भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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विधाओं में परिणत किये गये है। “महाव्रत” में वृष्टि की उत्पत्ति तथा पशुओं की समृद्धि के निमित्त अग्नि के चारों ओर कुमारियों द्वारा नृत्य किये जाने का वर्णन आता है तथा विवाह-समाप्ति से पूर्व अग्निदेव के समक्ष स्त्रियों के नृत्य करने का भी संकेत मिलता है।१ इन उल्लेखों के द्वारा यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक तथा ब्राह्मण-काल में नटों तथा नाट्यकला का अस्तित्व विद्यमान था।

इसके पश्चात् रामायण तथा महाभारत-काल में भी नाट्यकला की ओर देशवासियो का ध्यान था। इन दोनों ग्रन्थों में ‘नट’, ‘नर्त्तक’ तथा ‘गायक’ आदि का उल्लेख अनेक स्थलों पर उपलब्ध होता है। वाल्मीकि-रामायण में एक स्थान पर आया है कि जिस जनपद में राजा निवास नहीं किया करता है वहाँ नट, नर्त्तक आदि हर्षित दृष्टिगोचर नहीं हुआ करते हैं।२ रामायण में ही नट तथा नर्त्तकों की गोष्ठी तथा मनोरंजन सम्बन्धी वर्णन भी उपलब्ध होता है।३ “व्यामिश्र”४ शब्द का प्रयोग इस प्रकार के नाटकों के लिये किया गया है जिनमें कई भाषाओं का मिश्रण रहा करता था।

इस काल में विद्यमान नाट्यकला पर धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टि-गोचर होता है। धार्मिक उत्सवों पर मनोविनोदार्थ राम तथा कृष्ण की लीलाओं का अभिनय भी किया जाता था। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस काल तक “नाटक” जन-साधारण के लिये श्रद्धा एवं सम्मान का विषय बन गया था।

संस्कृत-व्याकरण के निर्माता पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी मे नट सम्बन्धी सूत्रो का उल्लेख मिलता है। इन सूत्रो में ‘शिलालि’५ तथा ‘कृशाश्व’५


१. बलदेव उपाध्याय—संस्कृत साहित्य का इतिहास (पंचम संस्करण) पृष्ठ ४५२, पंक्ति ६-११। “हमारी नाट्य परम्परा” (श्री कृष्णदास) पृष्ठ ३६, पंक्ति ५-८।
२. वाल्मीकि-रामायण २।६७।१५॥
३. वाल्मीकि-रामायण—अयोध्याकाण्ड ६७।१५॥
४. वाल्मीकि-रामायण—अयोध्याकाण्ड १।२७॥
५. पाराशर्य शिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ॥ अष्टाध्यायी ४।३।११०॥
कर्मन्द कृशाश्वादिनी ॥ अष्टा० ४।३।१११॥

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