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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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तथा गुजरात में गुर्जर-राज्य प्रमुख थे । हूणों के ये छोटे-छोटे राज्य स्थाण्वीश्वर ( थानेश्वर ) और कान्यकुब्ज ( कन्नौज ) के राज्यों से शत्रुता रखने रहे । परिणामस्वरूप कन्नौज के मौखर या मौखरिवंशीय राजा ईशानवर्मा तथा सर्ववर्मा के इन हूणों के साथ कई बार युद्ध हुए जिनमें थानेश्वर के राजाओं की सहायता स मौखरिवंशीय राजाओ ने हूणों को हराया । शाकल के हूणवंशीय राजा तो थानेश्वर राज्य के शत्रु ही बन गये । परिणाम यह हुआ कि महाराज प्रभाकर-वर्धन और उनके सम्बन्धी कन्नोज के महाराज अवन्तिवर्मा ने मिलकर हूणों का नाश कर दिया । हूणों की विजय से प्रभावित महाकवि वाण ने प्रभाकरवर्धन की विजय-प्रशस्ति भी लिखी है तथा जिस ‘अवन्तिवर्मा’ की विजय का उल्लेख विशाखदत्त ने अपने मुद्राराक्षस के भरतवाक्य मे किया है वे महाराज प्रभाकरवर्धन क सम्बन्धी और उनके परम सहायक अवन्तिवर्मा ही हैं । इस हूण-विजय का समय सन् ५८२ ई० आंका गया है । इस भाँति मुद्राराक्षस के लेखक विशाखदत्त का कार्यकाल ईसा की छठी शताब्दी का अन्तिम उत्तरार्द्ध भाग ही होना चाहिये ।

उपर्युक्त समय का निर्धारण करते समय यह बात भी विचारणीय प्रतीत होती है कि विशाखदत्त ने एक पद्य में महाकवि भारवि का अनुकरण किया है जिसका समय लगभग छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध माना गया है । इससे विशाख-दत्त का भारवि का परवर्ती होना सिद्ध होता है । साथ ही वे ‘माघ’ के पूर्ववर्ती भी प्रतीत होते हैं क्योकि माघ ने परिवर्तित रूप मे मुद्राराक्षस मे यह उक्ति ली है —

“तन्त्रावापविदायोगैर्मण्डलान्वधितिष्ठता । मुनिग्रहा नरेन्द्रण फणीन्द्रा इव शत्रव ॥”

अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त का समय इन दोनो कवियों के समय के मध्य मे ही होना चाहिये । यह समय छठी शताब्दी के आस-पास ही होगा ।

उपर्युक्त समय की पुष्टि डा० विण्टरनिट्स द्वारा भी की गई है । उनका कथन है कि विशाखदत्त द्वारा रचित “देवीचन्द्रगुप्त” नामक नाटक के जो अंश उपलब्ध हुये हैं उनसे ज्ञात होता है कि इसमें ध्रुव देवी (अथवा ध्रुवस्वामिनी) के चन्द्र-गुप्त द्वितीय द्वारा शत्रु के पंजे से मुक्त किये जाने की घटना वर्णित है । इस

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नाटक का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि समुद्रगुप्त के पश्चात् उनके पुत्र रामगुप्त सम्राट् बने थे। इस कायर राजा ने अपने समकालीन शक-नरेश के आक्रमण के भय से सन्धि के रूप में अपनी अति सुन्दर रानी ध्रुवदेवी को उसे दे देने का वचन दे दिया था। किन्तु उसके छोटे भाई कुमार चन्द्रगुप्त (सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय) ने रानी का वेश धारण कर एक अप्रत्याशित कूटनीतिक चाल द्वारा शक-नरेश को मार डाला। तदनन्तर चन्द्रगुप्त ने अपने बड़े भाई रामगुप्त को भी मारकर गुप्त-साम्राज्य को हथिया लिया तथा ध्रुवदेवी से, जो उनके अनुपम साहस के कारण उन पर अनुरक्त थी, विवाह कर लिया। इससे कुमार-गुप्त की उत्पत्ति हुई। यह संभव प्रतीत नहीं होता कि विशाखदत्त ने एक ऐसे नाटक की, कि जिसमें चन्द्रगुप्त ने अपने अग्रज रामगुप्त का हननकर उसकी रानी से विवाह कर लिया हो, रचना चन्द्रगुप्त अथवा कुमारगुप्त के शासनकाल में की हो। अतः 'देवीचन्द्रगुप्त' नामक नाटक की रचना राजा अवन्तिवर्मा के काल में ही विशाखदत्त द्वारा की गई होगी। इस भाँति उक्त आधार पर भी विशाखदत्त का समय छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध ही बनता है।

इस 'अवन्तिवर्मा' से सम्बन्धित मत में भी अनेक आपत्तियाँ उठाई जाती हैं जो निम्नलिखित हैं :--

(१) यदि विशाखदत्त द्वारा कन्नौज के महाराज 'अवन्तिवर्मा' की प्रशस्ति अपने नाटक "मुद्राराक्षस" के 'भरतवाक्य' के द्वारा की गई और स्थाण्वीश्वर के महाराज प्रभाकरवर्धन की यशोगाथा का गान महाकवि बाण द्वारा किया गया तो यह बड़े आश्चर्य की बात है। समसामयिक होते हुये भी दोनों (बाण तथा विशाखदत्त) एक दूसरे से अपरिचित क्यों रहे ? क्योंकि दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे के बारे में अपनी कृतियों में संकेतमात्र तक नहीं किया है।

(२) राजा अवन्तिवर्मा समग्र भारत अथवा अधिकांश भारत का एकच्छत्र सम्राट् कभी नहीं रहा कि जिसका वर्णन मुद्राराक्षस के तृतीय अङ्क के उन्नीसवें (आशैलेन्द्रात्...इत्यादि) तथा चौबीसवें श्लोक में चाणक्य के कथनों में उपलब्ध होता है।

(३) इन्होंने ऐसा कोई उल्लेखनीय कार्य भी नहीं किया है कि जिसके

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आधार पर उन्हें भगवान् विष्णु का पृथ्वी-रक्षक अवतार माना जाय (जैसा कि भरतवाक्य में वर्णित है )।

(४) मुद्राराक्षस की शैली छठी अथवा उसके बाद की शताब्दी की शैली से मेल नहीं खाती है ।

(५) इस नाटक के सप्तम अङ्क के छठे ( "दुष्कालेऽपि "इत्यादि ) श्लोक में वर्णित चन्दनदास के शील-सौजन्य को बोधिसत्वों के शील-सौजन्य से बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया जाना छठी अथवा उसके बाद की शताब्दी के भारत की धार्मिक भावनाओं के साथ संगत नहीं है ।

