होता है।

(७) छाया नाट्यवाद—डा० लूडर्स का मत है कि नाटकों का जन्म छाया द्वारा दिखलाये जाने वाले खेलो में हुआ। प्राचीन काल में छाया द्वारा अनेक खेलों के दिखलाये जाने की प्रथा विद्यमान थी। उनके अनुसार महाभाष्य में वर्णित शोभिक मूक-अभिनेता अथवा छाया-मूर्तियों के व्याख्याता थे।

किन्तु डा० कीथ के मतानुसार यह विचार महाभाष्य के वाक्य के किये गये अशुद्ध अर्थ पर ही आधारित है। इसके अतिरिक्त इस वाद के मानने वाले को भी नाटकों की सत्ता छाया द्वारा दिखलाये जाने वाले खेलों की उत्पत्ति से पहले ही स्वीकार करनी पड़ती है। अतः यह वाद भी निरर्थक ही हो जाता है।

(८) संवाद सूक्तवाद—ऋग्वेद के अन्तर्गत १५ से भी अधिक (जिनका उल्लेख "नाटकों का उद्भव" शीर्षक विषय के प्रारम्भ में ही किया जा चुका है।) ऐसे संवाद-सूक्त मिलते हैं जिनमें धार्मिक भावनाओं के अतिरिक्त लोक व्यवहार सम्बन्धी संवादों का भी उल्लेख उपलब्ध होता है। सन् १८६६ ई० में प्रो० मैक्समुलर का ध्यान इन सूक्तों की ओर गया और उन्होंने उन्हीं सूक्तों को नाटकों की उत्पत्ति का मूलभूत कारण बतलाया। इसके अनन्तर डा० हर्टेल, प्रो० सिल्वैन लेवी तथा प्रो० बॉन श्रोडर और कुछ अन्य विद्वानों ने भी दृढ़ता के साथ इसी मत का समर्थन किया।

नाटक के मुख्य साधन नृत्य, गीत तथा संवाद माने गये हैं। ऋग्वेदीय सम्वादों के साथ पहले नृत्य एवं गीत भी रहे हों, यह भी सम्भव है। किन्तु आज उनका कोई स्वरूप नहीं मिलता। ऋग्वेद में विवाह सूक्त के अन्तर्गत वर एवं वधू के समक्ष पुरन्ध्रियों द्वारा नृत्य किये जाने का उल्लेख मिलता है तथा गीत भी ऋग्वेद में विद्यमान हैं ही। अतः ऋग्वेदीय संवाद-सूक्तों से ही नाटकों का उद्भव मान लेना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।

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(६) वैदिक अनुष्ठानवाद—कुछ अन्य विद्वानों ने इन संवाद-सूक्तों के अतिरिक्त वैदिक अनुष्ठानों के द्वारा भी नाटकों का उद्भव माना है। ऊपर जिन संवाद-सूक्तों का वर्णन किया जा चुका है उनको भी अनुष्ठान का एक अङ्ग ही कहा जा सकता है। इसके साथ ही साथ वैदिक युग में 'महाव्रत' नामक अनुष्ठान का प्रचलन अधिक था। इस अनुष्ठान की विधि भी एक प्रकार के नाटक के ही समान थी क्योंकि इसमें कुमारियाँ अग्नि के चारों ओर नृत्य करती थी। इसके अतिरिक्त यज्ञ-सूत्रों में यज्ञ मण्डप के नीचे स्थित यजमानों तथा याजकों के मनोरंजन के निमित्त वार्तालाप-युक्त सूक्तों से नाटकों के कथोपकथनों का संकेत उपलब्ध होता है। कुछ विद्वानों का तो यहाँ तक कहना है कि नाटकों के अन्तर्गत विद्यमान गद्यमय संवाद 'महाव्रत' में प्रयुक्त संवाद के आधार पर ही रखे गये हैं। अतः इस वाद के विवरण के आधार पर यह तो कहा ही जा सकता है कि वैदिक अनुष्ठानों में सभी नाटकीय तत्त्व किसी न किसी अंश में अवश्य विद्यमान थे।

