भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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(६) वैदिक अनुष्ठानवाद—कुछ अन्य विद्वानों ने इन संवाद-सूक्तों के अतिरिक्त वैदिक अनुष्ठानों के द्वारा भी नाटकों का उद्भव माना है। ऊपर जिन संवाद-सूक्तों का वर्णन किया जा चुका है उनको भी अनुष्ठान का एक अङ्ग ही कहा जा सकता है। इसके साथ ही साथ वैदिक युग में 'महाव्रत' नामक अनुष्ठान का प्रचलन अधिक था। इस अनुष्ठान की विधि भी एक प्रकार के नाटक के ही समान थी क्योंकि इसमें कुमारियाँ अग्नि के चारों ओर नृत्य करती थी। इसके अतिरिक्त यज्ञ-सूत्रों में यज्ञ मण्डप के नीचे स्थित यजमानों तथा याजकों के मनोरंजन के निमित्त वार्तालाप-युक्त सूक्तों से नाटकों के कथोपकथनों का संकेत उपलब्ध होता है। कुछ विद्वानों का तो यहाँ तक कहना है कि नाटकों के अन्तर्गत विद्यमान गद्यमय संवाद 'महाव्रत' में प्रयुक्त संवाद के आधार पर ही रखे गये हैं। अतः इस वाद के विवरण के आधार पर यह तो कहा ही जा सकता है कि वैदिक अनुष्ठानों में सभी नाटकीय तत्त्व किसी न किसी अंश में अवश्य विद्यमान थे।

इसके अतिरिक्त प्रो० वेबर तथा प्रो० विडिश ने भारतीय नाटकों की उत्पत्ति में यूनानी नाट्यकला के प्रभाव को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। किन्तु प्रो० सिलवन लेवी आदि विद्वानों द्वारा इस मत का पूर्णतया विरोध किया गया है। अतः यह मत भी अमान्य हो जाता है।

उपर्युक्त नाटकों का उद्भव सम्बन्धी विस्तृत विवेचन कर हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नाटकों के उद्भव के बारे में प्राचीन नृत्य, गीत तथा संवादों का विशिष्ट भाग रहा है। प्राचीन काल में प्रायः सभी जातियों में नृत्य, गीत आदि का प्रचलन था। सभ्यता के विकास के साथ ही साथ नृत्य, गीत आदि का भी विकास हुआ तथा इनका विकसित रूप ही बाद में 'नाटक' शब्द द्वारा कहा गया जिसमें अभिनय ने और भी जीवन डाल दिया। अतः यह कहना उचित ही होगा कि भारत में ही सर्वप्रथम नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ।

संस्कृत-नाटकों के विकास का क्रमिक इतिहास

नाटकों के प्रमुख अङ्ग हैं—संवाद, संगीत, नृत्य और अभिनय। ऋग्वेद में यम-यमी (ऋग्वेद-१०।१०), पुरूरवा एवं उर्वशी (ऋग्वेद-१०।९५),