मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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(६) वैदिक अनुष्ठानवाद—कुछ अन्य विद्वानों ने इन संवाद-सूक्तों के अतिरिक्त वैदिक अनुष्ठानों के द्वारा भी नाटकों का उद्भव माना है। ऊपर जिन संवाद-सूक्तों का वर्णन किया जा चुका है उनको भी अनुष्ठान का एक अङ्ग ही कहा जा सकता है। इसके साथ ही साथ वैदिक युग में 'महाव्रत' नामक अनुष्ठान का प्रचलन अधिक था। इस अनुष्ठान की विधि भी एक प्रकार के नाटक के ही समान थी क्योंकि इसमें कुमारियाँ अग्नि के चारों ओर नृत्य करती थी। इसके अतिरिक्त यज्ञ-सूत्रों में यज्ञ मण्डप के नीचे स्थित यजमानों तथा याजकों के मनोरंजन के निमित्त वार्तालाप-युक्त सूक्तों से नाटकों के कथोपकथनों का संकेत उपलब्ध होता है। कुछ विद्वानों का तो यहाँ तक कहना है कि नाटकों के अन्तर्गत विद्यमान गद्यमय संवाद 'महाव्रत' में प्रयुक्त संवाद के आधार पर ही रखे गये हैं। अतः इस वाद के विवरण के आधार पर यह तो कहा ही जा सकता है कि वैदिक अनुष्ठानों में सभी नाटकीय तत्त्व किसी न किसी अंश में अवश्य विद्यमान थे।
इसके अतिरिक्त प्रो० वेबर तथा प्रो० विडिश ने भारतीय नाटकों की उत्पत्ति में यूनानी नाट्यकला के प्रभाव को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। किन्तु प्रो० सिलवन लेवी आदि विद्वानों द्वारा इस मत का पूर्णतया विरोध किया गया है। अतः यह मत भी अमान्य हो जाता है।
उपर्युक्त नाटकों का उद्भव सम्बन्धी विस्तृत विवेचन कर हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नाटकों के उद्भव के बारे में प्राचीन नृत्य, गीत तथा संवादों का विशिष्ट भाग रहा है। प्राचीन काल में प्रायः सभी जातियों में नृत्य, गीत आदि का प्रचलन था। सभ्यता के विकास के साथ ही साथ नृत्य, गीत आदि का भी विकास हुआ तथा इनका विकसित रूप ही बाद में 'नाटक' शब्द द्वारा कहा गया जिसमें अभिनय ने और भी जीवन डाल दिया। अतः यह कहना उचित ही होगा कि भारत में ही सर्वप्रथम नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ।
संस्कृत-नाटकों के विकास का क्रमिक इतिहास
नाटकों के प्रमुख अङ्ग हैं—संवाद, संगीत, नृत्य और अभिनय। ऋग्वेद में यम-यमी (ऋग्वेद-१०।१०), पुरूरवा एवं उर्वशी (ऋग्वेद-१०।९५),
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सरमा और पणि ( ऋग्वेद १०।१०८ ) इत्यादि संवादात्मक सूक्तो का विवरण प्राप्त होता है जिनसे नाटकीय 'संवाद' नामक तत्त्व की पुष्टि होती है । 'संगीत' नामक नाटकीय तत्त्व सामवेद मे मिलता ही है । इसके अतिरिक्त शेष प्रमुख नाटकीय तत्त्व किसी न किसी रूप मे वैदिक-काल में अवश्य विद्यमान रहे होगे । अतः यह हो सकता है कि ये ऋग्वेदीय-संवादात्मक सूक्त ही कालान्तर में परिष्कृत होकर नाटको के रूप मे परिणत हो गये हो ।
ऋग्वेदीय सूक्तों का अध्ययन करने से यह भी ज्ञात होता है—"सोम-विक्रय" के समय एक प्रकार का अभिनय हुआ करता था जिसका मुख्य प्रयोजन दर्शको का मनोविनोद ही था । अश्वमेध इत्यादि विशिष्ट यज्ञो के अवसरों के समय तथा उनके बीच-बीच में होने वाले कर्मानुष्ठानो के मध्य प्राप्त होने वाले अव-काश के समय "शुन शेप" इत्यादि के पुराने आख्यानो का कथन किया जाया करता था । उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह भी कल्पना की जा सकती है कि उपर्युक्त प्रसगो के अवसरों पर वैदिक देवताओ के चरित्र से सम्बन्धित नाटको का भी यथावसर प्रयोग होता रहा हो । हो सकता है कि ये नाटक कला की दृष्टि से पूर्ण न रहे हो किन्तु यह तो सम्भव है ही कि उनमे संस्कृत-नाट्यकला के बीज विद्यमान रहे हो ।
मैक्समूलर ने भी वेदो मे प्रयुक्त संवादात्मक सूक्तो के आधार पर वैदिक काल से ही नाट्यकला का उद्भव सिद्ध किया है (देखिए मैक्समूलर—ओरिजिन आफ दि ऋग्वेद, वाल्यूम १, पृष्ठ १७३ ) । डा० दास गुप्ता तथा एस० के० डे महोदय ने भी यही स्वीकार किया है कि उन मन्त्रो मे नाटकीय-तत्त्व अधिकांश रूप में विद्यमान हैं तथा तत्कालीन जनजीवन के धार्मिक अवसरो, संगीत समा-रोहों तथा नृत्यानुष्ठानों से नाटक का घनिष्ठ सम्बन्ध था (देखिए डा० एम० एन० दास गुप्ता तथा एम० के० डे हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर, वाल्यूम १, पृष्ठ ४४, १९४७) ।
बाजसनेयि-माध्यन्दिन-शुक्ल-यजुर्वेद-सहिता में ( "नृत्ताय सूत गीताय शैलूषं धर्माय समाहर"—इत्यादि मन्त्र यजुर्वेद ३०।६ ) तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में "शैलूष" शब्द आता है जिसका अर्थ होता है "नट" ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ३।४।२।१ ) । कौषीतकि-ब्राह्मण मे नृत्य, गीति तथा संगीत मुख्य
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विधाओं में परिणत किये गये है। “महाव्रत” में वृष्टि की उत्पत्ति तथा पशुओं की समृद्धि के निमित्त अग्नि के चारों ओर कुमारियों द्वारा नृत्य किये जाने का वर्णन आता है तथा विवाह-समाप्ति से पूर्व अग्निदेव के समक्ष स्त्रियों के नृत्य करने का भी संकेत मिलता है।१ इन उल्लेखों के द्वारा यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक तथा ब्राह्मण-काल में नटों तथा नाट्यकला का अस्तित्व विद्यमान था।