इसके अतिरिक्त प्रो० वेबर तथा प्रो० विडिश ने भारतीय नाटकों की उत्पत्ति में यूनानी नाट्यकला के प्रभाव को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। किन्तु प्रो० सिलवन लेवी आदि विद्वानों द्वारा इस मत का पूर्णतया विरोध किया गया है। अतः यह मत भी अमान्य हो जाता है।

उपर्युक्त नाटकों का उद्भव सम्बन्धी विस्तृत विवेचन कर हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नाटकों के उद्भव के बारे में प्राचीन नृत्य, गीत तथा संवादों का विशिष्ट भाग रहा है। प्राचीन काल में प्रायः सभी जातियों में नृत्य, गीत आदि का प्रचलन था। सभ्यता के विकास के साथ ही साथ नृत्य, गीत आदि का भी विकास हुआ तथा इनका विकसित रूप ही बाद में 'नाटक' शब्द द्वारा कहा गया जिसमें अभिनय ने और भी जीवन डाल दिया। अतः यह कहना उचित ही होगा कि भारत में ही सर्वप्रथम नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ।

संस्कृत-नाटकों के विकास का क्रमिक इतिहास

नाटकों के प्रमुख अङ्ग हैं—संवाद, संगीत, नृत्य और अभिनय। ऋग्वेद में यम-यमी (ऋग्वेद-१०।१०), पुरूरवा एवं उर्वशी (ऋग्वेद-१०।९५),

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सरमा और पणि ( ऋग्वेद १०।१०८ ) इत्यादि संवादात्मक सूक्तो का विवरण प्राप्त होता है जिनसे नाटकीय 'संवाद' नामक तत्त्व की पुष्टि होती है । 'संगीत' नामक नाटकीय तत्त्व सामवेद मे मिलता ही है । इसके अतिरिक्त शेष प्रमुख नाटकीय तत्त्व किसी न किसी रूप मे वैदिक-काल में अवश्य विद्यमान रहे होगे । अतः यह हो सकता है कि ये ऋग्वेदीय-संवादात्मक सूक्त ही कालान्तर में परिष्कृत होकर नाटको के रूप मे परिणत हो गये हो ।

ऋग्वेदीय सूक्तों का अध्ययन करने से यह भी ज्ञात होता है—"सोम-विक्रय" के समय एक प्रकार का अभिनय हुआ करता था जिसका मुख्य प्रयोजन दर्शको का मनोविनोद ही था । अश्वमेध इत्यादि विशिष्ट यज्ञो के अवसरों के समय तथा उनके बीच-बीच में होने वाले कर्मानुष्ठानो के मध्य प्राप्त होने वाले अव-काश के समय "शुन शेप" इत्यादि के पुराने आख्यानो का कथन किया जाया करता था । उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह भी कल्पना की जा सकती है कि उपर्युक्त प्रसगो के अवसरों पर वैदिक देवताओ के चरित्र से सम्बन्धित नाटको का भी यथावसर प्रयोग होता रहा हो । हो सकता है कि ये नाटक कला की दृष्टि से पूर्ण न रहे हो किन्तु यह तो सम्भव है ही कि उनमे संस्कृत-नाट्यकला के बीज विद्यमान रहे हो ।

मैक्समूलर ने भी वेदो मे प्रयुक्त संवादात्मक सूक्तो के आधार पर वैदिक काल से ही नाट्यकला का उद्भव सिद्ध किया है (देखिए मैक्समूलर—ओरिजिन आफ दि ऋग्वेद, वाल्यूम १, पृष्ठ १७३ ) । डा० दास गुप्ता तथा एस० के० डे महोदय ने भी यही स्वीकार किया है कि उन मन्त्रो मे नाटकीय-तत्त्व अधिकांश रूप में विद्यमान हैं तथा तत्कालीन जनजीवन के धार्मिक अवसरो, संगीत समा-रोहों तथा नृत्यानुष्ठानों से नाटक का घनिष्ठ सम्बन्ध था (देखिए डा० एम० एन० दास गुप्ता तथा एम० के० डे हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर, वाल्यूम १, पृष्ठ ४४, १९४७) ।