(६) मुद्राराक्षस के 'भरतवाक्य' में 'म्लेच्छ' शब्द से केवल हूणों का ही अर्थ लिया जाय, यह बात कुछ उचित प्रतीत नहीं होती है, जब कि नाटककार ने कुलूताधिपति चित्रवर्मा, मलयदेश के राजा सिंहनाद, कश्मीर-नरेश पुष्कराक्ष, सिन्धुदेश के राजा सिन्धुषेण और पारस के अधिपति मेघ को भी म्लेच्छ कहा है ( कौलूतश्चित्रवर्मा इत्यादि श्लोक १।२०।। ) । पर्वतेश्वर तथा उसका बेटा मलयकेतु भी म्लेच्छ ही थे । इसके अतिरिक्त नाटककार शक, यवन, किरात, कम्बोज दरद्वासी, परशियन तथा बाह्लीक लोगों से भी पूर्णतया परिचित है (द्वितीय अङ्क में विराघगुप्त के कथन में १३वें श्लोक से पूर्व) । ये सभी म्लेच्छ-राज पर्वतक की सेना के अङ्ग थे । ये सभी उस समय वीरता के लिये प्रसिद्ध थे । इन पर कोई साधारण राजा विजय प्राप्त नहीं कर सकता था । अतः नाटककार ने जिस राजा की महानता एव अप्रतिम शक्ति शालिता का वर्णन अपने नाटक में प्रस्तुत किया है वह राजा मौखरिवंशीय 'अवन्तिवर्मा' नहीं हो सकता है । अतः 'अवन्तिवर्मा' को विशाखदत्त का आश्रयदाता स्वीकार किया जाना संगत प्रतीत नहीं होता है ।

(४) पार्थिवश्चन्द्रगुप्त पाठ ही अधिक प्रामाणिक प्रतीत होता है, ऐसा कुछ विद्वानों तथा आलोचकों ने स्वीकार किया है । इस पाठ के स्वीकार कर लेने पर यह कठिनाई उपस्थित होती है कि भारत के अतीत में 'चन्द्रगुप्त' नामधारी तीन शासक हुये हैं—(१) मौर्य-साम्राज्य की स्थापना करने वाला 'चन्द्रगुप्त मौर्य' जो स्वयं ही नाटक का एक प्रमुख पात्र है । (२) मगध के गुप्त साम्राज्य की स्थापना से सम्बन्ध रखने वाला चन्द्रगुप्त प्रथम तथा (३) चन्द्रगुप्त

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द्वितीय जिसे अपनी असीम शक्ति के कारण 'विक्रमादित्य' नामक उपाधि से अलङ्कृत किया गया था।

इन तीनो मे से प्रथम 'चन्द्रगुप्त मौर्य' तो हो नही सकता क्योकि नाटक की प्रस्तावना में इनके पितामह को सामन्त तथा पिता को महाराज शब्दों द्वारा कहा गया है। विशाखदत्त चन्द्रगुप्त मौर्य के न तो सामन्त ही थे न महाराज ही। यह बात नाटक के पढ़ने से स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। दूसरी बात यह है कि नाटक के अन्दर लेखक का उसके प्रति केवल आदर का भाव ही व्यक्त नही हुआ है, घृणा की भी अभिव्यक्ति हुई है।

गुप्त सम्राट् चन्द्रगुप्त प्रथम भी विशाखदत्त के आश्रयदाता नही हो सकते क्योकि इतिहास मे ऐसा कहीं नही मिलता है कि इन्होने विदेशी म्लेच्छ आक्रमण-कारियो को पराजित किया हो।

अतः अब चन्द्रगुप्त द्वितीय ही शेष रह जाते है, जिनको विशाखदत्त का आश्रयदाता समझा जा सकता है। यह एक प्रतापी राजा था। इसका राज्य प्रायः समस्त भारत में फैला हुआ था। इसी ने शको को पराजित कर 'विक्रमादित्य' की उपाधि को प्राप्त किया था। इसी के द्वारा कुषाण के वंशजों तथा बाह्लीको और अन्य म्लेच्छों को दूर भगांकर पंजाब में इन लोगों से अधि-कृत प्रदेश को अपने अधिकार मे कर लिया गया था। इन्ही की राजधानी कुसुमपुर ( आधुनिक पटना ) थी जहाँ से सम्पूर्ण भारत का संचालन किया जाता था। विशाखदत्त ने अपने नाटक मुद्राराक्षस मे प्रकारान्तर से इसी चन्द्र-गुप्त द्वितीय का वर्णन किया है। यह चन्द्रगुप्त द्वितीय विष्णुभक्त भी था। अतः उसी को पृथ्वी का उद्धारक विष्णु का अवतार कहा जाना भी युक्तिसंगत प्रतीत होता है।

इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त के आश्रयदाता चन्द्रगुप्त द्वितीय ही रहे होगे। चन्द्रगुप्त द्वितीय का कार्य-काल ३७५ ई० से ४१३ ई० तक माना जाता है। अतः विशाखदत्त का स्थितिकाल चतुर्थ शताब्दी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का पूर्वार्द्ध स्वीकार किया जा सकता है।

मुद्राराक्षस में चन्दनदास के शील एवं सौजन्य का जो चित्र उपस्थित किया

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गया है वह बाधिसत्वो से अधिक उत्तम॒ है तथा चतुर्थ शताब्दी की ही देन प्रतीत होती है —

‘बुद्धानामपि चेष्टित सुचरितै क्लिष्ट विशुद्धात्मना ॥’'७।१५॥

चतुर्थ एव पञ्चम शताब्दी मे गुप्तवंशीय वैष्णव-नरेश इस मत के अनुयायी थे। इसी कारण विशाखदत्त ने भरतवाक्य मे वैष्णव आश्रयदाता गुप्तवश के सम्राट् समुद्रगुप्त अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की ओर सकेत किया है।

मुद्राराक्षस में जिस सामाजिक दशा का चित्रण किया गया है वह चतुर्थ अथवा पञ्चम शताब्दी की ही प्रतीत होती है।

इन आधारो पर भी विशाखदत्त का काल पूर्ववत् ही सिद्ध होता है।

‘मुद्राराक्षस’ नामक नाटक में भरतवाक्य का प्रयोग जिस विलक्षणता के साथ किया गया है वैसा अन्यत्र देखने को नही मिलता। अन्य नाटको में भरत-वाक्य प्राय नायक द्वारा ही कहलवाया गया है किन्तु इस नाटक में नायक के स्थान पर प्रतिनायक द्वारा इसे कहलवाया गया है। चाणक्य को आशीर्वादवचन-दाता के रूप में चित्रित कर दिये जाने के पश्चात् भरतवाक्य कहने के लिये चन्द्रगुप्त का नम्बर आता है। चाणक्य चन्द्रगुप्त तथा राक्षस दोनो ही से एक साथ पूछता है —

“भो राजन् चन्द्रगुप्त !, भो अमात्य राक्षस !, उच्यता कि वा भूयः प्रियमुपकरोमि ?”

