मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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जाय, जैसी कि इस भरतवाक्य में प्रार्थना की गई है। (२) सबसे बड़ी बात तो यह है, जैसा कि प्रा० ध्रुव ने भी स्वीकार किया है कि पल्लव-नरेश तो कट्टर शैवमता-वलम्बी थे, जब कि लेखक ने भरतवाक्य में राजा को विष्णु का अवतारस्वरूप ही कहा है।
ऐसी अवस्था में मुद्राराक्षस के भरतवाक्य का अपना गौरव ही समाप्त हो जायेगा। अतः पल्लवनरेश दन्तिवर्मा को विशाखदत्त का आश्रयदाता मानना उचित प्रतीत नहीं होता है।
(३) पार्थिवोऽवन्तिवर्मा पाठ—इस पाठ को प्रामाणिक मान लेने पर भी लेखक किसी राजा के आश्रित था, इसका उचित समाधान नहीं हो पाता है क्योंकि भारतीय इतिहास में अवन्तिवर्मा नाम के दो राजाओं का उल्लेख मिलता है। विद्वानों ने इन दोनों ही अवन्तिवर्मा नामों का उल्लेख विशाखदत्त के आश्रय-दाता के रूप में किया है। इनमें से एक हैं—कन्नौज के मौखरि राजा अवन्तिवर्मा जो सप्तम शताब्दी में हुए थे तथा जिनके पुत्र ग्रहवर्मा का विवाह हर्षवर्धन की बहिन राज्यश्री के साथ हुआ था। और दूसरे हैं कश्मीर-नरेश अवन्तिवर्मा—जिन्होंने नवम शताब्दी के मध्य ८५५ से ८६३ ई० तक राज्य किया था।
प्रो० याकोबी का अपना विचार है कि २ दिसम्बर, ८६० ई० को जो चन्द्र-ग्रहण पड़ा था, उसी का वर्णन मुद्राराक्षस के प्रथम अङ्क की प्रस्तावना रूप में हुआ है -
"क्रूरग्रहः सकेतुश्चन्द्रमसम्पूर्णमण्डलमिदानीम् ।
अभिभवितुमिच्छति बलात् रक्षत्येनं तु बुधयोगः ॥१।६॥"
इसी आधार पर उनकी यह मान्यता है कि विशाखदत्त कश्मीर के राजा अवन्तिवर्मा के समय में हुये थे। इसी उपर्युक्त ग्रहण के अवसर पर अवन्तिवर्मा के मन्त्री शूर ने इस नाटक का अभिनय कराया था। अतः विशाखदत्त का काल नवम शताब्दी का उत्तरार्द्ध ही होना चाहिये।
इस मत में प्रथम (१) आपत्ति तो यही है कि लेखक कश्मीर नरेश अवन्ति-वर्मा का सामन्त अथवा राजा नहीं हो सकता क्योंकि उसका राज्य इतना बड़ा नहीं था।