बाजसनेयि-माध्यन्दिन-शुक्ल-यजुर्वेद-सहिता में ( "नृत्ताय सूत गीताय शैलूषं धर्माय समाहर"—इत्यादि मन्त्र यजुर्वेद ३०।६ ) तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में "शैलूष" शब्द आता है जिसका अर्थ होता है "नट" ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ३।४।२।१ ) । कौषीतकि-ब्राह्मण मे नृत्य, गीति तथा संगीत मुख्य

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विधाओं में परिणत किये गये है। “महाव्रत” में वृष्टि की उत्पत्ति तथा पशुओं की समृद्धि के निमित्त अग्नि के चारों ओर कुमारियों द्वारा नृत्य किये जाने का वर्णन आता है तथा विवाह-समाप्ति से पूर्व अग्निदेव के समक्ष स्त्रियों के नृत्य करने का भी संकेत मिलता है।१ इन उल्लेखों के द्वारा यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक तथा ब्राह्मण-काल में नटों तथा नाट्यकला का अस्तित्व विद्यमान था।

इसके पश्चात् रामायण तथा महाभारत-काल में भी नाट्यकला की ओर देशवासियो का ध्यान था। इन दोनों ग्रन्थों में ‘नट’, ‘नर्त्तक’ तथा ‘गायक’ आदि का उल्लेख अनेक स्थलों पर उपलब्ध होता है। वाल्मीकि-रामायण में एक स्थान पर आया है कि जिस जनपद में राजा निवास नहीं किया करता है वहाँ नट, नर्त्तक आदि हर्षित दृष्टिगोचर नहीं हुआ करते हैं।२ रामायण में ही नट तथा नर्त्तकों की गोष्ठी तथा मनोरंजन सम्बन्धी वर्णन भी उपलब्ध होता है।३ “व्यामिश्र”४ शब्द का प्रयोग इस प्रकार के नाटकों के लिये किया गया है जिनमें कई भाषाओं का मिश्रण रहा करता था।

इस काल में विद्यमान नाट्यकला पर धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टि-गोचर होता है। धार्मिक उत्सवों पर मनोविनोदार्थ राम तथा कृष्ण की लीलाओं का अभिनय भी किया जाता था। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस काल तक “नाटक” जन-साधारण के लिये श्रद्धा एवं सम्मान का विषय बन गया था।

संस्कृत-व्याकरण के निर्माता पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी मे नट सम्बन्धी सूत्रो का उल्लेख मिलता है। इन सूत्रो में ‘शिलालि’५ तथा ‘कृशाश्व’५


१. बलदेव उपाध्याय—संस्कृत साहित्य का इतिहास (पंचम संस्करण) पृष्ठ ४५२, पंक्ति ६-११। “हमारी नाट्य परम्परा” (श्री कृष्णदास) पृष्ठ ३६, पंक्ति ५-८।
२. वाल्मीकि-रामायण २।६७।१५॥
३. वाल्मीकि-रामायण—अयोध्याकाण्ड ६७।१५॥
४. वाल्मीकि-रामायण—अयोध्याकाण्ड १।२७॥
५. पाराशर्य शिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ॥ अष्टाध्यायी ४।३।११०॥
कर्मन्द कृशाश्वादिनी ॥ अष्टा० ४।३।१११॥

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नामक आचार्यों द्वारा निर्मित नट-सूत्रों का विवरण प्राप्त होता है । पाणिनि का समय ईसा से लगभग ७०० वर्ष पूर्व माना गया है। अत यह मानना उचित ही है कि ईसा से ७०० वर्ष पूर्व तक नाटकों का इतना प्रचार हो गया था कि नटों की शिक्षा के निमित्त स्वतन्त्र सूत्रों की भी रचना की जाने लगी थी ।