इसके पश्चात् रामायण तथा महाभारत-काल में भी नाट्यकला की ओर देशवासियो का ध्यान था। इन दोनों ग्रन्थों में ‘नट’, ‘नर्त्तक’ तथा ‘गायक’ आदि का उल्लेख अनेक स्थलों पर उपलब्ध होता है। वाल्मीकि-रामायण में एक स्थान पर आया है कि जिस जनपद में राजा निवास नहीं किया करता है वहाँ नट, नर्त्तक आदि हर्षित दृष्टिगोचर नहीं हुआ करते हैं।२ रामायण में ही नट तथा नर्त्तकों की गोष्ठी तथा मनोरंजन सम्बन्धी वर्णन भी उपलब्ध होता है।३ “व्यामिश्र”४ शब्द का प्रयोग इस प्रकार के नाटकों के लिये किया गया है जिनमें कई भाषाओं का मिश्रण रहा करता था।
इस काल में विद्यमान नाट्यकला पर धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टि-गोचर होता है। धार्मिक उत्सवों पर मनोविनोदार्थ राम तथा कृष्ण की लीलाओं का अभिनय भी किया जाता था। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस काल तक “नाटक” जन-साधारण के लिये श्रद्धा एवं सम्मान का विषय बन गया था।
संस्कृत-व्याकरण के निर्माता पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी मे नट सम्बन्धी सूत्रो का उल्लेख मिलता है। इन सूत्रो में ‘शिलालि’५ तथा ‘कृशाश्व’५
१. बलदेव उपाध्याय—संस्कृत साहित्य का इतिहास (पंचम संस्करण) पृष्ठ ४५२, पंक्ति ६-११। “हमारी नाट्य परम्परा” (श्री कृष्णदास) पृष्ठ ३६, पंक्ति ५-८।
२. वाल्मीकि-रामायण २।६७।१५॥
३. वाल्मीकि-रामायण—अयोध्याकाण्ड ६७।१५॥
४. वाल्मीकि-रामायण—अयोध्याकाण्ड १।२७॥
५. पाराशर्य शिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ॥ अष्टाध्यायी ४।३।११०॥
कर्मन्द कृशाश्वादिनी ॥ अष्टा० ४।३।१११॥
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नामक आचार्यों द्वारा निर्मित नट-सूत्रों का विवरण प्राप्त होता है । पाणिनि का समय ईसा से लगभग ७०० वर्ष पूर्व माना गया है। अत यह मानना उचित ही है कि ईसा से ७०० वर्ष पूर्व तक नाटकों का इतना प्रचार हो गया था कि नटों की शिक्षा के निमित्त स्वतन्त्र सूत्रों की भी रचना की जाने लगी थी ।
इसके पश्चात् हमें पतंजलि मुनि द्वारा रचित 'महाभाष्य' देखने को मिलता है । इस महाभाष्य में कुछ प्रमाण ऐसे भी मिले हैं कि जिनके आधार पर नाटकों का रंगभूमि पर प्रयोग किये जाने का प्रमाण भी मिल जाता है। महाभाष्य में आया है —
“ये तावदेते शोभनिका (सौभिका) नामैते, प्रत्यक्षं कंसं घातयन्ति, प्रत्यक्षं च बलिं बन्धयन्ति इति । अतश्च सत व्यामिश्रा हि दृश्यन्ते, केचिद् कंसभक्ता भवन्ति केचित् वासुदेवभक्ता ।” इत्यादि
महाभाष्य ३।२।१११॥
इस उद्धरण में “कंस घातयति” और “बलिं बन्धयन्ति” में प्रयुक्त वर्तमानकाल की क्रिया का समाधान करते हुये भाष्यकार ने उन नटों (शोभनिकों) का उल्लेख किया है जो प्रत्यक्ष रूप से सभी के समक्ष कंस को मारते तथा बलि को बांधते हैं । इससे स्पष्ट हो जाता है कि पतञ्जलि के समय में 'कंसवध' और 'बलिबन्ध' नामक नाटकों का अभिनय हुआ था । आगे चलकर इन नाटकों के अभिनय-प्रकार का भी सूक्ष्म वर्णन महाभाष्य में इसी प्रसंग में मिलता है :—
“वर्णान्यत्वं खलु पुष्यन्ति । केचिद्रक्तमुखा भवन्ति, केचित् कालमुखा ।” महाभाष्य ३।२।१११॥
इसमें बतलाया गया है कि 'कंसवध' नामक नाटक में कंस के भक्त तो अपना मुख काला रंगकर अभिनय किया करते थे तथा कृष्ण के भक्त अपने मुखों को लाल रंग में रंग कर ।
महाभाष्य सम्बन्धी उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पतञ्जलि के काल तक नाटकों का अभिनय जन साधारण के मनोरञ्जन के लिये एक उत्तम तथा सर्वप्रिय साधन बन चुका था ।
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संस्कृत नाटकों के विकास सम्बन्धी उपर्युक्त विवरण मे यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत-नाटकों का प्रारम्भ वैदिक काल में ही किसी न किसी अंश में हो गया था। धार्मिक उत्सवों से भी उसे प्रेरणा मिली। शनैः-शनैः नाटकों का विकास होता गया तथा पतञ्जलि के समय तक उसका पूर्ण विकसित स्वरूप जनता के समक्ष आ गया। हाँ, इतना अवश्य है कि महाभाष्य में वर्णित नाटक आज हमे उपलब्ध नही है।
नाटककार विशाखदत्त का काल और जीवनवृत्त
काल तथा जीवनवृत्त जानने के दो प्रमुख साधन— किसी नाटककार अथवा कवि के काल और जीवनवृत्त को जानने के दो प्रकार के प्रमुख साधन हुआ करते हैं :— (१) अन्तःसाक्ष्य— अर्थात् नाटककार अथवा कवि ने अपनी कृतियो में अपने बारे मे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्या लिखा है? (२) बहिःसाक्ष्य— अर्थात् कवि अथवा नाटककार के समकालीन अथवा परवर्त्ती विद्वानों आदि ने उसके सम्बन्ध में क्या-क्या लिखा है। इन दोनो प्रकार के साधनो मे अन्तःसाक्ष्य अधिक प्रामाणिक हुआ करता है। पहले हम प्रथम साधन के आधार पर विचार करेगे।
अन्तःसाक्ष्य की दृष्टि से विशाखदत्त ने भी महाकवि भास तथा कालिदास की ही भांति अपने सम्बन्ध मे कुछ भी न लिखना ही उचित समझा है। 'नाटक' महान् हुआ करता है, नाटककार नही; इस प्राचीन धारणा से विशाखदत्त पूर्णतया प्रभावित थे। नाटककार की दृष्टि से नाटक की प्रस्तावना में उन्होने मात्र यही लिखा है :—
“आज्ञापितोऽस्मि परिषदा यथा--अद्य त्वया सामन्तवटेश्वरदत्त-पौत्रस्य महाराजभास्करदत्तसूनोः कवेर्विशाखदत्तस्य कृतिराभिनवं मुद्राराक्षसं नाम नाटकं नाटयितव्यमिति।”
प्रस्तावना के उपर्युक्त अंश से केवल यही ज्ञात हो पाता है कि लेखक का नाम विशाखदत्त है! कुछ हस्तलिखित प्रतियों में 'विशाखदेव' नाम भी मिलता है। और वह सामन्त वटेश्वरदत्त के पौत्र तथा महाराज भास्करदत्त के पुत्र हैं अर्थात् इनके पिता का नाम महाराज भास्करदत्त तथा पितामह का नाम सामन्त
