भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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( ३ ) लौकिक लीलावाद

(५) लोकप्रिय स्वांगवाद—प्रो० हिलेब्रांट तथा प्रो० स्टेनकोनो के मतानुसार नाटको का उद्भव लोकप्रिय स्वांगों द्वारा हुआ। भारत में प्राचीन काल में लोकप्रिय स्वांगों का प्रचलन अधिक था। इन स्वांगों के साथ रामायण तथा महाभारत के आख्यानो का सम्मिश्रण कर नाटकों के कथानक तैयार किये जाते रहे होगे।

किन्तु डा० कीथ ने इस मत का विरोध करते हुये कहा कि उपर्युक्त वाद में सबसे बडा दोष यही है कि नाटक के प्रचार से पहले स्वांगों के प्रचलित होने के बारे में कोई सुदृढ़ प्रमाण उपलब्ध नही होता है। श्री कोनो द्वारा जिन प्रमाणों का उल्लेख किया गया है वे प्रायः सभी महाभाष्य के समकालीन तथा उसके पश्चाद् के ज्ञात होते हैं। अतः उनसे स्वांगो की प्राचीनता सिद्ध नही होती है। इसकी अपेक्षा प्रो० हिलेब्राण्ट ने जो युक्तियाँ दी हैं उनसे कुछ बल अवश्य मिलता है। उन्होने नाटको में गद्य-पद्य दोनों का प्रयोग, संस्कृत भाषा के साथ प्राकृत भाषा का प्रयोग, रंगशालाओं के अन्दर आडम्बरहीनता तथा सादगी का होना तथा विदूषक जैसे लोकप्रिय पात्र के आधार पर नाटकों का उद्भव लोकप्रिय स्वांगो द्वारा माना है। इनमें से प्रथम तीन बातों का समाधान तो हो जाता है साथ ही नाटकों के विकास का सम्बन्ध भी धार्मिक संस्कारों के साथ जुड जाता है। किन्तु विदूषक जैसे पात्र का आविर्भाव महाव्रत-संस्कार में शूद्र पात्र की आवश्यकता से हुआ माना जा सकता है। महाव्रत वास्तव में एक धार्मिक संस्कार है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई इस प्रकार का प्रमाण नही मिलता कि जिसके आधार पर नाटको में विदूषक जैसे पात्र को रखने का सम्बन्ध किसी लौकिक लीला के साथ रहा हो।

(६) पुत्तलिका नृत्यवाद—जर्मन-विद्वान् डा० पिशेल के मतानुसार नाटकों का उद्भव कठपुतलियो के नृत्य से हुआ है। नाटकों में प्रयुक्त सूत्रधार तथा स्थापक आदि शब्द इस मत के पोषक हैं। कथासरित्सागर, महाभारत तथा राजशेखर कृत बाल-रामायण में इनका उल्लेख प्रायः पुत्तलिका, दारुमयी पुत्रिका इत्यादि नामों के रूप में पाया जाता है।