यह पूछे जाने पर चन्द्रगुप्त को भरतवाक्य कहने का पूर्ण अवसर प्राप्त था किन्तु लेखक द्वारा चन्द्रगुप्त से भरतवाक्य की पूर्वपीठिका मात्र ही प्रस्तुत कराई जाती है तथा प्रतिनायक राक्षस द्वारा भरतवाक्य। संस्कृत नाटक-साहित्य में सम्भवत ऐसा उद्धरण नहीं मिलेगा। भरतवाक्य के कहने की तैयारी चन्द्र-गुप्त करता है किंतु उसे प्रस्तुत करता है राक्षस। इसका एकमात्र कारण यही हो सकता है कि लेखक भरतवाक्य के अन्तिम चरण में “पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः” पाठ अवश्य रखना चाहता है। यह तभी सम्भव था कि जब इसे चन्द्रगुप्त के मुख से न कहलवाकर राक्षस के मुख से ही कहलवाया जाता। यदि यह पाठ न रखकर चन्द्रगुप्त से ‘राजन्’ शब्द के द्वारा राज सामान्य का वर्णन कराया जाता

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जैसा कि अन्य नाटकों में देखने को उपलब्ध होता है तो भी लक्ष्य की पूर्ति होना संभव न था। ऐसी स्थिति होने पर भरतवाक्य के तीसरे चरण में आये हुये "अधुना" शब्द की उपयोगिता भी पूर्ण न हो पाती। अतः इससे यही ध्वनित होता है कि नाटककार को "पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः" यही पाठ रखना अभीष्ट था।

इसके अतिरिक्त इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जहां लेखक ने अपने नाटक का इतिवृत्त मौर्य-साम्राज्य की स्थापना करने वाले चन्द्रगुप्त से सम्बन्धित रखा है वही लेखक द्वारा यह भी संकेत किया गया है कि उसके समय में राज्य करने वाले राजा का नाम भी चन्द्रगुप्त ही है। अतः "पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः" इस पाठ का संकेत गुप्तवंशीय राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय की ओर ही है।

इस आधार पर भी विशाखदत्त का स्थिति काल चतुर्थ शताब्दी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का पूर्वार्द्ध ही सिद्ध होता है क्योंकि चन्द्रगुप्त द्वितीय का कार्यकाल ३७५-४१३ ई० माना गया है।

डा० काशीप्रसाद जायसवाल ने भी भरतवाक्य के उपर्युक्त पाठ को ही प्रामाणिक माना है तथा भरतवाक्य मे आये हुये 'अधुना' और 'चन्द्रगुप्त' के आधार पर नाटक की रचना, चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के ही (३७५-४१४ ई०) काल की स्वीकार की है। उनकी प्रमुख युक्तियाँ निम्नलिखित हैं :—

(१) विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस मे जिस शैली का प्रयोग किया है वह शैली पंचम शताब्दी के पश्चात् की नही हो सकती है। नाटककार की शैली में लम्बे-लम्बे समासो का अभाव है। इसमे कृत्रिमता का भी दर्शन लगभग नगण्य के समान है। अतः इस प्रकार की शैली पंचम शताब्दी के पश्चात् की होना किसी भी दशा मे संभव नही है।

(२) नाटक की राजनीतिक कल्पनाएं भी चतुर्थ अथवा पंचम शताब्दी की परिस्थितियों की ही द्योतक हैं।

(३) 'भरतवाक्य' में जिस साम्राज्य की कल्पना की गई है—वह गुप्तकाल ही प्रतीत होता है।

(४) यदि विशाखदत्त बाण के समकालिक थे तो दोनो को एक-दूसरे का ज्ञान क्यो नहीं था।

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डा० जायसवाल के इस मत से प्रो० हिलेब्रेण्ट (Hillebrandt), स्पेयर (Speyer) और टोने (Towney) भी सहमत हैं।

M कृष्णमाचार्य ने भी अपनी पुस्तक 'History of Classical Sanskrit Literature' मे इसी मत का प्रतिपादन किया है। प्रो० स्टेन कोनो (Sten Konow) ने भी इसी को प्रामाणिक माना है। श्री आर० एस० पण्डित तथा सी० आर० देवधर ने भी इसी का अनुमोदन किया है।

नाटककार विशाखदत्त की दूसरी कृति "देवीचन्द्रगुप्त" मानी गयी है। इसके उपलब्ध अंशो के आधार पर ज्ञात होता है कि नाटककार ने इसमें तीन पात्रों के चरित्र पर विशद रूप से प्रकाश डाला है—(१) राजा, (२) रानी तथा (३) राजकुमार चन्द्रगुप्त। इस प्रकार का चित्रण उसी व्यक्ति के द्वारा किया जाना सम्भव है जो कि या तो स्वयं उस राजदरबार में विद्यमान हो और सम्बन्धित व्यक्ति से भली भांति परिचित हो अथवा उस व्यक्ति द्वारा किया जाना सम्भव है जिसका काम केवल प्रशंसा करना मात्र ही है तथा आवश्यकता-नुसार जिसे कुमार के चरित्र को निर्दोष एवं उत्कृष्ट बनाना है जो कि आगे चलकर राजगद्दी पर आसीन होता है। जो भी हो—इस नाटक के अध्ययन से तो स्पष्ट हो ही जाता है कि यह 'देवीचन्द्रगुप्त' नाटक ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखित है जो कि सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन था। अतः इस आधार पर भी विशाखदत्त का स्थितिकाल पूर्ववत् ही सिद्ध होता है।

**बहिर्साक्ष्य—**इसके आधार पर भी लगभग उपर्युक्त समय की ही पुष्टि हो जाती है। श्री भोज ने अपने 'सरस्वती कण्ठाभरण' मे, जिसका रचना-काल ११वीं शताब्दी स्वीकार किया गया है, मुद्राराक्षस के निम्नलिखित दो पद्यों को उद्धृत किया है —

"उपरिघन घनरटित दूरे दयिता किमेतदापतितम्। हिमवति दिव्योपधय शीर्षे सर्प समाविष्ट ॥—मुद्रा० १।२२ और सरस्वती०—३।८७॥

तथा—

प्रत्यग्रोन्मेषजिह्मा क्षणमनभिमुखी रत्नदीपप्रभा इत्यादि। —मुद्रा० १।२१वां श्लोक तथा सरस्वती० १।६८॥

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इसी प्रकार १०वीं शताब्दी में विद्यमान धनंजय ने अपने ग्रन्थ ‘दशरूपक’ में मुद्राराक्षस का संकेत निम्नलिखित रूप में किया है :-

“तत्र वृहतकथामूलं मुद्राराक्षसम्” —दशरूपक १।६८ के नीचे

तथा—

“मन्त्रशक्त्या, यथा मुद्राराक्षसे राक्षसहायोदीनां चाणक्येन स्वबुद्ध्या भेदनम्” इत्यादि —दशरूपक २।५५ के नीचे

इसके अतिरिक्त इसी दशरूपक के द्वितीय प्रकाश में नायक के सामान्य गुणों की चर्चा करते हुये “स्थिर:” इस विशिष्ट गुण को स्पष्ट करते हुए लिखा है :—
यथा वा भर्तृहरिशतके [ नीति शतक श्लोक—२६ ]—