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वटेश्वरदत्त था। कुछ संस्करणों में “महाराजभाष्करदत्तसूनोः” के स्थान पर “महाराजपदभाक्सूनो ” पाठ भी उपलब्ध होता है जिसके अनुसार इनके पिता का नाम ‘महाराज पृथु’ होता है।
संस्कृत भाषा के नाटक-साहित्य का ऐतिहासिक काल-क्रम निर्णय करने वाले विद्वानों ने विशाखदत्त के कार्य-काल के बारे मे कुछ कल्पनायें की हैं जिनका संक्षिप्त उल्लेख देना यहाँ उचित ही होगा।
कुछ विद्वानों ने ‘विशाखदत्त’ के नाम के साथ ‘दत्त’ शब्द और साथ ही साथ सामन्त वटेश्वरदत्त और भाष्करदत्त के साथ भी ‘दत्त’ शब्द देखकर यह स्वीकार किया है कि इनका वंश ‘दत्त-वंश’ था किन्तु इस बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता।
प्रोफेसर विल्सन न महाराज पृथु को चौहानवंशीय रायपिथौरा अथवा पृथुराज सिद्ध करने का प्रयास किया था किन्तु वे स्वयं उनकी पदवियों तथा उनके पिताओं के नाम आदि की विभिन्नता का कोई मण्डन न कर सके। श्री तैलंग महोदय ने भी इस मत का खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि विशाखदत्त के पिता पृथु और अजमेर के चौहान पृथुराय दोनों ही भिन्न भिन्न व्यक्ति हैं क्योंकि नाटककार के पिता पृथु विशेषरूप से ‘महाराज’ पद से सम्बोधित किये गये हैं, जब कि अजमेर के पृथु केवल पृथुराज अथवा पृथुराय ही हैं। अब तो जर्मन विद्वान् हिले ब्राण्ट द्वारा सम्पादित मुद्राराक्षस में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि विशाखदत्त के पिता का नाम भास्करदत्त ही था। उन्होंने इसी को प्रामाणिक ठहराया है। अतः महाराज पृथु सम्बन्धी विषय स्वयं ही निरस्त हो जाता है।
अन्तःसाक्ष्य की दृष्टि से ही इनके स्थिति काल के सम्बन्ध मे प्रमुख एवं महत्त्वशाली स्थल जो इनकी रचना ‘मुद्राराक्षस’ में मिलता है—वह है नाटक के अन्त में आया हुआ “भरतवाक्य”। नाटककार विशाखदत्त के काल-निर्णय से सम्बन्धित सभी कल्पनायें एकमात्र इसी पर आधारित हैं। किन्तु इस भरतवाक्य के द्वारा भी निश्चित रूप से इनका काल-निर्णय नहीं हो पाता क्योंकि इस भरत वाक्य में आये हुये प्रमुखपद ‘पार्थिवश्चन्द्रगुप्त’ मे अनेक रूपता उपलब्ध होती है। मुद्राराक्षस की प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों मे “पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः” के अतिरिक्त
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“पार्थिवोऽवन्तिवर्मा”, “पार्थिवोदन्तिवर्मा” और “पार्थिवोरन्तिवर्मा” ये तीन भिन्न-भिन्न पाठ और भी मिलते हैं। यह भरतवाक्य निम्नलिखित है :—
“वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरूपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिं प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री ।
म्लेच्छैरुद्विज्यमाना भुजयुगमधुना संश्रिता राजमूर्तेः
स श्रीमद्बन्धुभृत्यश्चिरमवतु महीं पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः ।। ७।१६ ।।
उपर्युक्त चारों प्रकार के पाठों में ‘पार्थिवोरन्तिवर्मा’ पाठ तो पूर्णतया अप्रामाणिक प्रतीत होता है। रन्तिवर्मा नाम के राजा के विषय में श्री तैलङ्ग तथा दास गुप्ता का यह विचार है कि भारतीय इतिहास के प्राचीन अथवा मध्ययुगीन काल में कहीं पर भी इस नाम का कोई भी राजा उपलब्ध नहीं होता। अतः उक्त पाठ अशुद्ध ही प्रतीत होता है। नकल करने वाले व्यक्ति का यह प्रमाद ही प्रतीत होता है कि वह ‘पार्थिवोऽवन्तिवर्मा’ के स्थान पर ‘पार्थिवोरन्तिवर्मा’ लिख गया होगा।
२. पार्थिवोदन्तिवर्मा पाठ—कुछ विद्वानों ने इसी पाठ को प्रामाणिक माना है तथा इसी आधार पर विशाखदत्त को पल्लवनरेश दन्तिवर्मा का समसामयिक माना है। पल्लवनरेश दन्तिवर्मा का शासनकाल ७७६-८३० ई० माना गया है। अतः विशाखदत्त का समय अष्टम शताब्दी माना जा सकता है। श्रीरामस्वामी ने तो इसी पल्लवनरेश दन्तिवर्मा के साथ, जो सप्तम शताब्दी में हुआ है, विशाखदत्त का सम्बन्ध जोड़ा है। किन्तु दन्तिवर्मा पाठ मान लेने पर विशाखदत्त का सम्बन्ध राष्ट्रकूट राजा दन्तिवर्मा के साथ, जो ६०० ई० में हुआ है, भी जोड़ा जा सकता है। लाट राजा दन्तिवर्मा, जो ८५० ई० में हुआ है, के साथ भी हो सकता है। उपर्युक्त विवरण से दन्तिवर्मा नाम के कई राजाओं का होना स्पष्ट हो जाता है। फिर किस दन्तिवर्मा के साथ विशाखदत्त का सम्बन्ध माना जाय, यह निश्चित किया जाना सम्भव नहीं है।
फिर यदि उपर्युक्त में से किसी को स्वीकार कर भी लिया जाय तो विशाखदत्त का समय सप्तम शताब्दी से लेकर नवम शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक किसी भी समय स्वीकार करना होगा। (१) किन्तु इस बीच किसी भी आक्रमणकारी म्लेच्छ का पता नहीं चलता है कि जिसके उत्पीड़न से पृथिवी की रक्षा के निमित्त प्रार्थना की
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जाय, जैसी कि इस भरतवाक्य में प्रार्थना की गई है। (२) सबसे बड़ी बात तो यह है, जैसा कि प्रा० ध्रुव ने भी स्वीकार किया है कि पल्लव-नरेश तो कट्टर शैवमता-वलम्बी थे, जब कि लेखक ने भरतवाक्य में राजा को विष्णु का अवतारस्वरूप ही कहा है।
ऐसी अवस्था में मुद्राराक्षस के भरतवाक्य का अपना गौरव ही समाप्त हो जायेगा। अतः पल्लवनरेश दन्तिवर्मा को विशाखदत्त का आश्रयदाता मानना उचित प्रतीत नहीं होता है।
