भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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तथा गुजरात में गुर्जर-राज्य प्रमुख थे । हूणों के ये छोटे-छोटे राज्य स्थाण्वीश्वर ( थानेश्वर ) और कान्यकुब्ज ( कन्नौज ) के राज्यों से शत्रुता रखने रहे । परिणामस्वरूप कन्नौज के मौखर या मौखरिवंशीय राजा ईशानवर्मा तथा सर्ववर्मा के इन हूणों के साथ कई बार युद्ध हुए जिनमें थानेश्वर के राजाओं की सहायता स मौखरिवंशीय राजाओ ने हूणों को हराया । शाकल के हूणवंशीय राजा तो थानेश्वर राज्य के शत्रु ही बन गये । परिणाम यह हुआ कि महाराज प्रभाकर-वर्धन और उनके सम्बन्धी कन्नोज के महाराज अवन्तिवर्मा ने मिलकर हूणों का नाश कर दिया । हूणों की विजय से प्रभावित महाकवि वाण ने प्रभाकरवर्धन की विजय-प्रशस्ति भी लिखी है तथा जिस ‘अवन्तिवर्मा’ की विजय का उल्लेख विशाखदत्त ने अपने मुद्राराक्षस के भरतवाक्य मे किया है वे महाराज प्रभाकरवर्धन क सम्बन्धी और उनके परम सहायक अवन्तिवर्मा ही हैं । इस हूण-विजय का समय सन् ५८२ ई० आंका गया है । इस भाँति मुद्राराक्षस के लेखक विशाखदत्त का कार्यकाल ईसा की छठी शताब्दी का अन्तिम उत्तरार्द्ध भाग ही होना चाहिये ।

उपर्युक्त समय का निर्धारण करते समय यह बात भी विचारणीय प्रतीत होती है कि विशाखदत्त ने एक पद्य में महाकवि भारवि का अनुकरण किया है जिसका समय लगभग छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध माना गया है । इससे विशाख-दत्त का भारवि का परवर्ती होना सिद्ध होता है । साथ ही वे ‘माघ’ के पूर्ववर्ती भी प्रतीत होते हैं क्योकि माघ ने परिवर्तित रूप मे मुद्राराक्षस मे यह उक्ति ली है —

“तन्त्रावापविदायोगैर्मण्डलान्वधितिष्ठता । मुनिग्रहा नरेन्द्रण फणीन्द्रा इव शत्रव ॥”

अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त का समय इन दोनो कवियों के समय के मध्य मे ही होना चाहिये । यह समय छठी शताब्दी के आस-पास ही होगा ।

उपर्युक्त समय की पुष्टि डा० विण्टरनिट्स द्वारा भी की गई है । उनका कथन है कि विशाखदत्त द्वारा रचित “देवीचन्द्रगुप्त” नामक नाटक के जो अंश उपलब्ध हुये हैं उनसे ज्ञात होता है कि इसमें ध्रुव देवी (अथवा ध्रुवस्वामिनी) के चन्द्र-गुप्त द्वितीय द्वारा शत्रु के पंजे से मुक्त किये जाने की घटना वर्णित है । इस