“प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमगुणाः न परित्यजन्ति” ॥ मुद्रा० २।१६॥

किन्हीं-किन्ही प्रतियों में इस श्लोक का अन्तिम चरण निम्नलिखित रूप में मिलता है :—

“प्रारब्धमुत्तमगुणास्त्वमिवोद्वहन्ति”

इसमें आये हुये “त्वमिव” की संगति मुद्राराक्षस में तो ठीक बैठ जाती है किन्तु भर्तृहरि शतक में ठीक नही बैठती । इससे ज्ञात होता है कि यह श्लोक मुद्राराक्षस का ही है तथा भर्तृहरि ने इसको वहीं से ले लिया होगा । यदि इसको ठीक मान लिया जाय तो विशाखदत्त की स्थिति भर्तृहरि से पहले सिद्ध हो जाती है । भर्तृहरि का समय ६५१ ई० के लगभग माना गया है। अतः विशाखदत्त का समय इससे पहले का ही रहा होगा ।

मुद्राराक्षस का घटनास्थल पाटलिपुत्र ( आधुनिक पटना ) है । मुद्राराक्षस में इसका वर्णन एक प्रसिद्ध गौरवशाली नगर के रूप में किया गया है। इसको पुष्पपुर अथवा कुसुमपुर नाम से भी कहा गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसकी सत्ता सिद्ध होती है । चीनी यात्री फाह्यान ने अपनी मध्य-एशिया की यात्रा ३६६ ई०

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से ४११ ई० तक की थी। इसी बीच वे बुद्ध भगवान् की पावन-भूमि के दर्शन तथा बौद्ध धर्म की पुस्तको की खोज में भारत भी आये थे। वे लगभग ७ वर्षों तक भारत का भ्रमण कर तथा अनेक बहुमूल्य पुस्तकों और मूर्तियों को लेकर अपने देश लौट गये। उन्होंने पाटलिपुत्र को मगध की राजधानी के रूप मे देखा था—ऐसा उन्होंने लिखा है। इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में जो बौद्ध धर्म की ओर (७।५ मे) संकेत है, उससे यह ज्ञात होता है कि उस समय बौद्ध धर्म का अभ्युदय काल था। यही दशा फाह्यान के भारत आने के समय भी थी।

इसके अनन्तर दूसरा चीनी यात्री ह्वेनसांग ( Hiunen-Tsang ) भी भारत मे आया। उसकी यात्रा ६४६-६६६ ई० के मध्य रही। वह १५ वर्ष तक यहाँ रहा। उसने मगध की राजधानी पाटलिपुत्र का वर्णन भग्नावशेष रूप में किया है।

इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि छठी अथवा सप्तम शताब्दी में पाटलिपुत्र की दशा, प्रतिष्ठा वह नही रह गई थी जिसका वर्णन मुद्राराक्षस में उपलब्ध होता है। अतः फाह्यान द्वारा लिखित पाटलिपुत्र की दशा के उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुद्राराक्षस की रचना चतुर्थ शताब्दी के अन्त में अथवा पञ्चम शताब्दी के प्रारम्भ में हुई होगी। पुन इसी आधार पर नाटककार विशाखदत्त का स्थितिकाल भी यही मानना होगा।

जीवन-वृत्त

काल-वर्णन के प्रारम्भ मे ही उद्धृत प्रस्तावना के अंश से स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार का नाम विशाखदत्त ही था। इनके पिता का नाम भास्करदत्त तथा पितामह का नाम वटेश्वरदत्त था। 'मुद्राराक्षस' की कुछ प्रतियो में "महाराज भास्करदत्तसूनो" के स्थान पर 'महाराजपदभाक्पृथुसूनो' पाठ भी मिलता है। इसी आधार पर प्रो० विल्सन ने लेखक के निवासस्थान का निर्णय इस प्रकार किया है कि महाराज पृथु और अजमेर के पृथुराज अथवा पृथुराय एक ही हैं। किन्तु आगे चलकर उन्होंने स्वयं ही यह संकेत भी दिया है कि 'वटेश्वरदत्त' में प्रयुक्त 'दत्त' शब्द इस निर्णय में कठिनाई उपस्थित करता है। श्री तैलंग महोदय ने उपर्युक्त कल्पना का विरोध करते हुये यह मत अभिव्यक्त किया है कि

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विशाखदत्त के पिता पृथु तथा अजमेर-निवासी पृथुराय दोनों ही पृथक्-पृथक् व्यक्ति हैं क्योंकि विशाखदत्त के पिता 'महाराज' पद द्वारा सम्बोधित किये गये हैं तथा अजमेर के पृथु केवल पृथुराज अथवा पृथुराय ही हैं।

इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में वर्णित नाटककार के पिता एवं पितामह आदि को 'सामन्त' कहा गया है। वह जिस राजा के सामन्त पद पर आसीन होकर शासन कार्य भी संभाला करते थे वह भारत का एकछत्र सम्राट् था (भरतवाक्य मे आता ही है :—सः•••••••••चिरमवतु महीं•••••• इत्यादि)। इस आधार पर प्रो० विल्सन का मत एकदम निराधार ही हो जाता है। इसके अतिरिक्त जर्मन विद्वान् हिलीब्राण्ट महोदय ने अपने द्वारा सम्पादित मुद्राराक्षस में 'भास्करदत्त' नाम को ही प्रामाणिक रूप में स्वीकार किया है।

नाटककार ने अपनी कृति 'मुद्राराक्षस' में उत्तर भारत का जो विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है उससे यह बात सहज ही स्पष्ट हो जाती है कि विशाखदत्त उत्तर भारत के ही निवासी थे। इस विचार की पुष्टि नाटक में वर्णित काशपुष्पों तथा हंस के वर्णन से भी हो जाती है। काशपुष्प तथा हंस उत्तर भारत की नदियों के किनारे ही पाये जाते हैं। तृतीय अङ्क में शरद् ऋतु सम्बन्धी वर्णन देखिये :—

"आकाशं काशपुष्पच्छविमभिभवता भस्मना शुक्लयन्ती शीतांशोरंशुजालैर्जलधरमलिनां क्लिन्दन्ती कृत्तिमैभीम् । कापालीमुद्वहन्ती स्रजमिव धवला कौमुदीमित्यपूर्वा हासश्रो राजहंसा हरतु तनुरिव क्लेशमैशी शरद.॥" ३।२०॥

गङ्गा के किनारे स्थित पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) के विशद् वर्णन से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार इस प्रदेश के भूभाग से भली भाँति अवगत है तथा इसी ओर का निवासी है। प्रस्तावना में ही सूत्रधार कहता है :—

"चीयते बालिशस्यापि सत्क्षेत्रपतिता कृषिः । न शालेः स्तम्बकरिता वप्तुर्गुणमपेक्षते ॥" १।३॥