(३) पार्थिवोऽवन्तिवर्मा पाठ—इस पाठ को प्रामाणिक मान लेने पर भी लेखक किसी राजा के आश्रित था, इसका उचित समाधान नहीं हो पाता है क्योंकि भारतीय इतिहास में अवन्तिवर्मा नाम के दो राजाओं का उल्लेख मिलता है। विद्वानों ने इन दोनों ही अवन्तिवर्मा नामों का उल्लेख विशाखदत्त के आश्रय-दाता के रूप में किया है। इनमें से एक हैं—कन्नौज के मौखरि राजा अवन्तिवर्मा जो सप्तम शताब्दी में हुए थे तथा जिनके पुत्र ग्रहवर्मा का विवाह हर्षवर्धन की बहिन राज्यश्री के साथ हुआ था। और दूसरे हैं कश्मीर-नरेश अवन्तिवर्मा—जिन्होंने नवम शताब्दी के मध्य ८५५ से ८६३ ई० तक राज्य किया था।
प्रो० याकोबी का अपना विचार है कि २ दिसम्बर, ८६० ई० को जो चन्द्र-ग्रहण पड़ा था, उसी का वर्णन मुद्राराक्षस के प्रथम अङ्क की प्रस्तावना रूप में हुआ है -
"क्रूरग्रहः सकेतुश्चन्द्रमसम्पूर्णमण्डलमिदानीम् ।
अभिभवितुमिच्छति बलात् रक्षत्येनं तु बुधयोगः ॥१।६॥"
इसी आधार पर उनकी यह मान्यता है कि विशाखदत्त कश्मीर के राजा अवन्तिवर्मा के समय में हुये थे। इसी उपर्युक्त ग्रहण के अवसर पर अवन्तिवर्मा के मन्त्री शूर ने इस नाटक का अभिनय कराया था। अतः विशाखदत्त का काल नवम शताब्दी का उत्तरार्द्ध ही होना चाहिये।
इस मत में प्रथम (१) आपत्ति तो यही है कि लेखक कश्मीर नरेश अवन्ति-वर्मा का सामन्त अथवा राजा नहीं हो सकता क्योंकि उसका राज्य इतना बड़ा नहीं था।
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(२) दूसरी आपत्ति यह है कि मुद्राराक्षस के लेखक विशाखदत्त ने कश्मीर-नरेश पुष्कराक्ष को 'म्लेच्छ' इस घृणित नाम से अभिहित किया है। यहाँ यह विचारणीय है कि यदि लेखक के आश्रयदाता कश्मीर-नरेश रहे होते तो क्या वह अपने आश्रयदाता को 'म्लेच्छ' शब्द द्वारा कहता ? अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त कश्मीर-नरेश के आश्रय में नहीं रहे।
(३) तीसरी बात यह है कि प्रस्तावना मे जिस चन्द्रग्रहण का उल्लेख आया है वह वस्तुतः सत्य न होकर चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रसङ्ग की अवतारणा के साथ ही रंगमंच पर लाने का प्रयास मात्र ही है। इसके अतिरिक्त वराहमिहिर द्वारा रचित वृहत्संहिता मे बुध के योग से पूर्ण चन्द्रग्रहण के होने मे विप्रतिपत्ति दिखलाई गई है। उन्होंने इसका प्रबल खण्डन किया है। अतः इस आधार पर विशाखदत्त का समय वराहमिहिर (लगभग ४९० ई०) से पूर्व ही होना चाहिये। इस दृष्टि से चन्द्रग्रहण के आधार पर निर्मित विचार निराधार ही हो जाता है।
(४) इसके अतिरिक्त श्रीतैलङ्ग महोदय ने कश्मीर-नरेश अवन्तिवर्मा को इस आधार पर विशाखदत्त का आश्रयदाता नहीं स्वीकार किया है कि उनको जिन स्थानो से मुद्राराक्षस की दो पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुयी है उन स्थानों से यह कश्मीर अधिक दूरी पर स्थित है।
अब इस पाठ के अन्तर्गत मौखरिवंशीय अवन्तिवर्मा की बात आती है। तैलङ्ग महोदय इसी को प्रामाणिक मानते हैं। उनके मतानुसार ये 'अवन्तिवर्मा' राजा हर्षवर्धन (जिनका कार्यकाल ऐतिहासिकों के मतानुसार ६०६-६४८ ई० माना गया है।) के बहनोई ग्रहवर्मा के पिता मौखरि राजा अवन्तिवर्मा थे। ये कन्नौज निवासी थे। कन्नौज के राजा के सामन्त का बिहार अथवा पश्चिमी बंगाल में भी होना संभव माना जा सकता है। प्रोफेसर श्री ध्रुव का भी इस सम्बन्ध मे यही मत है कि :—
'मिहिरकुल' तथा 'तोरमाण' द्वारा स्थापित हूण-साम्राज्य दशपुर (आजकल इसे मंदसौर कहा जाता है।) के संग्राम में महाराज यशोवर्मा के हाथों सन् ५२८ ई० में नष्ट हुआ तथा छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया; जिसके अन्तर्गत पंजाब में 'शाकल' (आधुनिक स्यालकोट) राज्य, और पश्चिमी राजपूताना
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तथा गुजरात में गुर्जर-राज्य प्रमुख थे । हूणों के ये छोटे-छोटे राज्य स्थाण्वीश्वर ( थानेश्वर ) और कान्यकुब्ज ( कन्नौज ) के राज्यों से शत्रुता रखने रहे । परिणामस्वरूप कन्नौज के मौखर या मौखरिवंशीय राजा ईशानवर्मा तथा सर्ववर्मा के इन हूणों के साथ कई बार युद्ध हुए जिनमें थानेश्वर के राजाओं की सहायता स मौखरिवंशीय राजाओ ने हूणों को हराया । शाकल के हूणवंशीय राजा तो थानेश्वर राज्य के शत्रु ही बन गये । परिणाम यह हुआ कि महाराज प्रभाकर-वर्धन और उनके सम्बन्धी कन्नोज के महाराज अवन्तिवर्मा ने मिलकर हूणों का नाश कर दिया । हूणों की विजय से प्रभावित महाकवि वाण ने प्रभाकरवर्धन की विजय-प्रशस्ति भी लिखी है तथा जिस ‘अवन्तिवर्मा’ की विजय का उल्लेख विशाखदत्त ने अपने मुद्राराक्षस के भरतवाक्य मे किया है वे महाराज प्रभाकरवर्धन क सम्बन्धी और उनके परम सहायक अवन्तिवर्मा ही हैं । इस हूण-विजय का समय सन् ५८२ ई० आंका गया है । इस भाँति मुद्राराक्षस के लेखक विशाखदत्त का कार्यकाल ईसा की छठी शताब्दी का अन्तिम उत्तरार्द्ध भाग ही होना चाहिये ।
उपर्युक्त समय का निर्धारण करते समय यह बात भी विचारणीय प्रतीत होती है कि विशाखदत्त ने एक पद्य में महाकवि भारवि का अनुकरण किया है जिसका समय लगभग छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध माना गया है । इससे विशाख-दत्त का भारवि का परवर्ती होना सिद्ध होता है । साथ ही वे ‘माघ’ के पूर्ववर्ती भी प्रतीत होते हैं क्योकि माघ ने परिवर्तित रूप मे मुद्राराक्षस मे यह उक्ति ली है —
“तन्त्रावापविदायोगैर्मण्डलान्वधितिष्ठता । मुनिग्रहा नरेन्द्रण फणीन्द्रा इव शत्रव ॥”
अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त का समय इन दोनो कवियों के समय के मध्य मे ही होना चाहिये । यह समय छठी शताब्दी के आस-पास ही होगा ।
