मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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सरमा और पणि ( ऋग्वेद १०।१०८ ) इत्यादि संवादात्मक सूक्तो का विवरण प्राप्त होता है जिनसे नाटकीय 'संवाद' नामक तत्त्व की पुष्टि होती है । 'संगीत' नामक नाटकीय तत्त्व सामवेद मे मिलता ही है । इसके अतिरिक्त शेष प्रमुख नाटकीय तत्त्व किसी न किसी रूप मे वैदिक-काल में अवश्य विद्यमान रहे होगे । अतः यह हो सकता है कि ये ऋग्वेदीय-संवादात्मक सूक्त ही कालान्तर में परिष्कृत होकर नाटको के रूप मे परिणत हो गये हो ।
ऋग्वेदीय सूक्तों का अध्ययन करने से यह भी ज्ञात होता है—"सोम-विक्रय" के समय एक प्रकार का अभिनय हुआ करता था जिसका मुख्य प्रयोजन दर्शको का मनोविनोद ही था । अश्वमेध इत्यादि विशिष्ट यज्ञो के अवसरों के समय तथा उनके बीच-बीच में होने वाले कर्मानुष्ठानो के मध्य प्राप्त होने वाले अव-काश के समय "शुन शेप" इत्यादि के पुराने आख्यानो का कथन किया जाया करता था । उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह भी कल्पना की जा सकती है कि उपर्युक्त प्रसगो के अवसरों पर वैदिक देवताओ के चरित्र से सम्बन्धित नाटको का भी यथावसर प्रयोग होता रहा हो । हो सकता है कि ये नाटक कला की दृष्टि से पूर्ण न रहे हो किन्तु यह तो सम्भव है ही कि उनमे संस्कृत-नाट्यकला के बीज विद्यमान रहे हो ।
मैक्समूलर ने भी वेदो मे प्रयुक्त संवादात्मक सूक्तो के आधार पर वैदिक काल से ही नाट्यकला का उद्भव सिद्ध किया है (देखिए मैक्समूलर—ओरिजिन आफ दि ऋग्वेद, वाल्यूम १, पृष्ठ १७३ ) । डा० दास गुप्ता तथा एस० के० डे महोदय ने भी यही स्वीकार किया है कि उन मन्त्रो मे नाटकीय-तत्त्व अधिकांश रूप में विद्यमान हैं तथा तत्कालीन जनजीवन के धार्मिक अवसरो, संगीत समा-रोहों तथा नृत्यानुष्ठानों से नाटक का घनिष्ठ सम्बन्ध था (देखिए डा० एम० एन० दास गुप्ता तथा एम० के० डे हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर, वाल्यूम १, पृष्ठ ४४, १९४७) ।
बाजसनेयि-माध्यन्दिन-शुक्ल-यजुर्वेद-सहिता में ( "नृत्ताय सूत गीताय शैलूषं धर्माय समाहर"—इत्यादि मन्त्र यजुर्वेद ३०।६ ) तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में "शैलूष" शब्द आता है जिसका अर्थ होता है "नट" ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ३।४।२।१ ) । कौषीतकि-ब्राह्मण मे नृत्य, गीति तथा संगीत मुख्य