भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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वटेश्वरदत्त था। कुछ संस्करणों में “महाराजभाष्करदत्तसूनोः” के स्थान पर “महाराजपदभाक्सूनो ” पाठ भी उपलब्ध होता है जिसके अनुसार इनके पिता का नाम ‘महाराज पृथु’ होता है।

संस्कृत भाषा के नाटक-साहित्य का ऐतिहासिक काल-क्रम निर्णय करने वाले विद्वानों ने विशाखदत्त के कार्य-काल के बारे मे कुछ कल्पनायें की हैं जिनका संक्षिप्त उल्लेख देना यहाँ उचित ही होगा।

कुछ विद्वानों ने ‘विशाखदत्त’ के नाम के साथ ‘दत्त’ शब्द और साथ ही साथ सामन्त वटेश्वरदत्त और भाष्करदत्त के साथ भी ‘दत्त’ शब्द देखकर यह स्वीकार किया है कि इनका वंश ‘दत्त-वंश’ था किन्तु इस बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता।

प्रोफेसर विल्सन न महाराज पृथु को चौहानवंशीय रायपिथौरा अथवा पृथुराज सिद्ध करने का प्रयास किया था किन्तु वे स्वयं उनकी पदवियों तथा उनके पिताओं के नाम आदि की विभिन्नता का कोई मण्डन न कर सके। श्री तैलंग महोदय ने भी इस मत का खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि विशाखदत्त के पिता पृथु और अजमेर के चौहान पृथुराय दोनों ही भिन्न भिन्न व्यक्ति हैं क्योंकि नाटककार के पिता पृथु विशेषरूप से ‘महाराज’ पद से सम्बोधित किये गये हैं, जब कि अजमेर के पृथु केवल पृथुराज अथवा पृथुराय ही हैं। अब तो जर्मन विद्वान् हिले ब्राण्ट द्वारा सम्पादित मुद्राराक्षस में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि विशाखदत्त के पिता का नाम भास्करदत्त ही था। उन्होंने इसी को प्रामाणिक ठहराया है। अतः महाराज पृथु सम्बन्धी विषय स्वयं ही निरस्त हो जाता है।

अन्तःसाक्ष्य की दृष्टि से ही इनके स्थिति काल के सम्बन्ध मे प्रमुख एवं महत्त्वशाली स्थल जो इनकी रचना ‘मुद्राराक्षस’ में मिलता है—वह है नाटक के अन्त में आया हुआ “भरतवाक्य”। नाटककार विशाखदत्त के काल-निर्णय से सम्बन्धित सभी कल्पनायें एकमात्र इसी पर आधारित हैं। किन्तु इस भरतवाक्य के द्वारा भी निश्चित रूप से इनका काल-निर्णय नहीं हो पाता क्योंकि इस भरत वाक्य में आये हुये प्रमुखपद ‘पार्थिवश्चन्द्रगुप्त’ मे अनेक रूपता उपलब्ध होती है। मुद्राराक्षस की प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों मे “पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः” के अतिरिक्त