भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पृष्ठ 30

( २५ )

“पार्थिवोऽवन्तिवर्मा”, “पार्थिवोदन्तिवर्मा” और “पार्थिवोरन्तिवर्मा” ये तीन भिन्न-भिन्न पाठ और भी मिलते हैं। यह भरतवाक्य निम्नलिखित है :—

“वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरूपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिं प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री ।
म्लेच्छैरुद्विज्यमाना भुजयुगमधुना संश्रिता राजमूर्तेः
स श्रीमद्बन्धुभृत्यश्चिरमवतु महीं पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः ।। ७।१६ ।।

उपर्युक्त चारों प्रकार के पाठों में ‘पार्थिवोरन्तिवर्मा’ पाठ तो पूर्णतया अप्रामाणिक प्रतीत होता है। रन्तिवर्मा नाम के राजा के विषय में श्री तैलङ्ग तथा दास गुप्ता का यह विचार है कि भारतीय इतिहास के प्राचीन अथवा मध्ययुगीन काल में कहीं पर भी इस नाम का कोई भी राजा उपलब्ध नहीं होता। अतः उक्त पाठ अशुद्ध ही प्रतीत होता है। नकल करने वाले व्यक्ति का यह प्रमाद ही प्रतीत होता है कि वह ‘पार्थिवोऽवन्तिवर्मा’ के स्थान पर ‘पार्थिवोरन्तिवर्मा’ लिख गया होगा।

२. पार्थिवोदन्तिवर्मा पाठ—कुछ विद्वानों ने इसी पाठ को प्रामाणिक माना है तथा इसी आधार पर विशाखदत्त को पल्लवनरेश दन्तिवर्मा का समसामयिक माना है। पल्लवनरेश दन्तिवर्मा का शासनकाल ७७६-८३० ई० माना गया है। अतः विशाखदत्त का समय अष्टम शताब्दी माना जा सकता है। श्रीरामस्वामी ने तो इसी पल्लवनरेश दन्तिवर्मा के साथ, जो सप्तम शताब्दी में हुआ है, विशाखदत्त का सम्बन्ध जोड़ा है। किन्तु दन्तिवर्मा पाठ मान लेने पर विशाखदत्त का सम्बन्ध राष्ट्रकूट राजा दन्तिवर्मा के साथ, जो ६०० ई० में हुआ है, भी जोड़ा जा सकता है। लाट राजा दन्तिवर्मा, जो ८५० ई० में हुआ है, के साथ भी हो सकता है। उपर्युक्त विवरण से दन्तिवर्मा नाम के कई राजाओं का होना स्पष्ट हो जाता है। फिर किस दन्तिवर्मा के साथ विशाखदत्त का सम्बन्ध माना जाय, यह निश्चित किया जाना सम्भव नहीं है।

फिर यदि उपर्युक्त में से किसी को स्वीकार कर भी लिया जाय तो विशाखदत्त का समय सप्तम शताब्दी से लेकर नवम शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक किसी भी समय स्वीकार करना होगा। (१) किन्तु इस बीच किसी भी आक्रमणकारी म्लेच्छ का पता नहीं चलता है कि जिसके उत्पीड़न से पृथिवी की रक्षा के निमित्त प्रार्थना की