उपर्युक्त समय की पुष्टि डा० विण्टरनिट्स द्वारा भी की गई है । उनका कथन है कि विशाखदत्त द्वारा रचित “देवीचन्द्रगुप्त” नामक नाटक के जो अंश उपलब्ध हुये हैं उनसे ज्ञात होता है कि इसमें ध्रुव देवी (अथवा ध्रुवस्वामिनी) के चन्द्र-गुप्त द्वितीय द्वारा शत्रु के पंजे से मुक्त किये जाने की घटना वर्णित है । इस
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नाटक का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि समुद्रगुप्त के पश्चात् उनके पुत्र रामगुप्त सम्राट् बने थे। इस कायर राजा ने अपने समकालीन शक-नरेश के आक्रमण के भय से सन्धि के रूप में अपनी अति सुन्दर रानी ध्रुवदेवी को उसे दे देने का वचन दे दिया था। किन्तु उसके छोटे भाई कुमार चन्द्रगुप्त (सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय) ने रानी का वेश धारण कर एक अप्रत्याशित कूटनीतिक चाल द्वारा शक-नरेश को मार डाला। तदनन्तर चन्द्रगुप्त ने अपने बड़े भाई रामगुप्त को भी मारकर गुप्त-साम्राज्य को हथिया लिया तथा ध्रुवदेवी से, जो उनके अनुपम साहस के कारण उन पर अनुरक्त थी, विवाह कर लिया। इससे कुमार-गुप्त की उत्पत्ति हुई। यह संभव प्रतीत नहीं होता कि विशाखदत्त ने एक ऐसे नाटक की, कि जिसमें चन्द्रगुप्त ने अपने अग्रज रामगुप्त का हननकर उसकी रानी से विवाह कर लिया हो, रचना चन्द्रगुप्त अथवा कुमारगुप्त के शासनकाल में की हो। अतः 'देवीचन्द्रगुप्त' नामक नाटक की रचना राजा अवन्तिवर्मा के काल में ही विशाखदत्त द्वारा की गई होगी। इस भाँति उक्त आधार पर भी विशाखदत्त का समय छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध ही बनता है।
इस 'अवन्तिवर्मा' से सम्बन्धित मत में भी अनेक आपत्तियाँ उठाई जाती हैं जो निम्नलिखित हैं :--
(१) यदि विशाखदत्त द्वारा कन्नौज के महाराज 'अवन्तिवर्मा' की प्रशस्ति अपने नाटक "मुद्राराक्षस" के 'भरतवाक्य' के द्वारा की गई और स्थाण्वीश्वर के महाराज प्रभाकरवर्धन की यशोगाथा का गान महाकवि बाण द्वारा किया गया तो यह बड़े आश्चर्य की बात है। समसामयिक होते हुये भी दोनों (बाण तथा विशाखदत्त) एक दूसरे से अपरिचित क्यों रहे ? क्योंकि दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे के बारे में अपनी कृतियों में संकेतमात्र तक नहीं किया है।
(२) राजा अवन्तिवर्मा समग्र भारत अथवा अधिकांश भारत का एकच्छत्र सम्राट् कभी नहीं रहा कि जिसका वर्णन मुद्राराक्षस के तृतीय अङ्क के उन्नीसवें (आशैलेन्द्रात्...इत्यादि) तथा चौबीसवें श्लोक में चाणक्य के कथनों में उपलब्ध होता है।
(३) इन्होंने ऐसा कोई उल्लेखनीय कार्य भी नहीं किया है कि जिसके
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आधार पर उन्हें भगवान् विष्णु का पृथ्वी-रक्षक अवतार माना जाय (जैसा कि भरतवाक्य में वर्णित है )।
(४) मुद्राराक्षस की शैली छठी अथवा उसके बाद की शताब्दी की शैली से मेल नहीं खाती है ।
(५) इस नाटक के सप्तम अङ्क के छठे ( "दुष्कालेऽपि "इत्यादि ) श्लोक में वर्णित चन्दनदास के शील-सौजन्य को बोधिसत्वों के शील-सौजन्य से बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया जाना छठी अथवा उसके बाद की शताब्दी के भारत की धार्मिक भावनाओं के साथ संगत नहीं है ।
(६) मुद्राराक्षस के 'भरतवाक्य' में 'म्लेच्छ' शब्द से केवल हूणों का ही अर्थ लिया जाय, यह बात कुछ उचित प्रतीत नहीं होती है, जब कि नाटककार ने कुलूताधिपति चित्रवर्मा, मलयदेश के राजा सिंहनाद, कश्मीर-नरेश पुष्कराक्ष, सिन्धुदेश के राजा सिन्धुषेण और पारस के अधिपति मेघ को भी म्लेच्छ कहा है ( कौलूतश्चित्रवर्मा इत्यादि श्लोक १।२०।। ) । पर्वतेश्वर तथा उसका बेटा मलयकेतु भी म्लेच्छ ही थे । इसके अतिरिक्त नाटककार शक, यवन, किरात, कम्बोज दरद्वासी, परशियन तथा बाह्लीक लोगों से भी पूर्णतया परिचित है (द्वितीय अङ्क में विराघगुप्त के कथन में १३वें श्लोक से पूर्व) । ये सभी म्लेच्छ-राज पर्वतक की सेना के अङ्ग थे । ये सभी उस समय वीरता के लिये प्रसिद्ध थे । इन पर कोई साधारण राजा विजय प्राप्त नहीं कर सकता था । अतः नाटककार ने जिस राजा की महानता एव अप्रतिम शक्ति शालिता का वर्णन अपने नाटक में प्रस्तुत किया है वह राजा मौखरिवंशीय 'अवन्तिवर्मा' नहीं हो सकता है । अतः 'अवन्तिवर्मा' को विशाखदत्त का आश्रयदाता स्वीकार किया जाना संगत प्रतीत नहीं होता है ।
(४) पार्थिवश्चन्द्रगुप्त पाठ ही अधिक प्रामाणिक प्रतीत होता है, ऐसा कुछ विद्वानों तथा आलोचकों ने स्वीकार किया है । इस पाठ के स्वीकार कर लेने पर यह कठिनाई उपस्थित होती है कि भारत के अतीत में 'चन्द्रगुप्त' नामधारी तीन शासक हुये हैं—(१) मौर्य-साम्राज्य की स्थापना करने वाला 'चन्द्रगुप्त मौर्य' जो स्वयं ही नाटक का एक प्रमुख पात्र है । (२) मगध के गुप्त साम्राज्य की स्थापना से सम्बन्ध रखने वाला चन्द्रगुप्त प्रथम तथा (३) चन्द्रगुप्त
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द्वितीय जिसे अपनी असीम शक्ति के कारण 'विक्रमादित्य' नामक उपाधि से अलङ्कृत किया गया था।
इन तीनो मे से प्रथम 'चन्द्रगुप्त मौर्य' तो हो नही सकता क्योकि नाटक की प्रस्तावना में इनके पितामह को सामन्त तथा पिता को महाराज शब्दों द्वारा कहा गया है। विशाखदत्त चन्द्रगुप्त मौर्य के न तो सामन्त ही थे न महाराज ही। यह बात नाटक के पढ़ने से स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। दूसरी बात यह है कि नाटक के अन्दर लेखक का उसके प्रति केवल आदर का भाव ही व्यक्त नही हुआ है, घृणा की भी अभिव्यक्ति हुई है।