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यह उद्धरण नाटककार के उस प्रदेश के निवासी होने का परिचायक है जो कि धान की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कवि धान की उस अवस्था से भी पूर्णतया परिचित है जब कि वे गुच्छों के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ करते हैं तथा सघन होते हैं। वह यह भी जानता है कि धान की इस वृद्धि में बोने वाले कृषक की कोई योग्यता कारण नहीं है अपितु खेत की उर्वराशक्ति ही कारण है जो कि धान के पौधों को बढने का अवसर प्रदान किया करती है।

सूत्रधार द्वारा यह उक्ति दर्शको के समक्ष कही जा रही है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दर्शकगण तथा अभिनेताजन भी धान तथा उसकी उपजाऊ भूमि से भली भाँति परिचित हैं।

पञ्चम अङ्क के अन्त में आये हुए तेरहवें श्लोक के पूर्वार्ध भाग के पढने से यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार गौड देश के रीति-रिवाजो, वहाँ की स्त्रियों के प्रसाधन सम्बन्धी साधनों तथा आकार-प्रकार से पूर्णतया परिचित थे।

खस जाति के लोग उस समय बडे योद्धा माने जाते थे। मलयकेतु की सेना में यही सबसे बडे विश्वासपात्र थे। यही कारण था कि राक्षस भी उन्हें अपने साथ रखना चाहता था (मुद्रा० ५।११)। इस जाति के लोग भारत के पूर्वी भाग के पहाडी प्रदेशो में रहा करते थे।

इन वर्णनों से भी नाटककार का पूर्वी बिहार अथवा बङ्गाल के पश्चिमी भाग का निवासी होना सिद्ध होता है। नाटक में प्रयुक्त गौडी रीति भी इसी तथ्य की पोषक है।

धार्मिक आस्था— नाटक के अध्ययन से ध्वनित होता है कि विशाखदत्त वैदिक धर्म के अनुयायी रहे होंगे। आश्रम-धर्म में उनकी पूर्ण आस्था थी। वैदिक पद्धति के अनुसार प्रतिदिन यज्ञ (हवन) आदि करना उनकी दृष्टि में एक आदर्श पद्धति थी। ऋषियों के जीवन को वे एक आदर्श जीवन समझते थे। द्विजो के लिये ब्रह्मचर्य-आश्रम में निवास करते हुये गुरु-सेवा को वे महत्त्व प्रदान करते थे :-

"उपलशकलमेतद् भेदकं गोमयानां वटुभिरुपहृतानां बर्हिषा स्तोम एव। शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिराभि— र्विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम्॥" ३।१५॥

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उनका आश्रयदाता राजा विष्णु का उपासक था । [ अङ्क ७।१९ ] । उन्होंने मुद्राराक्षस के प्रारम्भ में शिव की उपासना की है । इससे उनका शिवोपासक होना स्पष्ट होता है [ अङ्क १।१ २ ] । इसके अतिरिक्त भगवान् विष्णु के प्रति भी उनकी आस्था दृष्टिगोचर होती है [ अङ्क ३।२०-२१। ] । इतना होने पर भी वे अति उदार-दृष्टि के व्यक्ति प्रतीत होते हैं। उन्होंने बौद्ध-धर्म सम्बन्धी परम्पराओं एवं जातक-कथाओं का भी उल्लेख बड़े आदर के साथ किया है [ अङ्क ४।१८ ] । तान्त्रिक क्रियाओं तथा शकुनों आदि में भी उनका विश्वास था [ श्लोक सं० ४।१२ की तृतीय पंक्ति तथा चतुर्थ अङ्क में तृतीय श्लोक के पश्चात् राक्षस की उक्ति ] । श्लोक सं० ४।२१ में सूर्य के प्रति भी उन्होंने अपनी भक्ति प्रकट की है । भाग्यवादी होने के साथ ही वे पौरुष में पूर्ण निष्ठा रखते थे [ द्वितीय अङ्क के श्लोक सं० १५ से १६ तक का वर्णन ] ।

विशाखदत्त का व्यक्तित्व—नाटककार अथवा कवि अपनी कृति में अपने हृदयगत-भावों तथा अनुभूतियों का ही चित्रण किया करता है । भावों तथा अनुभूतियों के इस चित्रण में ही नाटककार अथवा कवि का अपना व्यक्तित्व झलका करता है । मुद्राराक्षस मे भी विशाखदत्त का जो व्यक्तित्व झलकता दिखाई देता है उसके तीन रूप हमारे समक्ष आते हैं—(१) राष्ट्र-जीवन सम्बन्धी दार्शनिकता का रूप, (२) राजनीतिक आदर्शवादिता का रूप तथा (३) मानवता सम्बन्धी महाविश्वासी होने का रूप ।

कोई भी राष्ट्र, चाहे वह राजतन्त्रात्मक हो अथवा प्रजातन्त्रात्मक, तभी उन्नत हो सकता है जब उसके निवासी अपने स्वार्थ की अपेक्षा देश तथा समाज के स्वार्थ को प्रधानता दें । मुद्राराक्षस नाटक का 'चाणक्य' राष्ट्र की राजनीति का कर्णधार है, जिसकी आत्मत्याग की भावना सर्वत्र व्याप्त है तथा राष्ट्र-हित से ओत-प्रोत है । मुद्राराक्षस का 'चन्द्रगुप्त' राष्ट्र-शासन का नियामक है जिसे जनरंजन की परतन्त्रता में ही शासक की स्वतन्त्रता के आत्मगौरव की अनुभूति हुआ करती है । मुद्राराक्षस का 'राक्षस' एक ऐसा राष्ट्र-पुरुष है जो राष्ट्र के निमित्त अपनी आत्मा का बलिदान करने हेतु सदैव उद्यत रहा करता है । इसी भांति मुद्राराक्षस के दूत, गुप्तचर आदि अन्य पात्र भी कर्त्तव्य-भावना से प्रेरित ही दृष्टिगोचर होते हैं । यही है मुद्राराक्षस का राष्ट्र-जीवन सम्बन्धी दार्शनिक रूप ।

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राजनीतिक आदर्शवादिता तो विशाखदत्त के व्यक्तित्व की आधारशिला ही है। कौटिल्य-अर्थशास्त्र की राजनीति तत्कालीन कही जा सकती है किन्तु 'मुद्राराक्षस' में वर्णित राजनीति को एक राजनीतिक स्वप्न ही कहा जा सकता है। राष्ट्रीय सुख-शान्ति के निमित्त उसके साधारण और महान्, शामित और शामक सभी का हृदय-परिवर्तन आवश्यक है—यह स्वप्न जिसे आज समस्त विश्व के राष्ट्र देखने के लिय उत्सुक हैं—उसे विशाखदत्त ने शताब्दियों पूर्व ही देख लिया था। चाणक्य तथा राक्षस, चन्द्रगुप्त तथा मलयकेतु भिन्न-भिन्न राजनीतिक आदर्शों का अनुकरण करने वाले हैं किन्तु अन्त में जाकर सभी का हृदय-परिवर्तित हो जाता है। इसका एकमात्र कारण है—राष्ट्र-जीवन का हनन न होने देना तथा राष्ट्र की अमरता की सुरक्षा।