इसके पश्चात् हमें पतंजलि मुनि द्वारा रचित 'महाभाष्य' देखने को मिलता है । इस महाभाष्य में कुछ प्रमाण ऐसे भी मिले हैं कि जिनके आधार पर नाटकों का रंगभूमि पर प्रयोग किये जाने का प्रमाण भी मिल जाता है। महाभाष्य में आया है —

“ये तावदेते शोभनिका (सौभिका) नामैते, प्रत्यक्षं कंसं घातयन्ति, प्रत्यक्षं च बलिं बन्धयन्ति इति । अतश्च सत व्यामिश्रा हि दृश्यन्ते, केचिद् कंसभक्ता भवन्ति केचित् वासुदेवभक्ता ।” इत्यादि

महाभाष्य ३।२।१११॥

इस उद्धरण में “कंस घातयति” और “बलिं बन्धयन्ति” में प्रयुक्त वर्तमानकाल की क्रिया का समाधान करते हुये भाष्यकार ने उन नटों (शोभनिकों) का उल्लेख किया है जो प्रत्यक्ष रूप से सभी के समक्ष कंस को मारते तथा बलि को बांधते हैं । इससे स्पष्ट हो जाता है कि पतञ्जलि के समय में 'कंसवध' और 'बलिबन्ध' नामक नाटकों का अभिनय हुआ था । आगे चलकर इन नाटकों के अभिनय-प्रकार का भी सूक्ष्म वर्णन महाभाष्य में इसी प्रसंग में मिलता है :—

“वर्णान्यत्वं खलु पुष्यन्ति । केचिद्रक्तमुखा भवन्ति, केचित् कालमुखा ।” महाभाष्य ३।२।१११॥

इसमें बतलाया गया है कि 'कंसवध' नामक नाटक में कंस के भक्त तो अपना मुख काला रंगकर अभिनय किया करते थे तथा कृष्ण के भक्त अपने मुखों को लाल रंग में रंग कर ।

महाभाष्य सम्बन्धी उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पतञ्जलि के काल तक नाटकों का अभिनय जन साधारण के मनोरञ्जन के लिये एक उत्तम तथा सर्वप्रिय साधन बन चुका था ।

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संस्कृत नाटकों के विकास सम्बन्धी उपर्युक्त विवरण मे यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत-नाटकों का प्रारम्भ वैदिक काल में ही किसी न किसी अंश में हो गया था। धार्मिक उत्सवों से भी उसे प्रेरणा मिली। शनैः-शनैः नाटकों का विकास होता गया तथा पतञ्जलि के समय तक उसका पूर्ण विकसित स्वरूप जनता के समक्ष आ गया। हाँ, इतना अवश्य है कि महाभाष्य में वर्णित नाटक आज हमे उपलब्ध नही है।

नाटककार विशाखदत्त का काल और जीवनवृत्त

काल तथा जीवनवृत्त जानने के दो प्रमुख साधन— किसी नाटककार अथवा कवि के काल और जीवनवृत्त को जानने के दो प्रकार के प्रमुख साधन हुआ करते हैं :— (१) अन्तःसाक्ष्य— अर्थात् नाटककार अथवा कवि ने अपनी कृतियो में अपने बारे मे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्या लिखा है? (२) बहिःसाक्ष्य— अर्थात् कवि अथवा नाटककार के समकालीन अथवा परवर्त्ती विद्वानों आदि ने उसके सम्बन्ध में क्या-क्या लिखा है। इन दोनो प्रकार के साधनो मे अन्तःसाक्ष्य अधिक प्रामाणिक हुआ करता है। पहले हम प्रथम साधन के आधार पर विचार करेगे।

अन्तःसाक्ष्य की दृष्टि से विशाखदत्त ने भी महाकवि भास तथा कालिदास की ही भांति अपने सम्बन्ध मे कुछ भी न लिखना ही उचित समझा है। 'नाटक' महान् हुआ करता है, नाटककार नही; इस प्राचीन धारणा से विशाखदत्त पूर्णतया प्रभावित थे। नाटककार की दृष्टि से नाटक की प्रस्तावना में उन्होने मात्र यही लिखा है :—