गुप्त सम्राट् चन्द्रगुप्त प्रथम भी विशाखदत्त के आश्रयदाता नही हो सकते क्योकि इतिहास मे ऐसा कहीं नही मिलता है कि इन्होने विदेशी म्लेच्छ आक्रमण-कारियो को पराजित किया हो।
अतः अब चन्द्रगुप्त द्वितीय ही शेष रह जाते है, जिनको विशाखदत्त का आश्रयदाता समझा जा सकता है। यह एक प्रतापी राजा था। इसका राज्य प्रायः समस्त भारत में फैला हुआ था। इसी ने शको को पराजित कर 'विक्रमादित्य' की उपाधि को प्राप्त किया था। इसी के द्वारा कुषाण के वंशजों तथा बाह्लीको और अन्य म्लेच्छों को दूर भगांकर पंजाब में इन लोगों से अधि-कृत प्रदेश को अपने अधिकार मे कर लिया गया था। इन्ही की राजधानी कुसुमपुर ( आधुनिक पटना ) थी जहाँ से सम्पूर्ण भारत का संचालन किया जाता था। विशाखदत्त ने अपने नाटक मुद्राराक्षस मे प्रकारान्तर से इसी चन्द्र-गुप्त द्वितीय का वर्णन किया है। यह चन्द्रगुप्त द्वितीय विष्णुभक्त भी था। अतः उसी को पृथ्वी का उद्धारक विष्णु का अवतार कहा जाना भी युक्तिसंगत प्रतीत होता है।
इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त के आश्रयदाता चन्द्रगुप्त द्वितीय ही रहे होगे। चन्द्रगुप्त द्वितीय का कार्य-काल ३७५ ई० से ४१३ ई० तक माना जाता है। अतः विशाखदत्त का स्थितिकाल चतुर्थ शताब्दी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का पूर्वार्द्ध स्वीकार किया जा सकता है।
मुद्राराक्षस में चन्दनदास के शील एवं सौजन्य का जो चित्र उपस्थित किया
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गया है वह बाधिसत्वो से अधिक उत्तम॒ है तथा चतुर्थ शताब्दी की ही देन प्रतीत होती है —
‘बुद्धानामपि चेष्टित सुचरितै क्लिष्ट विशुद्धात्मना ॥’'७।१५॥
चतुर्थ एव पञ्चम शताब्दी मे गुप्तवंशीय वैष्णव-नरेश इस मत के अनुयायी थे। इसी कारण विशाखदत्त ने भरतवाक्य मे वैष्णव आश्रयदाता गुप्तवश के सम्राट् समुद्रगुप्त अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की ओर सकेत किया है।
मुद्राराक्षस में जिस सामाजिक दशा का चित्रण किया गया है वह चतुर्थ अथवा पञ्चम शताब्दी की ही प्रतीत होती है।
इन आधारो पर भी विशाखदत्त का काल पूर्ववत् ही सिद्ध होता है।
‘मुद्राराक्षस’ नामक नाटक में भरतवाक्य का प्रयोग जिस विलक्षणता के साथ किया गया है वैसा अन्यत्र देखने को नही मिलता। अन्य नाटको में भरत-वाक्य प्राय नायक द्वारा ही कहलवाया गया है किन्तु इस नाटक में नायक के स्थान पर प्रतिनायक द्वारा इसे कहलवाया गया है। चाणक्य को आशीर्वादवचन-दाता के रूप में चित्रित कर दिये जाने के पश्चात् भरतवाक्य कहने के लिये चन्द्रगुप्त का नम्बर आता है। चाणक्य चन्द्रगुप्त तथा राक्षस दोनो ही से एक साथ पूछता है —
“भो राजन् चन्द्रगुप्त !, भो अमात्य राक्षस !, उच्यता कि वा भूयः प्रियमुपकरोमि ?”
यह पूछे जाने पर चन्द्रगुप्त को भरतवाक्य कहने का पूर्ण अवसर प्राप्त था किन्तु लेखक द्वारा चन्द्रगुप्त से भरतवाक्य की पूर्वपीठिका मात्र ही प्रस्तुत कराई जाती है तथा प्रतिनायक राक्षस द्वारा भरतवाक्य। संस्कृत नाटक-साहित्य में सम्भवत ऐसा उद्धरण नहीं मिलेगा। भरतवाक्य के कहने की तैयारी चन्द्र-गुप्त करता है किंतु उसे प्रस्तुत करता है राक्षस। इसका एकमात्र कारण यही हो सकता है कि लेखक भरतवाक्य के अन्तिम चरण में “पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः” पाठ अवश्य रखना चाहता है। यह तभी सम्भव था कि जब इसे चन्द्रगुप्त के मुख से न कहलवाकर राक्षस के मुख से ही कहलवाया जाता। यदि यह पाठ न रखकर चन्द्रगुप्त से ‘राजन्’ शब्द के द्वारा राज सामान्य का वर्णन कराया जाता
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जैसा कि अन्य नाटकों में देखने को उपलब्ध होता है तो भी लक्ष्य की पूर्ति होना संभव न था। ऐसी स्थिति होने पर भरतवाक्य के तीसरे चरण में आये हुये "अधुना" शब्द की उपयोगिता भी पूर्ण न हो पाती। अतः इससे यही ध्वनित होता है कि नाटककार को "पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः" यही पाठ रखना अभीष्ट था।
इसके अतिरिक्त इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जहां लेखक ने अपने नाटक का इतिवृत्त मौर्य-साम्राज्य की स्थापना करने वाले चन्द्रगुप्त से सम्बन्धित रखा है वही लेखक द्वारा यह भी संकेत किया गया है कि उसके समय में राज्य करने वाले राजा का नाम भी चन्द्रगुप्त ही है। अतः "पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः" इस पाठ का संकेत गुप्तवंशीय राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय की ओर ही है।
इस आधार पर भी विशाखदत्त का स्थिति काल चतुर्थ शताब्दी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का पूर्वार्द्ध ही सिद्ध होता है क्योंकि चन्द्रगुप्त द्वितीय का कार्यकाल ३७५-४१३ ई० माना गया है।
डा० काशीप्रसाद जायसवाल ने भी भरतवाक्य के उपर्युक्त पाठ को ही प्रामाणिक माना है तथा भरतवाक्य मे आये हुये 'अधुना' और 'चन्द्रगुप्त' के आधार पर नाटक की रचना, चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के ही (३७५-४१४ ई०) काल की स्वीकार की है। उनकी प्रमुख युक्तियाँ निम्नलिखित हैं :—