विशाखदत्त ने मानवता के प्रति महान् विश्वास को भी प्रकट किया है। राक्षस की जीवन-धारा का अन्त में सर्वथा परिवर्तित रूप में प्रवाहित होने की सूक्ष्म अभिव्यञ्जना ही इस विश्वास का उत्तम उदाहरण है।

विशाखदत्त का शास्त्रीय ज्ञान—मुद्राराक्षस का भली भाँति अध्ययन करने के पश्चात् यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि नाट्यकला सम्बन्धी सूक्ष्म तत्त्वों के ज्ञान के साथ ही साथ नाटककार को अन्य शास्त्रों का भी ज्ञान प्राप्त था। नाटककार के उत्तरदायित्व का निर्वाह कितना कष्टपूर्ण है—इसे वे भली भांति जानते थे। नाट्यशास्त्र में तो वे पूर्ण पारंगत ही थे। इसी कारण उन्होंने राक्षस के मुख से कहलवाया है —

“कार्योपक्षेपमादौ तनुमपि रचयम्तस्य विस्तारमिच्छन् ” इत्यादि ४।३।।

इस कष्ट की अनुभूति विशाखदत्त सदृश सफल नाटककार को ही हो सकती है अथवा राजनीति में विचरण करने वाले कुशल राजनीतिज्ञ राक्षस को ही।

इसके अतिरिक्त वे न्यायशास्त्र (साध्ये निश्चितमन्वयेन घटितम् इत्यादि ५।१०), अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा ज्योतिष-शास्त्र (कृतश्रमोऽस्मि चतुःषष्ट्यङ्गे ज्योतिःशास्त्रे इत्यादि अङ्क १।६ श्लोक से पूर्व का सूत्रधार का कथन तथा "रक्षत्येनं तु बुधयोगः") तथा राजनीति के तो वे माने हुये योद्धा ही थे। परिस्थितियों के स्वाभाविक रूप से बहते हुये प्रवाह को किसी भी क्षण

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अपने अनुकूल मोड़ लेना नाटककार विशाखदत्त के बाएँ हाथ का खेल है। यही कारण है कि उन्हें कभी भी निस्सहाय व्यक्ति के सदृश भाग्य का मुख नहीं देखना पड़ा। उनकी दृष्टि में भाग्य (दैव) पर आश्रित रहना मूर्खों का कार्य है—

“दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति”—३।२८ के पश्चात् चाणक्य का कथन ।

इस भाँति उनका शास्त्रीय ज्ञान अत्यन्त पाण्डित्यपूर्ण था किन्तु फिर भी उन्होंने अपने पाण्डित्यपूर्ण अहंकार का प्रदर्शन अपनी कृतियो मे कही भी नही किया है। कृत्रिमता का तो कही लेशमात्र भी दर्शन नही होता है।

उनकी कृतियाँ—अभी तक विशाखदत्त द्वारा रचित चार रचनाओं का पता विद्वानो द्वारा लगाया जा सका है। ये चारो नाटक ही हैं। कालक्रम की दृष्टि से उनका विवरण निम्नलिखित है :—

(१) देवीचन्द्रगुप्तम्—इसका कथानक भी राजनीतिक है । इसका सम्बन्ध प्रधान रूप से चन्द्रगुप्त द्वितीय से है जिसने अपने अयोग्य भाई रामगुप्त की पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया था। रामगुप्त एक कायर तथा भीरु राजा था। इसी कारण उसने शक्तिशाली शकराज द्वारा माँगे जाने पर अपनी रूपवती पत्नी ध्रुवदेवी को उसे दे देना स्वीकार कर लिया था। किन्तु यह बात तेजस्वी चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को अनुचित प्रतीत हुई। इस कारण उसने ध्रुवदेवी के छद्मवेष में शकराज के शिविर में जाकर उस अत्याचारी शकराज का वध कर डाला और तदनन्तर ध्रुवदेवी से विवाह भी कर लिया था। किन्तु यह नाटक पूर्णरूप में अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है।

(२) अभिसारिकावञ्चितकम्—इसका उल्लेख 'अभिनव-भारती' के २२वें अध्याय में तथा 'शृंगारप्रकाश' के १८वें प्रकाश मे उपलब्ध होता है। यह नाटक वत्सराज उदयन के जीवन से सम्बन्धित है। किन्तु यह भी अभी तक अप्राप्य ही है।

(३) 'राघवानन्दम्' नाटक—प्रोफेसर ध्रुव द्वारा 'सदुक्ति-कर्णामृत' में निम्नलिखित श्लोक विशाखदत्त के नाम से उद्धृत किया गया है :—

“रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुणैर्यातः प्रसिद्धिं परा- मस्मद्भाग्यविपर्ययाद् यदि परं देवो न जानाति तम् ।

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वन्दीवंप यशांसि गायति मरुद् यस्यैकबाणाहत- श्रेणीभूतविशालतालविवरोद्गीर्णे स्वरै सप्तभि ॥”

इस श्लोक से यह अनुमान किया जाता है कि ‘राघवानन्द’ नामक कोई नाटक भी विशाखदत्त द्वारा लिखा गया होगा। किन्तु आज यह उपलब्ध नहीं है ।

(४) मुद्राराक्षस—यह विशाखदत्त की सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है । उनकी नाट्य-प्रतिभा का यह सर्वोच्च निदर्शन है ।

विशाखदत्त की शैली

नाटककार विशाखदत्त की शैली सुस्पष्ट, प्रभावशाली तथा प्रवाह के औचित्य से पूर्ण है । वैसे तो उनके नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में प्रसाद, माधुर्य एवं ओज तीनों ही गुणों का स्वाभाविक रूप से प्रयोग हुआ है, किन्तु फिर भी उसमें प्रसाद गुण की प्रधानता दृष्टिगोचर होती ही है । नाटक के प्रारम्भ में कुछ दूर तक देखते जाइये, श्लोकों में प्रसाद गुण के ही दर्शन होंगे ।

कुछ आलोचकों ने उनकी शैली के सम्बन्ध में यह आपत्ति की है कि विशाखदत्त के नाटकों में कालिदास एवं भवभूति के नाटकों के समान काव्यमय भावाभिव्यक्ति नहीं हो सकी है । किन्तु यदि हम गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि विशाखदत्त की वैयक्तिक विशेषताओं से प्रभावित नाट्य-रचना-शैली को कालिदास तथा भवभूति की तुलना में रखना उचित नहीं है क्योंकि न तो कालिदास और भवभूति के काव्यमय वर्णनों की कल्पना विशाखदत्त में ही दृष्टिगोचर हो सकती है और न विशाखदत्त की नाट्य कल्पना का ही दर्शन कालिदास अथवा भवभूति के नाटकों में उपलब्ध हो सकता है । वस्तुत तीनों का अपना-अपना जीवित जागृत व्यक्तित्व है तथा उसको अभिव्यक्त करने के साधन तथा शक्तियां भी अपनी-अपनी ही हैं । विशाखदत्त ने नाटकीय औचित्य की दृष्टि से या तो काव्य-कल्पनाओं को दूर ही रखा है अथवा उनको नाटक के रंग में ही रंग दिया है । उदाहरणार्थ मलयकेतु के कंचुकी की निम्नलिखित उक्ति को ही देखिये :—

