भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 488 में से

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अपने अनुकूल मोड़ लेना नाटककार विशाखदत्त के बाएँ हाथ का खेल है। यही कारण है कि उन्हें कभी भी निस्सहाय व्यक्ति के सदृश भाग्य का मुख नहीं देखना पड़ा। उनकी दृष्टि में भाग्य (दैव) पर आश्रित रहना मूर्खों का कार्य है—

“दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति”—३।२८ के पश्चात् चाणक्य का कथन ।

इस भाँति उनका शास्त्रीय ज्ञान अत्यन्त पाण्डित्यपूर्ण था किन्तु फिर भी उन्होंने अपने पाण्डित्यपूर्ण अहंकार का प्रदर्शन अपनी कृतियो मे कही भी नही किया है। कृत्रिमता का तो कही लेशमात्र भी दर्शन नही होता है।

उनकी कृतियाँ—अभी तक विशाखदत्त द्वारा रचित चार रचनाओं का पता विद्वानो द्वारा लगाया जा सका है। ये चारो नाटक ही हैं। कालक्रम की दृष्टि से उनका विवरण निम्नलिखित है :—

(१) देवीचन्द्रगुप्तम्—इसका कथानक भी राजनीतिक है । इसका सम्बन्ध प्रधान रूप से चन्द्रगुप्त द्वितीय से है जिसने अपने अयोग्य भाई रामगुप्त की पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया था। रामगुप्त एक कायर तथा भीरु राजा था। इसी कारण उसने शक्तिशाली शकराज द्वारा माँगे जाने पर अपनी रूपवती पत्नी ध्रुवदेवी को उसे दे देना स्वीकार कर लिया था। किन्तु यह बात तेजस्वी चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को अनुचित प्रतीत हुई। इस कारण उसने ध्रुवदेवी के छद्मवेष में शकराज के शिविर में जाकर उस अत्याचारी शकराज का वध कर डाला और तदनन्तर ध्रुवदेवी से विवाह भी कर लिया था। किन्तु यह नाटक पूर्णरूप में अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है।

(२) अभिसारिकावञ्चितकम्—इसका उल्लेख 'अभिनव-भारती' के २२वें अध्याय में तथा 'शृंगारप्रकाश' के १८वें प्रकाश मे उपलब्ध होता है। यह नाटक वत्सराज उदयन के जीवन से सम्बन्धित है। किन्तु यह भी अभी तक अप्राप्य ही है।

(३) 'राघवानन्दम्' नाटक—प्रोफेसर ध्रुव द्वारा 'सदुक्ति-कर्णामृत' में निम्नलिखित श्लोक विशाखदत्त के नाम से उद्धृत किया गया है :—

“रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुणैर्यातः प्रसिद्धिं परा- मस्मद्भाग्यविपर्ययाद् यदि परं देवो न जानाति तम् ।

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