(१) विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस मे जिस शैली का प्रयोग किया है वह शैली पंचम शताब्दी के पश्चात् की नही हो सकती है। नाटककार की शैली में लम्बे-लम्बे समासो का अभाव है। इसमे कृत्रिमता का भी दर्शन लगभग नगण्य के समान है। अतः इस प्रकार की शैली पंचम शताब्दी के पश्चात् की होना किसी भी दशा मे संभव नही है।
(२) नाटक की राजनीतिक कल्पनाएं भी चतुर्थ अथवा पंचम शताब्दी की परिस्थितियों की ही द्योतक हैं।
(३) 'भरतवाक्य' में जिस साम्राज्य की कल्पना की गई है—वह गुप्तकाल ही प्रतीत होता है।
(४) यदि विशाखदत्त बाण के समकालिक थे तो दोनो को एक-दूसरे का ज्ञान क्यो नहीं था।
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डा० जायसवाल के इस मत से प्रो० हिलेब्रेण्ट (Hillebrandt), स्पेयर (Speyer) और टोने (Towney) भी सहमत हैं।
M कृष्णमाचार्य ने भी अपनी पुस्तक 'History of Classical Sanskrit Literature' मे इसी मत का प्रतिपादन किया है। प्रो० स्टेन कोनो (Sten Konow) ने भी इसी को प्रामाणिक माना है। श्री आर० एस० पण्डित तथा सी० आर० देवधर ने भी इसी का अनुमोदन किया है।
नाटककार विशाखदत्त की दूसरी कृति "देवीचन्द्रगुप्त" मानी गयी है। इसके उपलब्ध अंशो के आधार पर ज्ञात होता है कि नाटककार ने इसमें तीन पात्रों के चरित्र पर विशद रूप से प्रकाश डाला है—(१) राजा, (२) रानी तथा (३) राजकुमार चन्द्रगुप्त। इस प्रकार का चित्रण उसी व्यक्ति के द्वारा किया जाना सम्भव है जो कि या तो स्वयं उस राजदरबार में विद्यमान हो और सम्बन्धित व्यक्ति से भली भांति परिचित हो अथवा उस व्यक्ति द्वारा किया जाना सम्भव है जिसका काम केवल प्रशंसा करना मात्र ही है तथा आवश्यकता-नुसार जिसे कुमार के चरित्र को निर्दोष एवं उत्कृष्ट बनाना है जो कि आगे चलकर राजगद्दी पर आसीन होता है। जो भी हो—इस नाटक के अध्ययन से तो स्पष्ट हो ही जाता है कि यह 'देवीचन्द्रगुप्त' नाटक ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखित है जो कि सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन था। अतः इस आधार पर भी विशाखदत्त का स्थितिकाल पूर्ववत् ही सिद्ध होता है।
**बहिर्साक्ष्य—**इसके आधार पर भी लगभग उपर्युक्त समय की ही पुष्टि हो जाती है। श्री भोज ने अपने 'सरस्वती कण्ठाभरण' मे, जिसका रचना-काल ११वीं शताब्दी स्वीकार किया गया है, मुद्राराक्षस के निम्नलिखित दो पद्यों को उद्धृत किया है —
"उपरिघन घनरटित दूरे दयिता किमेतदापतितम्। हिमवति दिव्योपधय शीर्षे सर्प समाविष्ट ॥—मुद्रा० १।२२ और सरस्वती०—३।८७॥
तथा—
प्रत्यग्रोन्मेषजिह्मा क्षणमनभिमुखी रत्नदीपप्रभा इत्यादि। —मुद्रा० १।२१वां श्लोक तथा सरस्वती० १।६८॥
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इसी प्रकार १०वीं शताब्दी में विद्यमान धनंजय ने अपने ग्रन्थ ‘दशरूपक’ में मुद्राराक्षस का संकेत निम्नलिखित रूप में किया है :-
“तत्र वृहतकथामूलं मुद्राराक्षसम्” —दशरूपक १।६८ के नीचे
तथा—
“मन्त्रशक्त्या, यथा मुद्राराक्षसे राक्षसहायोदीनां चाणक्येन स्वबुद्ध्या भेदनम्” इत्यादि —दशरूपक २।५५ के नीचे
इसके अतिरिक्त इसी दशरूपक के द्वितीय प्रकाश में नायक के सामान्य गुणों की चर्चा करते हुये “स्थिर:” इस विशिष्ट गुण को स्पष्ट करते हुए लिखा है :—
यथा वा भर्तृहरिशतके [ नीति शतक श्लोक—२६ ]—
“प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमगुणाः न परित्यजन्ति” ॥ मुद्रा० २।१६॥
किन्हीं-किन्ही प्रतियों में इस श्लोक का अन्तिम चरण निम्नलिखित रूप में मिलता है :—
“प्रारब्धमुत्तमगुणास्त्वमिवोद्वहन्ति”
इसमें आये हुये “त्वमिव” की संगति मुद्राराक्षस में तो ठीक बैठ जाती है किन्तु भर्तृहरि शतक में ठीक नही बैठती । इससे ज्ञात होता है कि यह श्लोक मुद्राराक्षस का ही है तथा भर्तृहरि ने इसको वहीं से ले लिया होगा । यदि इसको ठीक मान लिया जाय तो विशाखदत्त की स्थिति भर्तृहरि से पहले सिद्ध हो जाती है । भर्तृहरि का समय ६५१ ई० के लगभग माना गया है। अतः विशाखदत्त का समय इससे पहले का ही रहा होगा ।
मुद्राराक्षस का घटनास्थल पाटलिपुत्र ( आधुनिक पटना ) है । मुद्राराक्षस में इसका वर्णन एक प्रसिद्ध गौरवशाली नगर के रूप में किया गया है। इसको पुष्पपुर अथवा कुसुमपुर नाम से भी कहा गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसकी सत्ता सिद्ध होती है । चीनी यात्री फाह्यान ने अपनी मध्य-एशिया की यात्रा ३६६ ई०
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से ४११ ई० तक की थी। इसी बीच वे बुद्ध भगवान् की पावन-भूमि के दर्शन तथा बौद्ध धर्म की पुस्तको की खोज में भारत भी आये थे। वे लगभग ७ वर्षों तक भारत का भ्रमण कर तथा अनेक बहुमूल्य पुस्तकों और मूर्तियों को लेकर अपने देश लौट गये। उन्होंने पाटलिपुत्र को मगध की राजधानी के रूप मे देखा था—ऐसा उन्होंने लिखा है। इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में जो बौद्ध धर्म की ओर (७।५ मे) संकेत है, उससे यह ज्ञात होता है कि उस समय बौद्ध धर्म का अभ्युदय काल था। यही दशा फाह्यान के भारत आने के समय भी थी।
इसके अनन्तर दूसरा चीनी यात्री ह्वेनसांग ( Hiunen-Tsang ) भी भारत मे आया। उसकी यात्रा ६४६-६६६ ई० के मध्य रही। वह १५ वर्ष तक यहाँ रहा। उसने मगध की राजधानी पाटलिपुत्र का वर्णन भग्नावशेष रूप में किया है।
इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि छठी अथवा सप्तम शताब्दी में पाटलिपुत्र की दशा, प्रतिष्ठा वह नही रह गई थी जिसका वर्णन मुद्राराक्षस में उपलब्ध होता है। अतः फाह्यान द्वारा लिखित पाटलिपुत्र की दशा के उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुद्राराक्षस की रचना चतुर्थ शताब्दी के अन्त में अथवा पञ्चम शताब्दी के प्रारम्भ में हुई होगी। पुन इसी आधार पर नाटककार विशाखदत्त का स्थितिकाल भी यही मानना होगा।
जीवन-वृत्त
काल-वर्णन के प्रारम्भ मे ही उद्धृत प्रस्तावना के अंश से स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार का नाम विशाखदत्त ही था। इनके पिता का नाम भास्करदत्त तथा पितामह का नाम वटेश्वरदत्त था। 'मुद्राराक्षस' की कुछ प्रतियो में "महाराज भास्करदत्तसूनो" के स्थान पर 'महाराजपदभाक्पृथुसूनो' पाठ भी मिलता है। इसी आधार पर प्रो० विल्सन ने लेखक के निवासस्थान का निर्णय इस प्रकार किया है कि महाराज पृथु और अजमेर के पृथुराज अथवा पृथुराय एक ही हैं। किन्तु आगे चलकर उन्होंने स्वयं ही यह संकेत भी दिया है कि 'वटेश्वरदत्त' में प्रयुक्त 'दत्त' शब्द इस निर्णय में कठिनाई उपस्थित करता है। श्री तैलंग महोदय ने उपर्युक्त कल्पना का विरोध करते हुये यह मत अभिव्यक्त किया है कि
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विशाखदत्त के पिता पृथु तथा अजमेर-निवासी पृथुराय दोनों ही पृथक्-पृथक् व्यक्ति हैं क्योंकि विशाखदत्त के पिता 'महाराज' पद द्वारा सम्बोधित किये गये हैं तथा अजमेर के पृथु केवल पृथुराज अथवा पृथुराय ही हैं।
इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में वर्णित नाटककार के पिता एवं पितामह आदि को 'सामन्त' कहा गया है। वह जिस राजा के सामन्त पद पर आसीन होकर शासन कार्य भी संभाला करते थे वह भारत का एकछत्र सम्राट् था (भरतवाक्य मे आता ही है :—सः•••••••••चिरमवतु महीं•••••• इत्यादि)। इस आधार पर प्रो० विल्सन का मत एकदम निराधार ही हो जाता है। इसके अतिरिक्त जर्मन विद्वान् हिलीब्राण्ट महोदय ने अपने द्वारा सम्पादित मुद्राराक्षस में 'भास्करदत्त' नाम को ही प्रामाणिक रूप में स्वीकार किया है।
नाटककार ने अपनी कृति 'मुद्राराक्षस' में उत्तर भारत का जो विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है उससे यह बात सहज ही स्पष्ट हो जाती है कि विशाखदत्त उत्तर भारत के ही निवासी थे। इस विचार की पुष्टि नाटक में वर्णित काशपुष्पों तथा हंस के वर्णन से भी हो जाती है। काशपुष्प तथा हंस उत्तर भारत की नदियों के किनारे ही पाये जाते हैं। तृतीय अङ्क में शरद् ऋतु सम्बन्धी वर्णन देखिये :—
"आकाशं काशपुष्पच्छविमभिभवता भस्मना शुक्लयन्ती शीतांशोरंशुजालैर्जलधरमलिनां क्लिन्दन्ती कृत्तिमैभीम् । कापालीमुद्वहन्ती स्रजमिव धवला कौमुदीमित्यपूर्वा हासश्रो राजहंसा हरतु तनुरिव क्लेशमैशी शरद.॥" ३।२०॥
गङ्गा के किनारे स्थित पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) के विशद् वर्णन से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार इस प्रदेश के भूभाग से भली भाँति अवगत है तथा इसी ओर का निवासी है। प्रस्तावना में ही सूत्रधार कहता है :—
"चीयते बालिशस्यापि सत्क्षेत्रपतिता कृषिः । न शालेः स्तम्बकरिता वप्तुर्गुणमपेक्षते ॥" १।३॥
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यह उद्धरण नाटककार के उस प्रदेश के निवासी होने का परिचायक है जो कि धान की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कवि धान की उस अवस्था से भी पूर्णतया परिचित है जब कि वे गुच्छों के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ करते हैं तथा सघन होते हैं। वह यह भी जानता है कि धान की इस वृद्धि में बोने वाले कृषक की कोई योग्यता कारण नहीं है अपितु खेत की उर्वराशक्ति ही कारण है जो कि धान के पौधों को बढने का अवसर प्रदान किया करती है।
सूत्रधार द्वारा यह उक्ति दर्शको के समक्ष कही जा रही है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दर्शकगण तथा अभिनेताजन भी धान तथा उसकी उपजाऊ भूमि से भली भाँति परिचित हैं।
पञ्चम अङ्क के अन्त में आये हुए तेरहवें श्लोक के पूर्वार्ध भाग के पढने से यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार गौड देश के रीति-रिवाजो, वहाँ की स्त्रियों के प्रसाधन सम्बन्धी साधनों तथा आकार-प्रकार से पूर्णतया परिचित थे।
खस जाति के लोग उस समय बडे योद्धा माने जाते थे। मलयकेतु की सेना में यही सबसे बडे विश्वासपात्र थे। यही कारण था कि राक्षस भी उन्हें अपने साथ रखना चाहता था (मुद्रा० ५।११)। इस जाति के लोग भारत के पूर्वी भाग के पहाडी प्रदेशो में रहा करते थे।
इन वर्णनों से भी नाटककार का पूर्वी बिहार अथवा बङ्गाल के पश्चिमी भाग का निवासी होना सिद्ध होता है। नाटक में प्रयुक्त गौडी रीति भी इसी तथ्य की पोषक है।
धार्मिक आस्था— नाटक के अध्ययन से ध्वनित होता है कि विशाखदत्त वैदिक धर्म के अनुयायी रहे होंगे। आश्रम-धर्म में उनकी पूर्ण आस्था थी। वैदिक पद्धति के अनुसार प्रतिदिन यज्ञ (हवन) आदि करना उनकी दृष्टि में एक आदर्श पद्धति थी। ऋषियों के जीवन को वे एक आदर्श जीवन समझते थे। द्विजो के लिये ब्रह्मचर्य-आश्रम में निवास करते हुये गुरु-सेवा को वे महत्त्व प्रदान करते थे :-
"उपलशकलमेतद् भेदकं गोमयानां वटुभिरुपहृतानां बर्हिषा स्तोम एव। शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिराभि— र्विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम्॥" ३।१५॥