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“कामं नन्दमिव प्रमथ्य जरया चाणक्यनीत्या यथा धर्मो मौर्य इव क्रमेण नगरे नीतः प्रतिष्ठां मयि। तं सम्प्रत्युपचीयमानमपि मे लब्धान्तरः सेवया लोभो राक्षसवञ्चनाय यतते जेतुं न शक्नोति च॥” २।६॥

इस उद्धरण में कवि-कल्पना की उड़ान का दर्शन भले ही न हो किन्तु नाटकीय-वृत्त और चरित्र की अभिव्यञ्जना बड़ी ही सुन्दर प्रतीत होती है। इसी प्रकार शकटदास की ‘दृष्ट्वा मौर्यमिव……’ इत्यादि [मुद्रा० २।२१] उक्ति में नाटककार की काव्य-कल्पना की उड़ान भले ही विद्यमान न हो किन्तु उसमें नाटकीय औचित्य की सतर्कता का दर्शन अवश्य ही होता है।

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त की अपनी एक शैली है। वे अपनी कला के स्वयं ही निर्माता तथा निर्वाहकर्त्ता हैं। “राजनीतिक धोखा किस भाँति दिया जाना उचित कहा जा सकता है”, इसका सूक्ष्म और यथार्थ विश्लेषण ही उनकी कला की प्रमुख विशेषता है। उनकी शैली नाटक के विषय के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। उसमें स्थान-स्थान पर गम्भीरता, सशक्तता एवं प्रभावोत्पादकता का दर्शन होता है। कथावस्तु का निर्वाह कला-त्मक दृष्टि के अनुरूप ही हुआ है। राजनीति सदृश नीरस विषय को काव्य एवं नाटक का विषय बना देना, उसमें सजीवता, सरलता, मनोरंजकता आदि का समावेश कर उसे अभिनय सम्बन्धी गुणों से परिपूर्ण कर देना विशाखदत्त जैसे उन्नत कोटि के कलाकार का ही काम है। इस दृष्टि से उनकी गणना मूर्धन्य कलाकारों की श्रेणी में की जा सकती है। मुद्राराक्षस के प्रथम अंक में वर्णित चाणक्य की स्वगतोक्ति तथा षष्ठ अंक में वर्णित राक्षस की स्वगतोक्ति को नाटकीय दृष्टि से लम्बा तथा विस्तृत अवश्य कहा जा सकता है, किन्तु चाणक्य की स्वगतोक्ति से चाणक्य की राजनीति का विशद्-विवेचन उपलब्ध हो जाता है तथा राक्षस की स्वगतोक्ति से राक्षस की मानवीय-प्रकृति का, उसकी कोमल-भावनाओं का तथा उसकी भावात्मक अनुभूतियों का ज्ञान पाठक अथवा दर्शक को स्पष्ट रूप से हो जाता है। एक निराश महान् व्यक्तित्व की प्रकृति के साथ तन्मयता एव एकलयता का जैसा चित्रण उपस्थित किया गया है, भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से उसे अनुपम ही कहा जा सकता है।

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विशाखदत्त का गद्य ओज से समन्वित है । उनके पद्यों मे भी लालित्यपूर्ण प्रवाह का दर्शन होता है । एक उदाहरण देखिये —

"आस्वादितद्विरदशोणितशोणशोभा
सन्ध्यारुणामिव कलां शशलाञ्छनस्य ।
जृम्भाविदारितमुखस्य मुखात्स्फुरन्तो
को हर्तुमिच्छति हरे परिभूय दष्ट्राम् ॥"

इसी प्रसङ्ग में एक उदाहरण और देखिये जिसमें चाणक्य की राजनीति के वैचित्र्य का वर्णन प्रस्तुत किया गया है —

"मुहुर्लक्ष्योद्भेदा मुहुरधिगमाभावगहना
मुहु सम्पूर्णाङ्गी मुहुरतिकृशा कायवशत ।
मुहुर्भ्रश्यद्बीजा मुहुरपि बहुप्रापितफले—
त्यहो चित्राकारा नियतिरिव नोतिनयविद ॥" ५।३।।

नाटककार ने अपने मुद्राराक्षस में सरल पद्यों में शिक्षाप्रद बातों का भी उल्लेख किया है —

"शामनमर्हता प्रतिपद्यध्व मोहव्याधिविबंध्यानाम् ।
ये प्रथममात्रकटुक पश्चात्वथ्यमुपदिशन्ति ॥" ४।१६।।

पात्रों का चरित्र चित्रण— उन्होंने अपने पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी अपनी दक्षता दिखलायी है । प्रत्येक पात्र स्वतन्त्र है । वह अपने उद्देश्य की ओर ही प्रेरित है । कोई भी पात्र ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता है जिसकी सार्थकता नाटकीय कथावस्तु की दृष्टि से आवश्यक न हो । चाणक्य और राक्षस दोनों ही कुशल राजनीतिज्ञ हैं । किन्तु दोनों में अन्तर यही है कि चाणक्य धीर तथा दूरदर्शी है और राक्षस उदार तथा विस्मरणशील । फिर भी नाटककार ने राक्षस में जिस मैत्री भावना का चित्रण किया है वह भारतीय संस्कृति की विशिष्ट देन है ।

भाषा— नाटककार विशाखदत्त ने संस्कृत भाषा के अतिरिक्त शौरसेनी, महाराष्ट्री तथा मागधी प्राकृत का भी प्रयोग अपने नाटक मुद्राराक्षस में किया

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है। उनकी भाषा में गत्यात्मक गतिशीलता एवं क्रियात्मक तीव्रता का स्पष्ट दर्शन होता है। उन्होने गद्य तथा पद्य दोनों मे ही कोमल, सरस एवं औचित्य-पूर्ण पदावलि का प्रयोग किया है। उनके भावों का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। भाव के अनुकूल ही भाषा का प्रयोग उनकी एक विशेषता है। वाक्य छोटे-छोटे तथा मुहावरेदार हैं। उन्होंने पाण्डित्यपूर्ण तथा दीर्घ समास-बहुल पदों का प्रयोग अपनी रचना में स्वल्प मात्रा मे ही किया है। इसी कारण उनकी भाषा में दुरूहता का दर्शन नही होता है। उन्होंने पद्यों के बाहुल्य से अपनी नाटकीय शैली को कृत्रिम नही बनाया है। उनका शब्द-विन्यास पूर्णतया सशक्त तथा प्रभावोत्पादक है। पद्य की अपेक्षा गद्य अधिक ओजपूर्ण प्रतीत होता है। उसमें भावुकता के स्थान पर प्रभविष्णुता का आधिक्य है। यहाँ तक कि कभी-कभी तो एक ही शब्द के प्रयोग से नाटककार अधिक से अधिक अभिप्राय को प्रकट करने मे समर्थ होता है। राक्षस के निम्नलिखित कथन को ही देखिये :—

