भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 488 में से

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किन्तु यह वाद भी भ्रान्तिपूर्ण ही प्रतीत होता है। प्रो० हिलेब्राण्ट के सिद्धान्तानुसार कठपुतलियों के नाच के इतिहास को ध्यान में रखते हुए यह मानना पड़ता है कि नाटकों का उद्भव इससे पूर्व ही हो चुका था। इसके अतिरिक्त नाना प्रकार के भावों तथा रसों से युक्त नाटक की उत्पत्ति इस साधारण से पुत्तलिका नृत्य से हुई हो ऐसा मानना पूर्णतया निराधार तथा हास्यास्पद ही प्रतीत होता है।

(७) छाया नाट्यवाद—डा० लूडर्स का मत है कि नाटकों का जन्म छाया द्वारा दिखलाये जाने वाले खेलो में हुआ। प्राचीन काल में छाया द्वारा अनेक खेलों के दिखलाये जाने की प्रथा विद्यमान थी। उनके अनुसार महाभाष्य में वर्णित शोभिक मूक-अभिनेता अथवा छाया-मूर्तियों के व्याख्याता थे।

किन्तु डा० कीथ के मतानुसार यह विचार महाभाष्य के वाक्य के किये गये अशुद्ध अर्थ पर ही आधारित है। इसके अतिरिक्त इस वाद के मानने वाले को भी नाटकों की सत्ता छाया द्वारा दिखलाये जाने वाले खेलों की उत्पत्ति से पहले ही स्वीकार करनी पड़ती है। अतः यह वाद भी निरर्थक ही हो जाता है।

(८) संवाद सूक्तवाद—ऋग्वेद के अन्तर्गत १५ से भी अधिक (जिनका उल्लेख "नाटकों का उद्भव" शीर्षक विषय के प्रारम्भ में ही किया जा चुका है।) ऐसे संवाद-सूक्त मिलते हैं जिनमें धार्मिक भावनाओं के अतिरिक्त लोक व्यवहार सम्बन्धी संवादों का भी उल्लेख उपलब्ध होता है। सन् १८६६ ई० में प्रो० मैक्समुलर का ध्यान इन सूक्तों की ओर गया और उन्होंने उन्हीं सूक्तों को नाटकों की उत्पत्ति का मूलभूत कारण बतलाया। इसके अनन्तर डा० हर्टेल, प्रो० सिल्वैन लेवी तथा प्रो० बॉन श्रोडर और कुछ अन्य विद्वानों ने भी दृढ़ता के साथ इसी मत का समर्थन किया।

नाटक के मुख्य साधन नृत्य, गीत तथा संवाद माने गये हैं। ऋग्वेदीय सम्वादों के साथ पहले नृत्य एवं गीत भी रहे हों, यह भी सम्भव है। किन्तु आज उनका कोई स्वरूप नहीं मिलता। ऋग्वेद में विवाह सूक्त के अन्तर्गत वर एवं वधू के समक्ष पुरन्ध्रियों द्वारा नृत्य किये जाने का उल्लेख मिलता है तथा गीत भी ऋग्वेद में विद्यमान हैं ही। अतः ऋग्वेदीय संवाद-सूक्तों से ही नाटकों का उद्भव मान लेना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।

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