मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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उनका आश्रयदाता राजा विष्णु का उपासक था । [ अङ्क ७।१९ ] । उन्होंने मुद्राराक्षस के प्रारम्भ में शिव की उपासना की है । इससे उनका शिवोपासक होना स्पष्ट होता है [ अङ्क १।१ २ ] । इसके अतिरिक्त भगवान् विष्णु के प्रति भी उनकी आस्था दृष्टिगोचर होती है [ अङ्क ३।२०-२१। ] । इतना होने पर भी वे अति उदार-दृष्टि के व्यक्ति प्रतीत होते हैं। उन्होंने बौद्ध-धर्म सम्बन्धी परम्पराओं एवं जातक-कथाओं का भी उल्लेख बड़े आदर के साथ किया है [ अङ्क ४।१८ ] । तान्त्रिक क्रियाओं तथा शकुनों आदि में भी उनका विश्वास था [ श्लोक सं० ४।१२ की तृतीय पंक्ति तथा चतुर्थ अङ्क में तृतीय श्लोक के पश्चात् राक्षस की उक्ति ] । श्लोक सं० ४।२१ में सूर्य के प्रति भी उन्होंने अपनी भक्ति प्रकट की है । भाग्यवादी होने के साथ ही वे पौरुष में पूर्ण निष्ठा रखते थे [ द्वितीय अङ्क के श्लोक सं० १५ से १६ तक का वर्णन ] ।
विशाखदत्त का व्यक्तित्व—नाटककार अथवा कवि अपनी कृति में अपने हृदयगत-भावों तथा अनुभूतियों का ही चित्रण किया करता है । भावों तथा अनुभूतियों के इस चित्रण में ही नाटककार अथवा कवि का अपना व्यक्तित्व झलका करता है । मुद्राराक्षस मे भी विशाखदत्त का जो व्यक्तित्व झलकता दिखाई देता है उसके तीन रूप हमारे समक्ष आते हैं—(१) राष्ट्र-जीवन सम्बन्धी दार्शनिकता का रूप, (२) राजनीतिक आदर्शवादिता का रूप तथा (३) मानवता सम्बन्धी महाविश्वासी होने का रूप ।
कोई भी राष्ट्र, चाहे वह राजतन्त्रात्मक हो अथवा प्रजातन्त्रात्मक, तभी उन्नत हो सकता है जब उसके निवासी अपने स्वार्थ की अपेक्षा देश तथा समाज के स्वार्थ को प्रधानता दें । मुद्राराक्षस नाटक का 'चाणक्य' राष्ट्र की राजनीति का कर्णधार है, जिसकी आत्मत्याग की भावना सर्वत्र व्याप्त है तथा राष्ट्र-हित से ओत-प्रोत है । मुद्राराक्षस का 'चन्द्रगुप्त' राष्ट्र-शासन का नियामक है जिसे जनरंजन की परतन्त्रता में ही शासक की स्वतन्त्रता के आत्मगौरव की अनुभूति हुआ करती है । मुद्राराक्षस का 'राक्षस' एक ऐसा राष्ट्र-पुरुष है जो राष्ट्र के निमित्त अपनी आत्मा का बलिदान करने हेतु सदैव उद्यत रहा करता है । इसी भांति मुद्राराक्षस के दूत, गुप्तचर आदि अन्य पात्र भी कर्त्तव्य-भावना से प्रेरित ही दृष्टिगोचर होते हैं । यही है मुद्राराक्षस का राष्ट्र-जीवन सम्बन्धी दार्शनिक रूप ।