मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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यह उद्धरण नाटककार के उस प्रदेश के निवासी होने का परिचायक है जो कि धान की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कवि धान की उस अवस्था से भी पूर्णतया परिचित है जब कि वे गुच्छों के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ करते हैं तथा सघन होते हैं। वह यह भी जानता है कि धान की इस वृद्धि में बोने वाले कृषक की कोई योग्यता कारण नहीं है अपितु खेत की उर्वराशक्ति ही कारण है जो कि धान के पौधों को बढने का अवसर प्रदान किया करती है।
सूत्रधार द्वारा यह उक्ति दर्शको के समक्ष कही जा रही है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दर्शकगण तथा अभिनेताजन भी धान तथा उसकी उपजाऊ भूमि से भली भाँति परिचित हैं।
पञ्चम अङ्क के अन्त में आये हुए तेरहवें श्लोक के पूर्वार्ध भाग के पढने से यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार गौड देश के रीति-रिवाजो, वहाँ की स्त्रियों के प्रसाधन सम्बन्धी साधनों तथा आकार-प्रकार से पूर्णतया परिचित थे।
खस जाति के लोग उस समय बडे योद्धा माने जाते थे। मलयकेतु की सेना में यही सबसे बडे विश्वासपात्र थे। यही कारण था कि राक्षस भी उन्हें अपने साथ रखना चाहता था (मुद्रा० ५।११)। इस जाति के लोग भारत के पूर्वी भाग के पहाडी प्रदेशो में रहा करते थे।
इन वर्णनों से भी नाटककार का पूर्वी बिहार अथवा बङ्गाल के पश्चिमी भाग का निवासी होना सिद्ध होता है। नाटक में प्रयुक्त गौडी रीति भी इसी तथ्य की पोषक है।
धार्मिक आस्था— नाटक के अध्ययन से ध्वनित होता है कि विशाखदत्त वैदिक धर्म के अनुयायी रहे होंगे। आश्रम-धर्म में उनकी पूर्ण आस्था थी। वैदिक पद्धति के अनुसार प्रतिदिन यज्ञ (हवन) आदि करना उनकी दृष्टि में एक आदर्श पद्धति थी। ऋषियों के जीवन को वे एक आदर्श जीवन समझते थे। द्विजो के लिये ब्रह्मचर्य-आश्रम में निवास करते हुये गुरु-सेवा को वे महत्त्व प्रदान करते थे :-
"उपलशकलमेतद् भेदकं गोमयानां वटुभिरुपहृतानां बर्हिषा स्तोम एव। शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिराभि— र्विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम्॥" ३।१५॥