“आज्ञापितोऽस्मि परिषदा यथा--अद्य त्वया सामन्तवटेश्वरदत्त-पौत्रस्य महाराजभास्करदत्तसूनोः कवेर्विशाखदत्तस्य कृतिराभिनवं मुद्राराक्षसं नाम नाटकं नाटयितव्यमिति।”

प्रस्तावना के उपर्युक्त अंश से केवल यही ज्ञात हो पाता है कि लेखक का नाम विशाखदत्त है! कुछ हस्तलिखित प्रतियों में 'विशाखदेव' नाम भी मिलता है। और वह सामन्त वटेश्वरदत्त के पौत्र तथा महाराज भास्करदत्त के पुत्र हैं अर्थात् इनके पिता का नाम महाराज भास्करदत्त तथा पितामह का नाम सामन्त

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वटेश्वरदत्त था। कुछ संस्करणों में “महाराजभाष्करदत्तसूनोः” के स्थान पर “महाराजपदभाक्सूनो ” पाठ भी उपलब्ध होता है जिसके अनुसार इनके पिता का नाम ‘महाराज पृथु’ होता है।

संस्कृत भाषा के नाटक-साहित्य का ऐतिहासिक काल-क्रम निर्णय करने वाले विद्वानों ने विशाखदत्त के कार्य-काल के बारे मे कुछ कल्पनायें की हैं जिनका संक्षिप्त उल्लेख देना यहाँ उचित ही होगा।

कुछ विद्वानों ने ‘विशाखदत्त’ के नाम के साथ ‘दत्त’ शब्द और साथ ही साथ सामन्त वटेश्वरदत्त और भाष्करदत्त के साथ भी ‘दत्त’ शब्द देखकर यह स्वीकार किया है कि इनका वंश ‘दत्त-वंश’ था किन्तु इस बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता।

प्रोफेसर विल्सन न महाराज पृथु को चौहानवंशीय रायपिथौरा अथवा पृथुराज सिद्ध करने का प्रयास किया था किन्तु वे स्वयं उनकी पदवियों तथा उनके पिताओं के नाम आदि की विभिन्नता का कोई मण्डन न कर सके। श्री तैलंग महोदय ने भी इस मत का खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि विशाखदत्त के पिता पृथु और अजमेर के चौहान पृथुराय दोनों ही भिन्न भिन्न व्यक्ति हैं क्योंकि नाटककार के पिता पृथु विशेषरूप से ‘महाराज’ पद से सम्बोधित किये गये हैं, जब कि अजमेर के पृथु केवल पृथुराज अथवा पृथुराय ही हैं। अब तो जर्मन विद्वान् हिले ब्राण्ट द्वारा सम्पादित मुद्राराक्षस में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि विशाखदत्त के पिता का नाम भास्करदत्त ही था। उन्होंने इसी को प्रामाणिक ठहराया है। अतः महाराज पृथु सम्बन्धी विषय स्वयं ही निरस्त हो जाता है।

अन्तःसाक्ष्य की दृष्टि से ही इनके स्थिति काल के सम्बन्ध मे प्रमुख एवं महत्त्वशाली स्थल जो इनकी रचना ‘मुद्राराक्षस’ में मिलता है—वह है नाटक के अन्त में आया हुआ “भरतवाक्य”। नाटककार विशाखदत्त के काल-निर्णय से सम्बन्धित सभी कल्पनायें एकमात्र इसी पर आधारित हैं। किन्तु इस भरतवाक्य के द्वारा भी निश्चित रूप से इनका काल-निर्णय नहीं हो पाता क्योंकि इस भरत वाक्य में आये हुये प्रमुखपद ‘पार्थिवश्चन्द्रगुप्त’ मे अनेक रूपता उपलब्ध होती है। मुद्राराक्षस की प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों मे “पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः” के अतिरिक्त