"सत्यं नगरान्निष्क्रामतो मम हस्ताद् ब्राह्मण्या उत्कण्ठा विनोदार्थं गृहीता।"

—मुद्रा० २।२ श्लोक के पश्चात् राक्षस की उक्ति।

इस स्थल पर 'ब्राह्मण्या' शब्द राक्षस के हृदय की घनीभूत पीड़ा तथा करुणा का प्रतीक है।

इसी प्रकार चन्दनदास के पुत्र की यह उक्ति—"तात् ! किमिदमपि अगणितव्यम् । कुलधर्मः खल्वेषोऽस्माकम्" [ अङ्क ७ के चतुर्थ श्लोक से पूर्व ] जितनी संक्षिप्त तथा अलंकृत है उतनी ही भावपूर्ण तथा मर्मस्पर्शी भी है।

विशाखदत्त द्वारा मुद्राराक्षस मे प्रयुक्त कथोपकथन पूर्णतया स्वाभाविक तथा रोचक और नाटकीय गुणो से परिपूर्ण है। इनकी शोभा अवलोकनीय है :—

राजा— अन्येनैवेद्मनुष्ठितम् ।
चाणक्यः— आः केन ?
राजा— नन्दकुलविद्वेषिणा दैवेन ।
चाणक्यः— दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति । इत्यादि [ ३।२६ से पूर्व ]

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उनका भाषा सम्बन्धी लालित्य एव माधुर्य भी दर्शनीय है । कुछ उदाहरण देखिये —

(१) न प्रयोजनमन्तरा चाणक्यः स्वप्नेऽपि चेष्टते । — ३।१६ के पश्चात् चाणक्य की उक्ति ।

(२) तन्मयाप्यस्मिन् वस्तुनि न शयानेन स्थीयते । — १।१५ के पश्चात् ।

(३) अयमपरो गण्डस्योपरि स्फोटः । — ५।२१ के अनन्तर कही गई राक्षस की उक्ति ।

(४) ननु वक्तव्य राक्षस एवास्मदङ्गुलिप्रणयी संवृत्त । — १।१६ के अनन्तर चाणक्य की उक्ति ।

(५) कीदृश पुन तृणानामग्निना सह विरोधः । — १।२१ के पश्चात् चन्दनदास की उक्ति ।

इस प्रकार की कोमलकान्त पदावलि सभी सहृदय पाठकों के चित्त को अवश्य ही अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ कही जा सकती है ।

छन्द—छन्दों का चयन भी विलक्षण ही है । मुद्राराक्षस में १६ प्रकार के छन्दों का प्रयोग हुआ है जिनमें स्रग्धरा, शिखरिणी, शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका और अनुष्टुप् को प्रमुख कहा जा सकता है । प्रत्येक छन्द का प्रयोग मात्र विषय के प्रकाशन हेतु ही नहीं हुआ है अपितु किसी औचित्य की दृष्टि से अथवा किसी औचित्य की सिद्धि के निमित्त ही प्रयुक्त हुआ है । स्रग्धरा छन्द का प्रयोग मुद्राराक्षस में १७ स्थानों पर हुआ है । विषय की दृष्टि से उनका औचित्य प्रशंसनीय ही है । उदाहरण के लिये प्रथम अङ्क के प्रारम्भिक नान्दी सम्बन्धी दो श्लोकों को ही ले लीजिये । 'शिव के शाठ्य' एवं 'ताण्डव-नृत्य के अभिनय' सदृश गभीर और असाधारण विषय का संगीतमय ध्वनि में गम्भीर स्वर लहरी के साथ अभिव्यक्त किया जाना 'स्रग्धरा' जैसे छन्द द्वारा ही सम्भव था । शार्दूलविक्रीडित नामक छन्द का प्रयोग भी २८ बार हुआ है । "श्यामीकृत्या-ननेन्दुम् इत्यादि १।११ श्लोक का भाव शार्दूलविक्रीडित छन्द के अतिरिक्त यदि किसी अन्य छन्द द्वारा अभिव्यक्त किया गया होता तो सम्भवतः चाणक्य का

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गंभीर-अमर्ष नामक भाव उतनी सशक्तता एवं गंभीरता के साथ प्रस्फुटित न हो सका होता कि जितना उपर्युक्त छन्द के प्रयोग द्वारा प्रस्फुटित हो सका है। इसी भाँति औचित्य की दृष्टि से अन्य छन्दों की भी परीक्षा की जा सकती है।

संक्षेप में यह कहा जाना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त की नाट्य-कला-कुशलता का आधार उनकी औचित्य-दृष्टि ही रही है—

“औचित्यं नाट्यजीवितम्”

ग्रन्थ का नाम मुद्राराक्षस क्यों पड़ा ?—विशाखदत्त ने अपने इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा है। यही उनकी सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है। उनकी नाट्य-प्रतिभा का पूर्ण विकसित स्वरूप इसी में देखने को मिलता है। इस नाटक में मन्त्री राक्षस ने यह प्रयत्न किया है कि किसी भाँति महाराज चन्द्रगुप्त को गद्दी से हटाया जाय। किन्तु कूटनीतिज्ञ अमात्य चाणक्य के प्रयत्नों के फलस्वरूप राक्षस अपने अभीष्ट को पूरा न कर सका। वह चन्द्रगुप्त का शुभचिन्तक था। उसकी हार्दिक अभिलाषा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त का मुख्य-मन्त्री बनाऊँ। उसने गुप्तचरों द्वारा राक्षस की राजकीय मुद्रा (मोहर) प्राप्त कर ली तथा उस मोहर को लगा लगाकर राक्षस के समर्थकों के समीप जाली पत्र भेजे। परिणामस्वरूप राक्षस का सहायकों के साथ मतभेद हो गया। उसका एक प्रिय मित्र चन्दनदास उसी के परिवार को छिपाकर रखने के अभियोग में राजा चन्द्रगुप्त के आदेशानुसार फाँसी पर चढ़ाया जा रहा था। राक्षस उसके बचाने के निमित्त प्रयत्न करता है। चाणक्य ने कहा कि वह उसके मित्र को फाँसी से छुड़वा देगा यदि वह चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर ले। राक्षस के पास कोई अन्य चारा ही न था। अतः उसने चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर लिया।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि चाणक्य की इस सफलता का एकमात्र साधन, 'राक्षस की मुद्रा' ही थी। इसी आधार पर इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा गया है। संस्कृत में इसकी व्युत्पत्ति इस भाँति की जाती है :—

"मुद्रया = अङ्गुलिमुद्रया, परिगृहीतः = वशीकृतः, राक्षसः यत्रेति (मध्यमपदलोपि समासः) तदधिकृत्य कृतो ग्रन्थः, मुद्राराक्षसम्। यहाँ "अधिकृत्य कृते ग्रन्थे" सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ है और तत्पश्चात् अण् प्रत्यान्त-पद होने के